भुजरिया और जवारे में छिपा है, उत्तम कृषि का वैज्ञानिक महत्व

दिंनाक: 27 Aug 2018 16:04:19


भोपाल(विसंके). आजकल तो अन्न के बीज को सुरक्षित रखने तथा उसके परीक्षण के अनेक तरीके विकसित हो गए हैं | किन्तु प्राचीन काल से भारत में अगले एक वर्ष तक बीज को सुरक्षित रखने के भी तरीके थे | पहले घरों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टी की कोठियाँ बनती थी, जिसमे नीम आदि की पत्तियाँ मिलाकर उसे वायुरोधक बनाकर अलग-अलग कोठियों में बीज रखा जाता था | 


इसके साथ ही उस सुरक्षित बीज का समय-समय पर परीक्षण भी किया जाता था |

  

  1. चैत्र मास में जब बीज रखा जाता था तो अच्छा बीज किस खेत का है, उसी खेत की मिट्टी लाकर उसे घर में चैत्र नवरात्रि में देवस्थान पर लाकर उगाया जाता था | जिसे हम जुआरे कहते हैं | जिस खेत का अन्न अच्छा उगता था, उसमें से बीज के लिए तिगुना रख लिया जाता था | शेष अन्न वर्ष भर खाने के लिए रख लिया जाता था, ज्यादा होने पर बेच दिया जाता था |

 

  1. बीज का दूसरा परीक्षण सावन मास में किया जाता था, कोठियों से अन्न निकालकर कि कहीं बीज में घुन तो नहीं लगा, उसे सावन शुक्ल नवमी को खेत से महुए के पत्तों और बाँस की टोकरी में मिट्टी लाकर पुनः बोया जाता था | इसे भुजलिया/कजलिया के नाम से जाना जाता है | भाद्र कृष्ण प्रतिपदा (आज के दिन) को इन भुजलियों की शोभायात्रा धूमधाम से निकाली जाती थी | हर किसान एक-दूसरे का बीज कैसा उगा यह देख भी ले इसलिए नदी-सरोवर आदि में जुआरे धोकर उसे एक-दूसरे को भेंट दिया जाता था | लोग इसी समय बीज की अदला-बदली भी कर लेते थे |
  2. तीसरा परीक्षण बुआई के ठीक पहले शारदीय नवरात्रि में देवी जी के यहाँ सार्वजनिक रूप से जुआरा लगाने की परम्परा सदियों से है | पुनः जिस खेत में बुआई करना है उसकी मिट्टी लाकर मिट्टी के पात्र में अन्न उगाया जाता है | जिस कोठी का सबसे अच्छा उगता उसे बीज के लिए तथा बाकी को अगले चार माह भोजन के रूप में उपयोग हो जाता था |

 

आज सिद्ध भी हो चूका है कि जुआरे केंसर रोधी है | हमारे यहाँ तो सदियों से जुआरे का रस पीने की परम्परा है | नदियों-सरोवरों में जुआरे धोने के बाद उसमें से आधे जुआरे गाँव के मन्दिर में चढ़ा दिया जाता था, मन्दिर का पुजारी उसे बाँटकर रस निकालकर शाम को संध्या आरती में भगवान के चरणामृत के रूप में सबको बाँटता था | 

बीज बचाने की इस अद्भुत प्रयोगशाला को हमारे पूर्वजों ने धर्म के साथ जोड़कर उसे त्यौहार का रूप दे दिया | जिसे हम आज भी धूमधाम से मनाते आ रहे हैं | भुजलिया के इस पर्व को कुछ विद्वान भू-जल के संरक्षण से भी जोड़कर देखते हैं |