असम ही नहीं, पूरे देश में एनआरसी लागू हो – अवधेश भदौरिया

दिंनाक: 08 Aug 2018 16:29:47


भोपाल(विसंके). असम में हाल ही में लागू हुए एनआरसी को लेकर पूरे देश में हलचल मची हुई है। सियासी पार्टियों के सिपहसालार पूरे दम-खम से सरकार के इस साहसिक कदम का विरोधकर, सरकार को खूब खरी-खोटी सुनाने में लगे हुए है। सबसे ज्यादा आक्रामक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी नजर आ रही है। उनको ड़र है कि अगर केंद्र सरकार ने एनआरसी पश्चिम बंगाल में लागू कर दिया तो राज्य में अवैध रुप से रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों की नागरिकता खतरे में पड़ सकती है। जिसके चलते उनका बड़ा वोट बैंक, वोट देने के अधिकार से वंचित हो सकता है। ममता बैनर्जी तो इस कदर बैचेन है कि उन्होने देश में सिविल वार तक की धमकी दे ड़ाली।


असम में एनआरसी ड्राफ्ट फाइनल होने के बाद लगभग 40 लाख लोग अवेध पाए गए। पूरा देश इस बात को भली-भाँती जानता है कि बगलादेशी घुसपैठिये देश के कोने-कोने में पहुँच चुके है। जिससे देश में अनेकों प्रकार की समस्यायें पैदा हो रही है। देश का सामाजिक तानाबाना घुसपैठ के कारण बहुत बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। यदि भाजपा को छोड़ दे, तो कोई भी सियासी दल इस गंभीर समस्या पर बोलने को तैयार नहीं है। देश में  घुसपैठ करके ये लोग बड़ी आसानी से पहचान पत्र पा लेते है और वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वा लेते है और इन पार्टियों के लिए एक बड़े वोट बैंक बनकर उभर रहे है। राजनीतिक सरंक्षण के चलते ये लोग देश में खूब फल-फूल रहे है और देश के मूल निवासियों के लिए नाना प्रकार की परेशानियां पैदा कर रहे है।

उधर, बगलादेश इस घटना के बाद काफी सतर्क हो गया है। इन घुसपैठियों को अपना देश का नागरिक मानने से साफ इंकार करते हुए वह इसे बांग्लादेश का आंतरिक मामला बता रहा है।  

असम की तर्ज पर अब पूरे देष में एनआरसी की मांग उठने लगी है। एक आंकडे़ के अनुसार, केवल पश्चिम बंगाल में एक करोड़ से अधिक बंगलादेशी घुसपैठियें रह रहे है, जोकि मूलरूप से ममता बैनर्जी की तृणमूल कांगे्रस के वोटर माने जाते है। यदि पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया लागू हुई तो निष्चत रूप से ममता बैनर्जी की मुष्किलें बड़ जाएगी।

वर्तमान में सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि राजनैतिक पार्टियाँ इस तरह की कार्यवाही को सियासी नजरियें से न देखे बल्कि इस पर गंभीरता से विचार करे कि ये घुसपैठियें हमारे देष में कई गंभीर समस्याओं के लिए जिम्मेदार है जिनमें बेरोजगारी और सामप्रदायिक दंगे प्रमुख रूप से शामिल है। राजनैतिक दलों को इस बात को समझना चाहिए कि इन घुसपैठियों को शरण देना देश के एक और विभाजन को न्योता देना जैसा है। आजादी के समय हुए विभाजन को हम आज तक नहीं भूले है। काष्मीर समस्या इस समय विकराल रुप धारण किए हुए है। कष्मीर पंड़ित आज भी देश में विस्थापितों की तरह जीवन जी रहे है। वहीं वर्मा से पलायन करके आए रोहिग्याओं ने मुसीबतों का एक नया मोर्चा तैयार कर दिया है। ओवेसी जैसे नेताओं ने तो इन रोहिग्याओं के लिए संरक्षण तक की मांग कर डाली ताकि इन्हें भारत में बसाकर नया वोट बैंक तैयार कर सके।

इस कठिन समय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उम्मीद है कि असम की तर्ज पर पूरे देष में एनआरसी प्रक्रिया को लागू करने का जोखिम उठाए, खासतौर से उन पांच राज्यों में जो कि बगलादेश की सीमा से लगे हुए है। लगभग 4096 किमी लंबी भारत-बागलादेश सीमा देष के पांच राज्यों पषिचम बंगाल, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम और असम से लगी हुई है।  असम के बाद प्रथम चरण बाकी बांग्लादेश सीमा से लगे राज्यों में यह प्रक्रिया तुरंत लागू होनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर बांग्लादेश सीमा को इतना चाक चैबंध करना चाहिए कि कोई भी घुसपैठिया आसानी से देश की सीमा में प्रवेश न कर पाए जोकि आने वाले समय में देश की एकता-अखंड़ता को अक्षुण बनाए रखने के लिए जरूरी है।