वामपंथ के शिकार बने प्रेमचंद ने दुखी होकर छोड़ा था मुंबई

दिंनाक: 06 Aug 2018 16:55:40


भोपाल(विसंके). कुछ तो वजह रही होगी, कोई यूं ही बेवफा नहीं होता। प्रेमचंद जैसा लेखक यह कहने को मजबूर हो गया कि अगर तुम मेरी इज्जत करते हो तो इस फिल्म को कभी मत देखना। संकेत यही है कि कथानक से उनकी मर्जी के विपरीत खिलवाड़ किया गया होगा। कहा जाता है कि कि जिस तरह से बेहतरीन सृजन के लिए साहित्यकार का उच्च कोटि का होना आवश्यक है उसी तरह से बेहतरीन कृतियों के साथ न्याय कर पाने की क्षमता के लिए फिल्मकार का भी समर्थ होना आवश्यक है। लेकिन प्रेमचंद की कृतियों के साथ तो हृषिकेश मुखर्जी और सत्यजीत रे जैसे महान फिल्मकार भी न्याय नहीं कर सके। एम. भावनानी और नानूभाई वकील और त्रिलोक जेटली तो नहीं ही कर पाए। सत्यजीत रे ने भी प्रेमचंद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' पर इसी नाम से फिल्म बनाई थी तो उसका अंत बिल्कुल बदल दिया था। उस वक्त भी इसको लेकर अच्छा-खासा विवाद हुआ था और साहित्यिक हलके में इस पर लंबी बहस हुई थी कि फिल्मकारों को साहित्यिक कृति के साथ कितनी छूट लेने का अधिकार है। प्रेमचंद के जीवित रहते भी उनकी कुछ कृतियों पर फिल्में बनी थीं जिसको लेकर वे बहुत खिन्न रहा करते थे। क्या वजह थी कि प्रेमचंद अपनी कृतियों पर बनने वाली फिल्मों को लेकर खिन्न रहा करते थे।

 प्रेमचंद के उपन्यास गोदान पर बनी फिल्म के पोस्टर में राजकुमार


गुरुवर रवींद्रनाथ ठाकुर ने 1929 में शिशिर कुमार भादुड़ी के भाई मुरारी को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने सिनेमा और साहित्य पर अपने विचार प्रकट किए थे। ठाकुर ने लिखा था, ''कला का स्वरूप अभिव्यक्ति के माध्यम के अनुरूप बदलता चलता है। मेरा मानना है कि फिल्म के रूप में जिस नई कला का विकास हो रहा है वो अभी तक रूपायित नहीं हो पाई है। हर कला अपनी अभिव्यक्ति की स्वाधीन शैली अपने रचना जगत में तलाश लेती है। सिनेमा के लिए सृजनशीलता ही काफी नहीं है, उसके लिए पूंजी भी आवश्यक है और सिनेमा में बिंबों के प्रभाव के माध्यम से अभिव्यक्ति को पूर्णता प्राप्त होती है।'' ठाकुर की राय से काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है। हिंदी के अप्रतिम कथाकार निर्मल वर्मा ने यतींद्र मिश्र को दिए एक साक्षात्कार में कहा था, ''इतिहास के साथ हम कैसा संबंध बना पाते हैं, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर मुझे झांसी वाली रानी का चरित्र बहुत गहरे तौर पर लगता है कि प्रासंगिक है, जैसे-उसने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। आज यदि मैं उसे परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से अपनी कहानी में लाता हूं तो कोई हर्ज की बात नहीं है। कोई मुझे नहीं कहेगा कि वो अस्पृश्य है आपके लिए। यह आपकी किस्सागोई में बाधा डालेगी। लेकिन अगर मैं झांसी की रानी या शिवाजी या महाराणा प्रताप या किसी भी इतिहास के हिस्से को अपने पूर्वाग्रहों को प्रक्षेपित करने का साधन या माध्यम बना लेता हूं तो लोग कहेंगे-भई! इससे अच्छा तो सीधे इतिहास ही पढ़ते, आपका उपन्यास पढ़ने की क्या जरूरत थी, क्योंकि ये सब चीजें तो इतिहास में उपलब्ध हैं। एक उपन्यासकार इतिहास के तत्वों को इस तरह से रूपांतरित करता है वह इतिहास से भी ज्यादा हमें मानवीय सत्य की ओर उन्मुख लगता है। इतिहास तो तथ्यात्मक सत्य है। उस हकीकत को कल्पना में डालकर बेहतर परिप्रेक्ष्य में मानवीय सत्य में परिणत कर पाना ही एक उपन्यासकार की सबसे बड़ी चुनौती है। अगर वह इसे कर पाता है तो, मैं समझता हूं कि वह टॉलस्टॉय की तरह है जिसने 'वॉर एंड पीस' जैसा महान उपन्यास लिखा।'' निर्मल की कई पंक्तियों से या उसमें उपयोग किए गए शब्दों से इस बात के पर्याप्त संकेत मिलते हैं कि प्रेमचंद जैसे लेखक क्यों फिल्मों से दुखी हो जाते थे।


 

प्रेमचंद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' पर बनी फिल्म का एक दृश्य


दरअसल, हिंदी फिल्मों का साहित्य से लंबा जुड़ाव रहा है। कई लेखक साहित्य के रास्ते फिल्मी दुनिया में पहुंचे थे। प्रेमचंद से लेकर विजयदान देथा की कृतियों पर फिल्में बनीं। कइयों को शानदार सफलता और प्रसिद्धि मिली तो ज्यादातर बहुत निराश होकर लौटे । प्रेमचंद, अमृत लाल नागर, उपेंद्रनाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकार भी फिल्मों से जुड़ने को आगे बढ़े थे, लेकिन जल्द ही उनका मोहभंग हुआ और वे वापस साहित्य की दुनिया में लौट आए। क्यों सुमित्रानंदन पंत जैसे महान कवि के लिखे गीतों को फिल्मों में सफलता नहीं मिल पाई, क्यों गोपाल सिंह 'नेपाली' जैसे ओज के कवि को फिल्मों में आंशिक सफलता मिली। क्यों राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी जैसे शब्दों के जादूगर फिल्मों में अपनी सफलता का डंका बजाते हुए लंबे वक्त तक कायम नहीं रह सके। राजेंद्र यादव की जिस कृति 'सारा आकाश' पर उसी नाम से बनी फिल्म को समांतर हिंदी सिनेमा की शुरुआती फिल्मों में शुमार किया जाता है। वे राजेंद्र यादव बाद के दिनों में फिल्मों से विमुख क्यों हो गए? अपनी साहित्यिक कृतियों में लेखक अंतिम होता है और उसकी ही मर्जी चलती है, वह अपने हिसाब से कथानक को लेकर आगे बढ़ता है लेकिन फिल्मकार कहानी तो उठा लेते हैं लेकिन कथानक में अपने हिसाब से बदलाव करते चलते हैं। इस बदलाव की वजह से ही विवाद होते रहे हैं।


इस बात पर हिंदी जगत में व्यापक और गंभीर विमर्श नहीं हुआ है कि सिनेमा और सिनेमा लेखन को लेकर हिंदी के साहित्यकार इतने उदासीन क्यों रहते हैं? किस वजह से सिनेमा के लिए गीत लिखने वालों को हिंदी के कवियों में शुमार नहीं किया जाता? वह कौन-सी वजह है कि कविता की दुनिया में गुलजार को वह स्थान हासिल नहीं होता है जो कुंवर नारायण या केदारनाथ सिंह को हासिल है? प्रसून जोशी को हिंदी साहित्य की दुनिया में वह प्रतिष्ठा हासिल नहीं हो पाती जो अरुण कमल या राजेश जोशी जैसे कवियों को मिली हुई है।

यह सूची और भी लंबी हो सकती है लेकिन हमारा मकसद नामों को गिनाना नहीं है, बल्कि उन स्थितियों को रेखांकित करना है जिसमें प्रेमचंद जैसे लेखकों का भी सिनेमा जगत में आदर नहीं होता है। तमाम तकनीकी दिक्कतें होंगी लेकिन सबसे बड़ा संकट जो नजर आता है वह है आजादी के पहले और उसके बाद भी हिंदी सिनेमा पर एक खास विचारधारा के लोगों का लगभग कब्जा। अगर कब्जा शब्द से परहेज हो तो हम दबदबा या बोलबाला कह सकते हैं। साहित्य जगत पर तो रहा ही। तो जो भी लेखक या कवि या गीतकार उनके मन के हिसाब से नहीं चलता था तो उन्ाको बाहर का रास्ता दिखाने का षड्यंत्र रचा जाता था। इसके अलावा एक और दिक्कत थी जिसका जिक्र करने से विरोधाभासी बातें कहने का खतरा उत्पन्न हो सकता है लेकिन तमाम तरह के खतरे उठाकर कहना आवश्यक है। साहित्य जगत में वामपंथी विचारधारा के दबदबे की वजह से फिल्म और साहित्य के रिश्ते लंबे समय तक बेहतर नहीं हो सके। एक उदाहरण देना चाहूंगा- चंद वर्ष पूर्व अमिताभ बच्चन के हाथों से ज्ञानपीठ पुरस्कार दिलाया गया था। उस वक्त हिंदी के साहित्यकारों ने घोर आपत्ति जताई थी कि हिंदी फिल्मों में नाचने-गाने वाला कलाकार हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक को सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार देने योग्य कैसे हो गया। दरअसल, यह हिंदी के शुद्धतावादी लेखकों की कुंठा है जो किसी ना किसी रूप में प्रकट होती है। सबसे पहले यह सवाल हिंदी के वामपंथी आलोचक वीरेंद्र यादव ने सोशल नेटवकिंर्ग साइट फेसबुक पर उठाया। वीरेंद्र यादव ने उस वक्त फेसबुक पर लिखा था, ''हिंदी के दो शीर्ष लेखकों श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने का समाचार इन दिनों सुर्खियों में है। फिलहाल इस बात से ध्यान हट गया है कि ज्ञानपीठ में अब अमिताभ बच्चन का दखल हो गया है। शहरयार को अमिताभ बच्चन ने यह पुरस्कार दिया है। यानी अब मूर्धन्य साहित्यकार का बॉलीवुड के ग्लैमर से महिमामंडन। जिस सम्मान को अब तक भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और नेल्सन मंडेला जैसी विभूतियां देती रही हों उसकी यह परिणति दयनीय नहीं है।'' वीरेंद्र यादव वही आलोचक हैं, जिन्हें अखिलेश यादव से पुरस्कार लेने में परहेज नहीं है लेकिन रमण सिंह सरकार के साहित्य आयोजन पर आपत्ति होती है। सवाल आपत्तियों का नहीं है, बल्कि उस मनोदशा का है जो सिनेमा के कलाकारों को हेय दृष्टि से देखती है।


 

प्रेमचंद की कहानी पर बनीं सत्यजीत राय की फिल्म का एक दृश्य 


हिंदी के एक और लेखक हैं अशोक वाजपेयी, जिनका दायरा किसी भी अन्य लेखक से बड़ा है, उन्होंने भी अमिताभ बच्चन के हाथों ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने को संस्थान की एक दयनीय कोशिश करार दिया है। अशोक वाजपेयी ने अपने साप्ताहिक स्तंभ में लिखा, ''यह समझना मुश्किल है कि अब अपने को सिनेमाई चमक से जोड़ने की जो दयनीय कोशिश भारतीय ज्ञानपीठ कर रहा है, उसका कारण क्या है।'' अशोक वाजपेयी को यह समझना होगा कि ज्ञानपीठ की यह कोशिश अपने को सिनेमाई चमक से जोड़ने की नहीं, बल्कि हिंदी के बड़े लेखक को एक बड़े कलाकार के हाथों सम्मानित करवाने की हो सकती है। मुझे नहीं मालूम कि ज्ञानपीठ की मंशा क्या थी। वह सिनेमाई चमक से जुड़कर क्या हासिल कर लेगी। इस मंशा और वजह को अशोक वाजपेयी बेहतर समझते होंगे। अशोक के मुताबिक ज्ञानपीठ का किसी अभिनेता को बुलाने का निर्णय किसी कलामूर्धन्य को बुलाने की इच्छा से नहीं जुड़ा है, क्योंकि ऐसी इच्छा के ज्ञानपीठ में सक्रिय होने का कोई प्रमाण या परंपरा नहीं है । अमिताभ का हिंदी के विकास में जो योगदान है उसे अशोक वाजपेयी के तर्क नकार नहीं सकते। अमिताभ बच्चन ने हिंदी के फैलाव में जिस तरह से भूमिका निभाई, उसको बताने की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन उनके आलोचकों को वह भी दिखाई नहीं देता। अमिताभ बच्चन हिंदी फिल्मों के एकमात्र कलाकार हैं जो हिंदी में पूछे गए सवालों का हिंदी में ही जवाब देते हैं। अशोक वाजपेयी को अमिताभ बच्चन के हाथों ज्ञानपीठ पुरस्कार दिलाने पर तो आपत्ति है, लेकिन जब हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश को योगी आदित्यनाथ अपने कर कमलों से पुरस्कृत करते हैं तो वाजपेयी चुप रह जाते हैं। यह उसी तरह की बात है जब आप बाजार का विरोध करते हैं और बाजार में अपनी पुस्तकें बेचने का उपक्रम भी करते हैं।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 साभार:- पाञ्चजन्य