लोक कलाएं हैं ज्ञान का भंडार

दिंनाक: 22 Aug 2018 17:44:18


पतंजलि ने योग की जिन आठ परंपराओं को प्रस्तुत किया वह आज बाबा रामदेव के प्रयास से लोकप्रिय हुई है, लेकिन हमारे पूर्वजों ने योग एवं स्वास्थ्य के अभिन्न संबंध को समझकर हर लोक नृत्य में योग की प्रक्रिया का संगीतमय और लालित्यपूर्ण समावेशन किया। गोटी पुआ नृत्य को देखते हुए आपको भारतीय धर्म दर्शन के साथ योग की पारंपरिक क्रियाओं के सहज दर्शन होते हैं जिसे देखते हुए आप ब्रह्म के समीप पहुंच जाते हैं। पुरलिया शैली के छौ लोकनृत्य में मुखौटा लगाए कलाकार एक साथ कई कलाबाजियां लगाते हुए शारीरिक सौष्ठव का परिचय देते हैं। आत्मरक्षा और युद्ध के लिए निपुणता अनिवार्य है। वह भी अनायास लय-सुरबद्ध होकर सिखाई गई। केरल का कलारिपयट्टू एवं मणिपुर की थांग टा, मध्य प्रदेश की बरेदी ऐसी ही दर्शनीय कला है, जिनमें तलवार, ढाल, भाला, बरछी आदि शस्त्र संचालन लयबद्ध तरीके से किया जाता है। वे भारतीय कलाओं की यह विशेषता है कि वह देश, काल, परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को ढालती हुई आगे परिष्कृत होती जाती हैं। आत्मरक्षा एवं शत्रु का सामना करने के लिए लाठी चलाना, भाला चलाना एवं मल्ल युद्ध भी एक कला की तरह विकसित हो, व्यक्तित्व विकास के लिए अनिवार्य माना गया।


15वीं शताब्दी में देश राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक विनाश के दौर से गुजर रहा था। ऐसे में सांस्कृतिक धरातल पर राष्टÑीय एकता का ज्ञान बांटते हुए चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण जीवन को आधार बना भक्तिमय नाटकों का मंचन प्रारंभ किया। चैतन्य देव की यह परंपरा बाद में जात्रा और बाउल के रूप में प्रवहमान रही। जीवन की क्षणभंगुरता का ज्ञान रखने वाले भारतीय मनीषियों ने कला में ह्यब्रह्म सत्य जगत माया दर्शनह्ण की गूढ़ धारणा भी प्रदर्शित की। कबीर, रैदास, मलूकदास एवं अनेक अनाम साधु-संतों के पद एवं लोकगीतों से होता हुआ अद्वैतभाव कलाओं में तिरोहित हो गया। बुंदेलखंड का राई नृत्य प्रस्तुति में अत्यंत शृंगारिक प्रतीत होता है किंतु इसके गीत निर्गुण भाव के हैं। ऐसी कोई ज्ञान-परंपरा नहीं जो हमारे लोक गीतों मे विद्यमान न हो। अवधी, भोजपुरी लोकगीतों में ऋतु वर्णन, महीनों की विशेषताएं, स्त्री-पुरुष मनोविज्ञान, औषधि विज्ञान, विज्ञान, धर्म, दर्शन, अध्यात्म सब मिलता है।


लोक का एक सबसे सशक्त पक्ष है कहन! समष्टि के उन्नयन के लिए, वह जो भी कहना चाहता था, उसने कहा! लोकमानस की अंतश्चेतना में व्याप्त रस कथा और गीत बन नि:सृत हुए, गाथा गायन के रूप में विकसित हुए। गान और कथा एक बिंदु पर मिल कभी लोरिकी तो कभी आल्हा बन प्रस्फुटित हुए। अवधी में राजा भर्तृहरि की कथा, श्रवण कुमार की कथा, चंद्रावली, कुसुमा के बलिदान की कथा, बुंदेली में आल्हा, जगदेव का पंवारा, रामकथा, भोजपुरी में बाबू वीर कुंवर सिंह, लोरिकी, सोरठी, ओडिशा में सत्यवादी हरिश्चंद्र, सावित्री चरित्र, छत्तीसगढ़ी में अहिमन रानी, पण्डवानी, फूल कुंवर, पंजाब में हीर-रांझा, शहीद बाबा दीप सिंह, दुल्लाभट्टी, बांग्ला में गोरखनाथ, महिपाल, गोपीचंद की कथा, ऐसी अनंत गाथाएं देश के विभिन्न अंचलों में विभिन्न बोलियों में अनंत काल से कही जाती रही हैं। जिस तरह नौटंकी सत्यवादी हरिश्चंद्र में सत्य का तप मुखरित होता है उसी प्रकार पण्डवानी के माध्यम से कृष्ण का अर्जुन को गीता का ज्ञान गुंजित होता है।


अध्यात्म भारतीय लोक-संस्कृति की आत्मा का केंद्र है। वह अध्यात्म जो मनुष्य को मनुष्यता का पाठ पढ़ाता है, वह अध्यात्म, जो विश्व मात्र के कल्याण हेतु स्वयं को उत्सर्ग करने हेतु तत्पर रहने की सीख देता है, वह अध्यात्म जो जीवन की विषमताओं को निर्मूल करने में सहायक सिद्ध होता है। कभी लोकहितकारी रामराज्य के प्रणेता मर्यादापुरुषोत्तम के माध्यम से अनाचारी राजाओं के सामने आदर्श बना प्रतिष्ठित किया तो कभी अकर्मण्य हो चले समाज को कृष्ण के माध्यम से कर्मण्येवाधिकारस्ते का मंत्र सिखाया! इन सबका संबंध मानव जीवन की सार्थकता से है, जीवन को उत्कृष्ट बनाने की दिशा में उत्तरोत्तर आगे बढ़ने की कामना में है।

लोक कलाएं अपने दायित्व के प्रति आज भी सजग हैं, इसलिए शिक्षा देते हुए आगे बढ़ती हैं। इसके लिए वे अभिव्यक्ति के मार्ग स्वयं ढूंढ लेती हैं। भारतीय समाज ने इस निधि की बहुत यत्न से रक्षा की और श्रद्धापूर्वक इसे संभाला, संवारा और आग्रहपूर्वक अगली पीढ़ी को सौंप दिया। हमारी लोक कलाएं और लोक परंपराएं हमारी थाती हैं और इन्हें संवारने, संजोने का हर यत्न सराहनीय है।

साभार:- पाञ्चजन्य