लोक परंपरा, लोकगीतों को सहजें : श्री पवैया

दिंनाक: 12 Sep 2018 14:54:46


भोपाल(विसंके).  उच्चशिक्षा मंत्री श्री जयभान सिंह पवैया ने शिक्षाविद और प्रबुद्धजनों से आव्हान किया कि वे लोक परंपरा, लोकगीतों को सहजने के लिए प्रयास करें| ये प्राय: लुप्त होते जा रहे हैं| हमारी संस्कृति में प्राथक्य के बीज बोये जा रहे है और बाँधने का संस्कार दूर होता चला जा रहे है|


 

       श्री पवैया आज मेपकास्ट के विज्ञानं भवन में दत्तोपंत ठेंगडी शोध संस्थान, संस्कृति विभाग, म.प्र. द्वारा 'मध्यवर्ती भारत : नये आयाम (इतिहास -संस्कृति एवं जनजातीय परम्पराएं)' आयोजित संगोष्ठी के शुभारम्भ सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे| उन्होंने कहा कि आज मध्यवर्ती भारत की लोक परम्पराओं को सहेजने की जरूरत है। जनजाति समुदाय ने अपने संस्कृति को आज भी बचाकर रखा है। विश्व में जो देश अपनी संस्कृति व इतिहास पर गौरव नहीं करते, उनका पतन निश्चित ही हुआ है। जापान में जब संकट आया तब राजा के आह्वान पर बड़ी आबादी ने अपने सोने जड़ित दांत राज्य को समर्पित कर दिए। भारत में आज तोड़ने वाली शक्ति प्रबल हो रही है। ऐसे में नागरिकों में राष्ट्र चेतना का प्रबल होना जरूरी है।

       उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक महत्व का पता इस बात से लगता है कि महाभारत काल में भगवान कृष्ण अपने गुरु सांदीपनी से ज्ञान प्राप्त करने मध्य भारत मे आये। रामायण मे जब भगवान राम ने अपने भाइयों के पुत्रों में राज्य बंटवारा किया तब शत्रुघ्न के पुत्र को विदिशा राज्य दिया। उन्होंने कहा कि वनवासी समुदाय ने अपने लोक गीतों, बोलियों, परम्परा, संस्कृति, जीवन शैली को आज भी सहेज कर रखा है। जनजाति समुदाय के भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी का अंदाजा बिरसा मुंडा, टंट्या भील के आंदोलन, संथाल क्रांति से लगाया जा सकता है।

       संगोष्ठी में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में बोलते हुए लोक एवं जनजातीय अध्येता और प्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद् के पूर्व निदेशक डॉ. कपिल तिवारी ने कहा कि जनजातीय संस्कृतियों और परंपराओं के जीवंत अध्याय को इतिहास के रूप में नहीं समझा जा सकता। इतिहास की पश्चिमी दृष्टि में जीवन के सार को दर्ज करने की बजाय समय को महत्व दिया जाता है। हमारा इतिहास लेखन पश्चिम दृष्टि से लिखा गया, जो विभेदकारी है। पश्चिम शैली से लिखे भारत के इतिहास ने हमें अपने से ही ग्लानी पैदा कर दी। आज इतिहास को भारत के मूल, दृष्टि, परम्परा से समझने की जरूरत है। भारत की परम्परा को अपनी आंखों से देखने की जरूरत है। स्थानीय व जनपदीय परम्पराओं के समझे बिना भारत मे इतिहास की कल्पना असंभव है।

       संगोष्ठी में दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश मिश्रा ने स्वागत भाषण दिया और दो दिवसीय संगोष्ठी की रुपरेखा प्रस्तुत की| उन्होंने बताया कि मध्यवर्ती भारत समरस, अनूठा, सकारात्मक और विविधताओं से भरा क्षेत्र रहा है| यहाँ विविध परम्पराएँ फली-फूली, लेकिन समय के साथ अनेक भ्रम उत्पन्न हो जाते है और तथ्यों से छेड़छाड़ हो जाती हैं| कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति,  इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विषयों के जानकार, प्राध्यापकगण, अध्येता, शोधकर्ता उपस्थित रहे। सत्र का संचालन डॉ मनीषा शर्मा ने किया और आभार संस्थान से सचिव श्री सुधीर दाते ने माना|

       हमारी संस्कृति में आध्यात्मिक, दार्शनिक ताकत मौजूद: संगोष्ठी के पहले तकनीकी सत्र में 'वर्तमान मध्यप्रदेश का भौगोलिक-नृजातीय पुरातात्विक सांस्कृतिक प्रवाह' विषय पर चर्चा करते हुए इतिहासकार और प्राध्यापक डॉ हंसा व्यास ने कहा के जींस और पश्चिमी गानों को अपनाने के बाद भी आज लड़कियां मंदिरों में जाती है, व्रत रखती है| ये दर्शाता है कि आज भी हमारी संस्कृति नहीं बदली| संस्कृति के आयाम बदले है परन्तु मूल पूजा पद्धति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ| भारतीय संस्कृति के धारा अविरल बह रही रही है| प्रख्यात पुरातत्वविद डॉ नारायण व्यास ने शैल चित्रों को लेकर कहा कि विश्व भर में शैल चित्रों का सबसे बड़ा भंडार मध्य प्रदेश में है और रायसेन जिले में सर्वाधिक 55 शैल चित्र मिले हैं| सत्र की अध्यक्षता करते हुए रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर, के जनजाति विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ शिवकुमार तिवारी ने कहा कि भारत की संस्कृति बद्धमूल रही हैं लेकिन अंग्रेजों ने बादशाह बनने के बाद विष बोने के उद्देश्य से यहाँ का इतिहास लिखा और दुर्भाग्य से आजादी के बाद सरकारों ने उसी को आगे बढ़ाया|

       संस्कृति के गौरवशाली पहलू सामने लाए: दूसरे सत्र में 'मध्यवर्ती क्षेत्र की राजनीतिक निरन्तरता व सांस्कृतिक स्वरूप का विश्लेषण' विषय पर बोलते हुए रानी दुर्गावती विवि, जबलपुर के प्राध्यापक डॉ. एस. एन. मिश्र ने कहा कि आज की जो गतिविधियाँ है वो कल आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कृति होगी। संस्कृति को सहेजने व उसके गौरवशाली पहलू को सामने लाने की जरूरत है। सत्र की अध्यक्षता कर रहे भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के सदस्य डॉ रहमान अली ने 'महाजनपदीय अस्मिता एवं समकालीन समाज जीवन, संस्कृति' विषय कहा कि 7वीं सदी के बाद मध्य भारत में छोटे-छोटे नये राज्य बने| सभी स्थानों पर मंदिर निर्माण कराये गए| इन मंदिरों के निर्माण में कारीगरी करने वाले अधिकतर लोग वनवासी समुदाय से संबंधित थे। आज मध्यप्रदेश के लोगों को अपनी इस अद्वितीय मंदिर निर्माण व धार्मिक विशिष्टता पर गौरव करना चाहिए।