यहूदी से हिंदू बनने की मेरी यात्रा – डेना मरियम

दिंनाक: 24 Sep 2018 15:08:40


जब मैं सोचने लगती हूं कि हिंदू होने का मतलब आखिर क्या है, तो यही पाती हूं कि यह धर्म आधारित जीने का तरीका है। यह दुनियाभर के नियम निर्देशन के अनुरूप है। यह हमें ब्रह्मांड और खुद के साथ सामंजस्य बैठाने में मदद करता है. 


मेरा जन्म न्यूयॉर्क के एक पंथनिरपेक्ष यहूदी परिवार में हुआ। हमारे लिए यहूदी होना पांथिक से कहीं ज्यादा जातीय पहचान भर था। बचपन से ही मेरा धर्म की ओर काफी झुकाव था, लेकिन मेरे परिवार ने मुझपर किसी तरह की कोई अवधारणा नहीं थोपी और आध्यात्मिक दुनिया को खुद से जानने-समझने के लिए मुझे मुक्त छोड़ दिया। मैं छोटी उम्र से ही ईश्वर को मां रूप में देखने लगी थी और इस तरह 'देवी' की मेरी खोज शुरू हुई। पिछले जन्मों की धुंधली सी यादें बचपन में मेरे साथ रहीं और इस कारण मैंने पुनर्जन्म को केवल अवधारणा के तौर पर नहीं, बल्कि अनुभूत सचाई रूप में लिया।

मेरे जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब मैं कॉलेज में थी। एक दोस्त ने मुझे परमहंस योगानंद की पुस्तक 'द ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी' भेंट की और मुझे जैसे जीवन की दिशा मिल गई। मैंने उन्हें तुरंत अपना गुरु मान लिया। हालांकि परमहंस जी का देहावसान पहले ही हो चुका था, लेकिन उनके साथ एक मजबूत आत्मिक रिश्ता बन गया। उन्होंने मुझे ध्यान और वेदों की ओर प्रेरित किया और धीरे-धीरे वैसी बहुत सी बातें जिन्हें मैं केवल अंत:दृष्टि से जानती थी, एक-एक कर प्रमाणित होती चली गईं। सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्होंने मुझे देवी मां के विभिन्न रूपों से परिचित कराया। तभी से मैं खुद को हिंदू मानने लगी। जब मैंने देवी की आराधना शुरू की, मुझे इस बात का दुखद भान हुआ कि देवी मां तो अन्य धार्मिक परंपराओं के बोझ तले दबी हुई हैं।

कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं पवित्र ग्रंथों में विशेषज्ञता के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट स्कूल गई। वहां वेद पर भी एक पाठ्यक्रम था और लगा, जैसे मेरी मुराद ही पूरी हो गई हो। मैंने झटपट इसे चुन लिया, लेकिन वहां इसे पढ़ाने के तरीके से मुझे घोर निराशा हुई। इसे पढ़ाने वाले पश्चिमी प्रोफेसर विभिन्न देवी-देवताओं के बारे में ऐसे बताते जैसे वे किसी अप्रचलित-सी पौराणिक कहानी के पात्र हों। मुझे बहुत बुरा लगा और मैंने तभी इसे शैक्षणिक करियर बनाने का इरादा छोड़ दिया, लेकिन दुखी होकर यह फैसला करते समय मुझे इस बात का अंदाजा हुआ कि एक हिंदू के रूप में अपनी पहचान को लेकर मैं कितनी संजीदा हो चुकी थी। मैंने स्वाध्याय का रास्ता चुना और प्राचीन ग्रंथों, उपनिषदों, योग सूत्रों को पढ़ना शुरू किया। सबसे बड़ी बात, श्रीमद्भगवद्गीता को मैंने बार-बार पढ़ा और तब तक पढ़ती रही जब तक कि इसका ज्यादातर हिस्सा कंठस्थ नहीं हो गया। स्नातक में मेरे शोधपत्र का विषय था श्रीमद् भगवद्गीता और'ओल्ड टेस्टामेंट' के 'बुक ऑफ जॉब' का तुलनात्मक अध्ययन। दोनों ही मनुष्य-दैव संवाद हैं और दोनों का अंत दैवीय इच्छा के समक्ष समर्पण से होता है, ऐसा समर्पण जिसकी उत्पत्ति प्रेम और योग से होती है। लेकिन मेरी प्रोफेसर के विचार इससे अलग थे और उन्होंने मेरे शोधपत्र में जगह-जगह लिखा कि 'ओल्ट टेस्टामेंट' में ईश्वर से रिश्ते का आधार भय था न कि प्रेम। उन्होंने तब मुझसे इस बात पर चर्चा भी की और समझाया कि 'ओल्ड टेस्टामेंट' में तो प्रेम का मनोभाव है ही नहीं। मुझे अच्छी तरह याद है, यह सुनकर मुझे बड़े जोर का झटका लगा था और मैंने मन ही मन कहा- यह तो प्रेम का ही भाव है जिसके कारण मैं हिंदू हूं। अंतिम सत्य से आखिरकार कोई प्रेम का रिश्ता कैसे नहीं रख सकता? ब्रह्मांड का सृजन और इसका पालन प्रेम के कारण ही हो सका। और इस तरह एक हिंदू के रूप में मेरी पहचान और मजबूत हुई।

कई साल बाद मैं अंतरधार्मिक सभाओं के आयोजन से जुड़ गई। मैंने यह सब पहले से सोचा नहीं था। यह अवसर अचानक मेरे सामने आ खड़ा हुआ। बात वर्ष 2000 की है। मैं पहली बार जिस बड़ी सभा के आयोजन से जुड़ी, वह न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय में हुई। यह सभा थी पांथिक और आध्यात्मिक नेताओं का सहस्राब्दी शिखर सम्मेलन। संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय में पहली बार पांथिक नेताओं की बैठक हो रही थी और इसका उद्देश्य था संयुक्त राष्ट्र के शांति प्रयासों में इन पांथिक नेताओं की सहभागिता सुनिश्चित करना। मेरे साथ सह-आयोजक थे एक भारतीय जैन। हमलोगों ने यह सुनिश्चित किया कि सम्मेलन में हिंदू, जैन और बौद्धों की ओर से बड़े-बड़े प्रतिनिधिमंडल शामिल हों जबकि इससे पहले के किसी भी अंतरपांथिक सम्मेलन में इस तरह के प्रयास नहीं किए गए। उस सम्मेलन में भाग लेने के लिए 108 स्वामी आए और जैसे हंगामा मच गया। कुछ अब्राह्मिक नेता बिफरे हुए थे। इसकी वजह थी, इससे पहले अतंरपांथिक सम्मेलन मूलत: अब्राह्मिक विमर्श ही होता था जिसमें अलबत्ता तो पूरब से किसी तरह की कोई भागीदारी होती नहीं थी और अगर कभी हुई भी तो खानापूर्ति के लिए, यानी इक्का-दुक्का प्रतिनिधि। जब मेरा ध्यान अंतरधार्मिक सम्मेलन की इस असंतुलित प्रकृति की ओर गया तो मैंने पहला काम यही ठाना कि इस सम्मेलन में अन्य पांथिक परंपराओं को भी शामिल किया जाए जिससे इस मंच पर संतुलित विमर्श संभव हो सके। आयोजन की तैयारी के दौरान मेरा सारा ध्यान इसी लक्ष्य को पाने पर टिका था। जिस तरह अब्राह्मिक शाखाओं को एक परिवार के तौर पर देखा जाता है, मैंने धर्म परंपराओं को भी एक परिवार की तरह पेश करना आरंभ किया और इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक ज्ञान का सही प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए अंतरधार्मिक सम्मेलन को अब्राह्मिक और धर्म-परंपराओं को तर्कसंगत तरीके से संतुलित करना होगा।

साभार :- पांचजन्य