सर्वसमावेशी संघ : समय के साथ आगे बढ़ता - आशीष अंशु

दिंनाक: 17 Sep 2018 14:58:33

 भोपाल(विसंके). चन्द्रभान प्रसाद ने यह बात दलित समाज को लेकर कही थी। दलित चिन्तकों ने दलितों को जहां वे खड़े हैं, उससे बीस साल पीछे धकेल दिया है। दलित चिन्तक दलितों को लेकर इतने चिन्तित है कि उन्हें यकिन ही नहीं होता कि दलित आगे बढ़ रहा है। इस दुख में उसे वे मुड़ - मुड़ कर पीछे तलाश रहे होते हैं। वह तो आगे निकल चुका है। चिन्तक सोचते हैं- आय हो दादा, ई तो इतना पीछे रह गया कि नजर ही नहीं आ रहा है।

ऐसा ही कुछ-कुछ जब आरएसएस  संबंधित मामलों के कम्यूनिस्ट जानकार लिखते-पढ़ते-बोलते हैं तो मुझे महसूस होता है। वह जिस आरएसएस की बात लिख-पढ़ रहे होते हैं संभव है कि वह 1925 से 47 तक का आरएसएस हो। सन 2000 के बाद का आरएसएस तो वह बिल्कुल नहीं है। कथित बुद्धीजीवियों की यह समस्या है कि वे किताबों और संदर्भो में हर समस्या का समाधान तलाशते हैं और जीए हुए कि जगह लिखे हुए पर अधिक विश्वास करते हैं। इससे होता यह है कि उनके हाथ एक किताब लगती है, 'द बंच आॅफ थॉट' जिसका लेखक वे एमएस गोलवरकर को बताते हैं। जबकि इस नाम से कोई किताब एमएस गोलवरकर ने नहीं लिखी। यकिन से लिख रहा हूं, यह किताब आरएसएस के प्रचारक और स्वयंसेवकों से अधिक कम्यूनिस्टों के बीच लोकप्रिय है। 'द बंच आॅफ थॉट' नाम की किताब 1966 में प्रकाशित हुई थी। मतलब पचास से अधिक साल हो गए प्रकाशित हुए। एक संगठन जो बाल्य अवस्था में था। अब तरूण हो गया। इन पचास सालों में आरएसएस में किन—किन स्तरों पर बदलाव हुए। ऐसा कोई अध्ययन मुझे कम्यूनिस्ट पत्रकारों में आरएसएस जानकार होने का दावा करने वालों के लेखनी में नहीं मिला। कुल मिलाकर आज भी जब वे लिख रहे हैं, बंच आॅफ थॉट एक बार पूरे लेख में आ ही जाता है। वास्तव में उन्हें आरएसएस पर बात करते हुए बंच आॅफ थॉट को उद्धृत करना आसान लगता है।

यह आज इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि आरएसएस का इतिहास जब लिखा जाएगा, उसमें 17—18—19 सितम्बर 2018 की तारिख एक महत्वपूर्ण तारिख के तौर पर दर्ज होगी। ऐसा मेरा अनुमान है। जिनकी रूचि आरएसएस में सहमति—असहमति के स्तर पर है, सब लोग टेलीविजन और मीडिया पर नजर बनाए रखिए। सन 2018 में जिस तरह के बदलाव मैने संगठन के स्तर पर आरएसएस में महसूस किया, उसके लिए शब्द नहीं मिल रहा था। इसे एक शब्द में क्या कहूं? 

धनबाद के एक मित्र से जब बात हो रही थी, उन्होंने इसके लिए एक शब्द दिया— समावेशी। वास्तव में आरएसएस अपने नए स्वरूप में नित नित नए बदलाव के साथ समाज समावेशी हो रहा है। आने वाले तीन दिनों में मेरा अनुमान है कि यह आप सबके लिए स्पष्ट हो जाएगा कि आरएसएस ने अपने आप को कितना बदला है। या फिर आरएसएस ऐसा ही सोच रहा था और यह सोच सिर्फ उनके अपने कैडर तक सीमित थी। उसका प्रचार करने की आवश्यकता उन्हें नहीं थी लेकिन जिस तरह का दुष्प्रचार आरएसएस को लेकर लगातार दशकों से चलता रहा है, उसके बाद आरएसएस को लगा हो कि समाज के बीच में आकर बात करनी चाहिए। 

आरएसएस को लेकर आरक्षण, आदिवासी, मुसलमान, क्रिश्चियन, कन्वर्जन जैसे मुद्दों को लेकर दर्जनों सवाल पत्रकारों के पास रहते ही हैं। समाज भी इन मुद्दों पर आरएसएस का स्टैन्ड जानना चाहता है। आरएसएस ने कभी सार्वजनिक तौर पर इस तरह के मुद्दों पर चर्चा नहीं की। 

आने वाले तीन दिनों में मेरा अनुमान है आरएसएस को लेकर इस तरह के मुद्दों पर पड़ी बहुत सारी धूल साफ होगी। आरएसएस को लेकर कम्यूनिस्टों द्वारा फैलाए भ्रमजाल की वजह से देश के करोड़ो लोग आरएसएस से एक दूरी बनाकर खड़े हैं। संभव है कि आने वाले ​तीन दिनों में यह दूरी कम हो और वे कन्फर्टेबल हों। देश का क्रिश्चियन, मुसलमान, दलित, आदिवासी समाज आरएसएस के पास सहजता पूर्वक आए। क्योंकि देश से जिन्हें प्रेम होगा। वह आरएसएस को कैसे इनकार करेगा?

वैसे इस बात में दो राय नहीं है कि आरएसएस को समझने के लिए उसकी शाखा का कोई विकल्प नहीं है। वहां कोई भी जा सकता है। हिन्दू- मुसलमान-क्रिश्चियन कोई भी। वहां नामांकन नहीं होता। किसी को आने से रोका नहीं जाता तो आप कभी से शुरूआत कर सकते हैं और किसी भी दिन जाना बंद कर सकते हैं।