वर्षा ऋतु एवं स्वास्थ्य

दिंनाक: 03 Aug 2018 18:00:23


भोपाल(विसंके). ‘प्रथम सुख निरोगी काया’ जीवन की अपरिहार्य आवश्यकता है, क्योंकि इसके द्वारा ही संसार के प्रत्येक कार्य-व्यवहार सुसंगठित, सुव्यवस्थित व सहज रूप से प्रतिपादित हो सकते हैं। जहाँ मन अस्वस्थ है, तन अस्वस्थ है वहाँ पर आत्मा कैसे आरोग्यता की अवस्था में प्रतिस्थापित हो सकती है। आत्मा की निरोग्यता हेतु तन की पवित्रता एवं मन की पवित्रता आवश्यक है। और फिर मन की पवित्रता बिना पवित्र आहार के क्या सम्भव है? नहीं, इसीलिए तो पवित्रता (मन की) के अभाव में व्यक्ति का तन व मन शुद्ध नहीं हो पाता। आहार का मन पर पूर्ण रूप से प्रभाव पड़ता है। 

जिस प्रकार का आहार है उसी प्रकार का मन भी बनता है; इसलिए आहार पर विशेष ध्यान देते हुए विहार पर भी ध्यान देना चाहिए। आहार-विहार स्वास्थ्य-प्राप्ति का आधार है, इसलिए ऋतुओं पर आधारित पथ्य-अपथ्य का ज्ञान प्राप्त कर आहार ग्रहण करना चाहिए। जब ऋतु के अनुकूल हम-आप चलेंगे तभी सुन्दर स्वास्थ्य में प्रतिष्ठित हो सकते हैं। ऋतु अपने साथ परिवर्तन को लाती है और इसी परिवर्तन में हमें भी परिवर्तित होना स्वास्थ्य की दृष्टिकोण से उत्तम है। आइए अब हम वर्षा ऋतु पर चर्चा करें। वर्षा-ऋतु के लिए एक उक्ति है-

वर्षन वर्षा करत है, भरत है जल भण्डार। 

जीव-प्राणी सब झुमते, आयो पालनहार।।

इस उक्ति को देखने से ही हमें पता चल जाता है कि इस ऋतु के आने से कितनी प्रसन्नता मन में होती है। इस ऋतु को ‘पालनहार’ शब्द से सम्बोधित किया गया है। इसका मतलब है कि यह ऋतु विशेष रूप से वर्षा के द्वारा जीवों के लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ प्रदान करता है; जैसे- वन-हरीयाली, घास, फल-फूल इत्यादि।

वर्षा ऋतु के शुभारम्भ से ही मानव- मन में प्रसन्नता छाने लगती है। किसान अपने व समाज के जीवन-निर्वाह के लिए वर्षा-जल को प्राप्त कर अन्नादि का नींव डालता है। एक तरफ तीक्ष्ण गर्मी  से यह राहत दिलाता है और दूसरी तरफ भरण-पोषण हेतु आवश्यक जल प्रदान करता है, फिर भी हमें अपने स्वास्थ्य को लेकर सदैव सचेत रहना चाहिए, क्योंकि इस ऋतु के प्रारम्भ होने से कई प्रकार की समस्याएँ आ जाती हैं। 

जैसे- वर्षा ऋतु के आगमन की अन्तिम ग्रीष्म ऋतु में शरीर बहुत दुर्बल हो जाता है। साथ ही जठराग्नि भी दुर्बल हो जाती है। जब विसर्गकाल की शुरुआत होने लगती है तो इस भीषण गर्मी से राहत-सा प्रतीत होता है, चारों तरफ हरीतिमा छाने लगती है, जिससे मन बड़ा प्रसन्न रहता है, परन्तु इस वर्षा के होने से तथा जल के अम्ल विपाकवान् होने से एवं अग्नि बल के क्षीण होने से वातदोष तथा इसके कारण अन्य दोष भी प्रभावित होने लगते हैं। जैसा कहा जाता है कि लगातार वर्षा होने से जल का विपाक भी अम्लीय हो जाता है एवं धूल-धुएँ से युक्त वायु का प्रभाव भी पाचन-शक्ति के लिए नुकसानदायक हो जाता है। अतः सावधानीपूर्वक रहकर उचित आहार-विहार करें।

वर्षा ऋतु के प्रभाव से शरीर में कई रोग हो जाया करते हैं; जैसे- मलेरिया, फाइलेरिया, फोड़े-फुंसियां, डायरिया, खाज, खुजली, कास, घमोरियाँ, बुखार, पेचिश, गठिया, सन्धियों में सूजन, पामा, रोमकूप शोथ, जुकाम एवं दस्त आदि।

सुपाच्य भोजन ग्रहण करें। भोजन हल्का, ताजा व गर्म होना चाहिए। जौ, गेहूँ, लाल चावल, साठी चावल, मूँग, अरहर व उड़द की दाल, मक्का के भुट्टे लिये जा सकते हैं। सरसों, खीरा, कुल्थी भी स्वास्थ्यकर है। सब्जियों में बैंगन, परवल, कद्दू, भिण्डी, टमाटर, पपीता आदि एवं फलों में मौसमी फल आम, जामुन तथा अन्य सेवनीय फल जैसे- अनार, नाशपाती, केला, सेव आदि सभी स्वास्थ्यवर्द्धक हैं; अतः इनका सेवन किया जा सकता है।

तत्काल शक्ति प्राप्त करने के लिए मौसमी फल आम के साथ दूध का सेवन बड़ा ही उत्तम है। रोज इस ऋतु में दूध-आम लेने से  शारीरिक बल बहुत बढ़ जाता है। इस मौसम में घी, हरी धनिया, पुदीना, गुड़, सेंधानमक, दूध आदि सभी स्वास्थ्यकर हैं। 

मधु का सेवन भी इस ऋतु में अच्छा लाभ पहुँचाता है।  इसलिए खाने-पीने की चीजें बनाते समय आवश्यकतानुसार उनमें शहद अवश्य मिलायें। यह सवास्थ्य  वर्द्धक है तथा धातु को पुष्ट करने वाला होता है। शास्त्रों के अनुसार मधु त्रिदोषनाशक है। अतः वर्षाकाल में सेवन करने से यह वात तथा इससे होने वाले अन्य विकारों का भी शमन करता है। यदि लस्सी में लौंग, त्रिकुट सौंठ, पिप्पली और काली मिर्च, सेंधा-नमक/काला नमक तथा अजवायन मिलाकर सेवन करें तो पाचन शक्ति मजबूत होती है।

इसमें कुछ ध्यान देने योग्य बाते भी हैं जिसे जानना आवश्यक है। आप जो भी आहार (फल-सब्जियाँ आदि) ग्रहण करते हैं, उसमें आप ध्यान यह अवश्य रखें कि वस्तुओं में पेस्टिसाइट का प्रयोग हुआ है या नहीं। यदि कीटनाशक दवाइयों (जहर) का प्रयोग हुआ है, तो ध्यानपूर्वक उसे धोकर या गर्म जल में भिगोकर प्रयोग करें। यदि बिना कीटनाशक का प्रयोग किये हुए खाने की चीजें मिल जाए तो उसे ही लें, क्योंकि वह शरीर के लिए उत्तम है। जब न मिले तब तो बाजार में पेस्टिसाइट वाला सामान उपलब्ध है ही, उसे सावधानीपूर्वक धोकर ग्रहण करें।

 जीवन में सदैव स्वच्छता का ध्यान रखना आवश्यक है। चाहे कोई भी ऋतु हो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से स्वच्छता आवश्यक है। इस ऋतु मंे वर्षा खूब होती है, जिससे चारों तरफ वर्षा का पानी भू-मार्ग के गर्भ में जाकर वहाँ के कीट-मकोड़े, सर्प या जीव आदि को परेशान करता है, जिससे वे सभी व्याकुल होकर बाहर यत्र-तत्र शान्ति अथवा बचाव के लिए निकल आते हैं। जन्तुओं के बाहर निकलने से इस काल में वर्षा के कारण गन्दगी अत्यधिक फैलने लगती है, जिससे अनेक बीमारियाँ व अन्य समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। 

आप देखते होंगे इस काल में वर्षा होने के कारण चारों ओर गन्दगी फैल जाती है, नदी, तालाब, बावलियाँ भी धूल-मिट्टी पड़ने से मलीन हो जाती हैं। इसलिए स्वच्छता की ओर विशेष ध्यान देना आवश्यक हो जाता है। जल को उबाल कर पीना अच्छा है। या फिर त्व् का पानी या फिटकिरी व तुलसी के पत्ते आदि डालकर शुद्ध कर लें और तब पानी पीयें।

वर्षा ऋतु में सरसों के तेल का मालिश करना स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अति उत्तम है। वैसे तो तेल मालिश हर ऋतु में किया जा सकता है। इसके नियमित मालिश से शरीर हृष्ट-पुष्ट तथा निरोग रहता है, शरीर मंे तेज-कान्ति बढ़ती है। उम्र की वृद्धि भी इसके रोजाना मालिश से बढ़ता पाया गया है।

वर्षा ऋतु में साफ-सफाई का विशेष ध्यान देना चाहिए। क्योंकि इस काल में गन्दगी ज्यादा फैलती है, जिसमें कीट-मकोडे़-मच्छर आदि पनपते हैं जो घरों में घुसकर अनेक बीमारियों को फैलाने में मदद करते रहते हैं। इसलिए सफाई का ध्यान रखते हुए रात में सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग अवश्य करें। इससे बाहरी जीवों के आक्रमण से बचा जा सकता है। वस्त्र बिल्कुल साफ-सुथरा पहनें।

बरसात के मौसम में बरसाती उसी प्रकार सहायता करती है, जिस प्रकार बुढ़ापे में लकुटी सहायता करती है। इसलिए यदि बाहर जाना भी हो तो बरसाती या छतरी साथ में अवश्य रखें। बाहर निकलकर ज्यादा भींगने से कई रोग व समस्याएँ हो जाती हैं, जिसमें बरसाती आपकी सहायता करती है यानी भींगने से बचाती है। बरसाती यदि कुचालक सपोटर (छड़ी) वाला हो तो  अच्छा है।

किसी कारण वश यदि भींग गये हों, तो शीघ्र ही सूखे कपड़े से पूरे बदन को पोंछ लें, नहीं तो बीमारी होने की आशंका रहती है। 

प्रातःकाल शौचादि से निवृत्त होकर हरी-हरी घासों में नंगे पैर टहलें। इससे आँखों की रोशनी बरकरार रहेगी, साथ ही शरीर भी स्वस्थ रहेगा।

भोजन तभी करें जब भूख की अनुभूति जोरों से हो। इससे पाचन-शक्ति सुदृढ़ होती है।

अपथ्य का ज्ञान हो जाना मात्र स्वास्थ्य को प्राप्त कर लेना नहीं है बल्कि ज्ञान जो हो गया उसका क्रियात्मक रूप में आ जाय, यह आवश्यक है। इसलिए जो इस ऋतु में अपथ्य है उसका ज्ञान कर लें और जीवन में उसका उपयोग करें, फिर देखिये कि स्वास्थ्य कैसे बरकरार रहता है।

इस ऋतु में वात प्रकोपक, कड़वे, ठण्डे तथा रूखे पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इस ऋतु में स्वाभाविक रूप से वात का प्रकोप होता है, जिससे कई रोग उत्पन्न हो सकते हैं। इस ऋतु में सत्तू, पत्तेदार सब्जियाँ, चना, मटर, गोभी, करेली, सिंघाड़ा, मसूर, कटहल, आलू, चना, मटर, ककड़ी, तरबूज आदि का प्रयोग स्वास्थ्य के लिए अहितकर होता है। इसलिए आवश्यक पदार्थों का सेवन सावधानीपूर्वक उबालकर या साफ कर ही सेवन करें। तले हुए नमकीन, बेसन से बने खाद्य पदार्थ, मिर्च-मसाले सभी अहितकर हंै, इसलिए इसका सेवन इस ऋतु में उत्तम नहीं है। बिना उबला हुआ अथवा अस्वच्छ पानी भी न पीयें। बासी भोजन का भी परित्याग करें।


मच्छर इस काल में अधिक पनपते हैं, इसलिए सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग अवश्यक करें। दिन में कभी भी न सोयें । यदि तबीयत खराब हो जाय तो आराम करना उचित है। दिन में सोना स्वास्थ्य की दृष्टि से अनुचित है। यदि रात्रि में या फिर वर्षाकाल में ओस गिरे तो ओस गिरते समय नहीं घूमना चाहिए। यह भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।

वर्षाकाल में विषैले कीड़े-मकोडे़, सर्प-बिच्छू आदि पानी के भरने के कारण सूखा स्थान खोजते हैं तथा इधर-उधर घूमते रहते हैं। इसलिए साथ में टार्च का प्रयोग अवश्य किया करें। रात के समय यही आपका साथी है। यह आपके जीवन की रक्षा रात में बाहर घूमने वाले विषैले जीवों से करता है। रात के समय वर्षा के प्रभाव से प्रभावित होकर कई विषैले जीव बाहर घूमते रहते हैं, जिसमें सावधानी न बरतने से विषैले जीव के काटने से मृत्यु तक होने की सम्भावना बनी रहती है। इसलिए टार्च का साथ रात में न छोड़ें।

वर्षा ऋतु में नीम की पत्तियों के साथ अथवा मच्छर को भगाने वाले औषधियों के साथ यज्ञ करना उत्तम है। यज्ञ से धुआँ जो उठता है उससे वातावरण शुद्ध हो जाता है, जिससे आस-पास के विषैले पदार्थ, तत्त्व व जीवों के प्रभाव से हमारा बचाव होता है। 

मच्छर का प्रकोप भी इससे नहीं हो पाता। इसलिए यज्ञ करना प्रतिदिन उत्तम है। इससे वातावरण भी शुद्ध हो जाता है साथ में हमारा मानसिक तथा शारीरिक विकास भी होता है। इसमें नीम की पत्तियों को जलाकर धुआँ भी किया जा सकता है। यह धुआँ मच्छरों से हमें बचाता है। इस ऋतु में मच्छर ज्यादा पनपते हैं, जिससे टाइफाइड, मलेरिया आदि रोग होने का डर-भय रहता है। इसलिए गन्दे जल से हमें बचना चाहिए तथा खाद्य-पदार्थों को यथा उचित स्थान में ढँककर रखना चाहिए।

तीखा खट्टा चटपटा, मनवा माँगे खाय।

सोइ मनबस परबस रहे, रोग देह में आय।।

    -आरोग्यातामृत