राष्ट्रीय चेतना के सचेत प्रहरी : मैथिलीशरण गुप्त

दिंनाक: 03 Aug 2018 15:20:22




भोपाल(विसंके). वैचारिकता और निष्ठाओं में राष्ट्र को लेकर घटती चिंता और क्षुद्र राजनीतिक और निजी स्वार्थों के धुएं की धुंध से सोच कुंठित हो रही हो, ऐसे माहौल में सवाल यह उठता है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को किस तरह से याद करें? तीन अगस्त 1886 को चिरगांव, झांसी में जन्मे गुप्त अपनी सादगी और सरलता के लिए जितना विख्यात रहे, उतनी ही अपनी राष्ट्रीय भावना युक्त कविताओं के लिए...उनकी रचनाओं के विशाल कैनवास पर नजर डालेंगे तो एक चीज हर जगह समाहित नजर आती है। वह है, उनकी राष्ट्र के प्रति अगाध भक्ति। राष्ट्र को लेकर उनकी चेतना पारंपरिक वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा को साथ लेकर चलती है, लेकिन जब लगता है कि करूणाभाव राष्ट्र को कमजोर कर सकता है तो वे निज गौरव के प्रति आग्रहीभाव रखने से खुद को नहीं चूकते।

मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएं ऐसी हैं, जिन्हें वैदिक सूत्रों की तरह सूक्त वाक्य के तौर पर प्रदर्शित किया जा सकता है। पिछली सदी के स्कूलों में बच्चों को प्रेरित करने के लिए सबसे ज्यादा स्कूलों की दीवारों पर किसी की रचनाओं ने बतौर सूक्त वाक्य जगह बनाई थी, वे राष्ट्रकवि गुप्त की ही रचनाएं थीं। स्कूली दीवार पर ही पहली बार आज से करीब साढ़े तीन दशक पहले पढ़ी गई यह पंक्ति किसको भाव से नहीं भर देती-

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है ।

वो नर नहीं नर पशु निरा और मृतक समान है ।।

आज राष्ट्र की अवधारणा को संकुचित करने में एक वर्ग अपनी बहुत ज्यादा ऊर्जा खर्च कर रहा है। उसे लगता है कि राष्ट्र की अवधारणा को खंडित किए बिना देश का विकास नहीं हो सकता। एक वर्ग यह समझाने में भी जुटा है कि राष्ट्र की बजाय एक खास विचारधारा के जरिए ही दुनिया में सुख-शांति लायी जा सकती है। काश कि ऐसे लोग मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों की ओर ध्यान देते-

जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।

वो हृदय नहीं है पत्थर, जिसमें स्वदेश से प्यार नहीं।

मैथिली शरण गुप्त को सही मायने में राष्ट्रचेतना का सजग प्रहरी कहा जा सकता है। वे मानते रहे कि राष्ट्रीयता की पहली शर्त मानवता है। लेकिन राष्ट्र पर आए संकट के दौर में मानवता से बड़ी राष्ट्र को लेकर सोच होती है। अपनी कविता नर हो न निराश करो मन में राष्ट्रकवि किस तरह राष्ट्र को लेकर अपनी भावना का इजहार करते हैं, यह देखने योग्य है-

निज गौरव का नित ज्ञान रहे

हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे

मरणोत्‍तर गुंजित गान रहे

सब जाय अभी पर मान रहे

कुछ हो न तज़ो निज साधन को

नर हो, न निराश करो मन को।

राष्ट्र के प्रति सबकुछ न्यौछावर करने वाला यह कवि कितना संवेदनशील था, उनकी रचनाओं से समझा जा सकता है। लगता है कि अपने दौर में भी कुछ लोगों की नजरों में वे खटकते थे। चूंकि उनका व्यक्तित्व बेहद सरल था, रहन-सहन खान-पान में सादगी पसंद वैष्णव थे, इसलिए उस दौर के कुछ आलोचकों ने उनकी रचनाधर्मिता का मजाक भी उड़ाया था। उनके बारे में चुटकी ली जाती थी कि वे स्लेट पर मात्राएं गिन-गिनकर तुकबंदी करते हैं। चूंकि उनके आखिरी वक्त में हिंदी साहित्य में अकविता और नई कविता का दौर शुरू हो गया था, जिसमें कविता से लय गायब हो रही थी, लिहाजा गुप्त को दकियानूसी ठहराने की कोशिश हुई। पिछली पीढ़ी के प्रगतिवादी हिंदी प्रोफेसर विश्वविद्यालयों में गुप्त के इस रूप का मजाकिया पाठ भी करते रहे हैं। अगर एक पल को मान भी लें कि उन्होंने ऐसा किया तो उस कठिन राह के बारे में भी सोचा जाना चाहिए था, यह भी जानने की कोशिश की जानी चाहिए थी कि आखिर स्लेट पर मात्राएं गिनने और उसके बाद शब्दों को उनके अनुरूप स्थापित करने में कितनी साधना की जरूरत पड़ी होगी..

बहरहाल मैथिलीशरण जी का राष्ट्रीय चेतन संकुचित नहीं था। वे वसुधैव कुटुंबकम् और सर्वे भवंतु सुखिन: की अवधारणा में भरोसा करते थे..उन्होंने भारत माता के बारे में लिखा है,

भारत माता का मंदिर यह , समता का संवाद जहाँ

सबका शिव कल्याण यहाँ , पावे सभी प्रसाद यहाँ ।

जाति-धर्म या संप्रदाय का नहीं भेद-व्यवधान यहाँ

सबका स्वागत सबका आदर सबका राम सम्मान यहाँ।

मानवता के लिए गुप्त के दर्द को इन पंक्तियों में भी समझा जा सकता है,

चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,

विपत्ति विप्र जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।

घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,

अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।

तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

आज नारी सशक्तीकरण की खूब बात हो रही है। नारी को बराबरी का दर्जा देने, चूल्हा-चौका से बाहर जीवन के रणक्षेत्र में गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं देने और उन्हें आगे लाने की बात की जा रही है। मैथिलीशरण गुप्त को गुजरे पांच दशक से ज्यादा हो गया। उसके पहले ही उन्होंने बुद्ध की पत्नी यशोधरा पर रचित खंड काव्य में इस सोच को प्रदर्शित कर दिया था। बुद्ध सोते में यशोधरा और अपने नवजात पुत्र को छोड़कर महल से निकल गए थे। यह सोचकर कि कहीं उनकी पत्नी रोक न ले। लेकिन मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा अपनी सखी से पूछती है कि क्या अगर वे पूछ कर गए होते तो वह क्या उन्हें रोक लेती। भावुकता से लिपटी भारतीय नारी अपने कर्तव्यपथ से कैसे विमुख हो सकती थी...यशोधरा में गुप्त की सारी संवेदना यशोधरा के साथ है, विश्वविजयी बुद्ध के साथ नहीं। यशोधरा पूछती है,

सखि, वे मुझसे कहकर जाते .. कह,

तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते।

मैथिलीशरण गुप्त की नजर में भारत का रूप कैसा है, इसे याद करते हुए जयंती पर राष्ट्रीयता के इस सजग प्रहरी को नमन करते हैं,

भूलोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ?

फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल कहाँ?

संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?

उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है।