27 अगस्त - जन्म दिवस / वचन के धनी शारदाचरण जोशी

दिंनाक: 27 Aug 2018 14:59:23


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में अनेक ऐसे जीवनव्रती प्रचारक हुए हैं, जिनके जीवन की किसी घटना ने उन्हें राष्ट्रसेवा के पथ पर चलने की जीवन भर प्रेरणा दी। ऐसे ही एक प्रचारक थे श्री शारदाचरण जोशी। उन्होंने संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी को दिये वचन को जीवन भर निभाया।


शारदा जी का जन्म 27 अगस्त, 1923 को अल्मोड़ा में हुआ था। उनका पैतृक निवास उत्तरा॰चल के अल्मोड़ा में था। प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण कर वे उच्च शिक्षा के लिए काशी आ गये। वहाँ 1946 ई0 में उन्होंने प्रथम श्रेणी में कृषि विज्ञान में एम.एस-सी किया। छात्रावास में वे और श्री अशोक सिंहल एक ही कमरे में रहते थे। इसी समय वे संघ की शाखा में जाने लगे।

प्रयाग में एक बार श्री गुरुजी का प्रवास हुआ। वहाँ नवयुवक और छात्रों की बैठक में उन्होंने सबसे संघ एवं राष्ट्र कार्य हेतु समय देने का आह्नान किया। शारदा जी ने श्री गुरुजी को वचन दिया कि वे शिक्षा पूरी कर आजीवन प्रचारक के रूप में संघ की योजनानुसार कार्य करेंगे।

एम.एस-सी. करने के बाद वे अपने पिताजी के पास अजमेर गये, जो वहाँ सरकारी विद्यालय में प्राचार्य थे। पिताजी की इच्छा थी कि उनकी तरह उनका बेटा भी सरकारी सेवा करे; पर शारदा जी ने संघ कार्य करने का संकल्प ले रखा था। पिताजी की सन्तुष्टि के लिए उन्होंने कुछ समय कृषि अधिकारी की नौकरी की और फिर पिताजी से अपने संकल्प की बात की। पिताजी बड़ी कठिनाई से इसके लिए तैयार हुए। इस प्रकार नौकरी छोड़कर 1947 में शारदा जी का प्रचारक जीवन प्रारम्भ हो गया।

प्रचारक जीवन में उन्होंने हरदोई, साकेत, बुलन्दशहर आदि में संघ कार्य किया। जब विश्व हिन्दू परिषद का कार्य प्रारम्भ हुआ, तो उन्हें इस कार्य में लगा दिया गया। समय-समय पर उन्हें अनेक महत्वपूर्ण आयोजनों की जिम्मेदारी दी गयी। उन सभी को उन्होंने अपनी सम्पूर्ण योग्यता एवं क्षमता से पूरा किया। इस दौरान अधिकांश समय उनका केन्द्र आगरा रहा।

उत्तरांचल राज्य का गठन होने पर उन्हें यहीं के प्रान्त मन्त्री का काम दिया गया। 1989 में स्वास्थ्य खराब होने पर वे अल्मोड़ा में अपने छोटे भाई मुकुल जोशी के साथ रहने लगे। उनका मत था कि जब प्रवास सम्भव नहीं है, तो संगठन पर बोझ क्यों बनें ? यह सोचकर वे अल्मोड़ा आ गये।

इसके बाद भी वे निष्क्रिय होकर नहीं बैठे। श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के हर कार्यक्रम में वे अल्मोड़ा, हल्द्वानी तथा कुमायूँ क्षेत्र से कार्यकर्त्ताओं की टोली लेकर आते थे। शेष समय वे अपने निवास में ही गीता सत्संग चलाते थे। हिन्दू हित के लिए काम करने वाली सभी संस्थाओं और कार्यकर्त्ताओं में समन्वय बनाये रखने का कार्य वे अन्त समय तक करते रहे। उनके त्याग, तपस्या और प्रेमभाव के कारण उनकी बात कोई टालता नहीं था।

शारदा जी प्रारम्भ से ही दुबली-पतली काया के व्यक्ति थे; अपने भोजन, वस्त्र आदि के प्रति वे प्रायः उदासीन रहते थे। अपना आवास भी उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद को दान दे दिया। जून में स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें अल्मोड़ा के चिकित्सालय में भर्ती कराया गया। स्थानीय कार्यकर्ताओं ने पुत्र के समान पूरे मन से उनकी सेवा की; फिर भी विधि के विधान के अनुसार 84 वर्ष की सुदीर्घ आयु में 28 जून, 2007 को उनका शरीरान्त हुआ।