निष्काम कर्मयोगी राजनेता - पंडित दीनदयाल उपाध्याय - रितेश दुबे

दिंनाक: 25 Sep 2018 15:51:42


पुण्य भूमि भारत में अनेक महापुरूषों ने जन्म लिया है ,उनमें से एक थे निष्काम कर्म योगी पंडित दीनदयाल उपाध्याय । पंडित जी कहा करते थे देश के लिये मरने वाला जितना महान होता है ,उतना ही महान देश और समाज के लिये जीने वाला होता है जीते जी समाज के लिए समर्पित हो जाना बडी बात  है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को ब्रजभूमि मथुरा के नगला चन्द्रभान में हुआ । पंडित जी का बाल्यकाल संघर्ष में बीता फिर उन्होनें बी.ए तक शिक्षा कानपुर से से पूर्ण कीे,अपने मामा जी के विशेष आग्रह पर प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में बैठे और उत्तीर्ण भी हो गये लेकिन उन्होनें नौकरी नहीें की। सन् 1936 में पंडित जी संघ से जुडे, 31 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में डा.श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में जब अखिल भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई तो उत्तर प्रदेश में जनसंघ के विस्तार का कार्य नानाजी देशमुख के साथ पंडित दीनदयाल उपाध्याय को दिया गया। 1953 में डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के मृत्यु के उपरांत जनसंघ का सम्पूर्ण दायित्तव पंडित दीनदयाल पर आ गया। पंडित जी राजनैतिक जीवन शुचिता पूर्ण रहा देश भर के कार्यकर्ताओं से वह व्यक्तिगत जुडे थे। पंडित जी राजनीति को जन सेवा का माध्यम मानते थे।


 सन 1962 में पंडित दीनदयाल जी जौनपुर लोकसभा  उपचुनाव में पहली बार चुनाव लडे ,कई लोगो ने सलाह दी यदि ब्राहम्ण बहुल इस सीट पर चुनाव प्रचार के दोैरान दीनदयाल जी को एक ब्राहम्ण प्रत्याशी के रूप में आगे किया जाये तो चुनाव जीतना आसान हो जायेगा। इस सुझाव पर दीनदयाल जी ने कहा कि इस प्रकार जातीय भावना भडका कर चुनाव तो जीता जा सकता है ,लेकिन ऐसा करने से भारतीय जनसंघ का आदर्श हार जायेगा। जनसंघ ने कोई जातीय खेल खेला न ही कोई अन्य छल कपट का साहारा लिया। कुल मिलाकर वह अपने सिद्वांतों पर कायम रहे।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म दर्शन आज पूरे विश्व में मान्य है ,एकात्म दर्शन अर्थात सभी में एक ही तत्व है यदि हर व्यक्ति अपने आप को दूसरे में देखे तो सारे अग्रह दुराग्रह स्वतः ही समाप्त हो जायेगें। एकात्म दर्शन यह विचार देता है कि मनुष्य केवल रोटी,कपडा और मकान को लेकर आनंदित नहीं हो सकता इसके साथ ही उसके जीवन में धर्म ,काम और मोक्ष भी आवश्यक है।व्यक्ति,परिवार,समाज और राष्ट्र की समन्वयत ही जग का कल्याण कर सकती है।

दीनदयाल जी मानते थे की आर्थिक योजनाओं एवं आर्थिक प्रगति की माप समाज के उंचे तबके पर बैठे लोगो से नही बल्कि निचले स्तर पर रहने वाले लोगो से होनी चाहिये। जब अंतिम व्यक्ति का उदय होगा ,तभी आर्थिक योजनाओं की सफलता हेागी। वह दरिद्रनारायण की सेवा में विश्वास रखते थे ,उनका कहना था ,कि दरिद्रनारायण की सेवा से ही परामात्मा के दर्शन होते है। वे मानते थे अंतिम व्यक्ति को छत ,वस्त्र ,भर पेठ भोजन और साथ ही चिकित्सा सुविधा और शिक्षा मिलनी चाहिये।पंडित दीनदयाल जी राज्यशक्ति और अर्थ व्यवस्था देानेां के विकेन्द्रीकरण के पक्षधर थे। उपाध्याय जी बडे उधोगों के विरोधी नहीं थे। लेकिन उनका मत था कि बडे उधोग उत्पादक वस्तुऐं तैयार करें तथा छोटे उधोग उपभोग में आनेवाली वस्तुएॅ, उन्होनें इसके लिए जापान का उदाहरण दिया था, जहॉ छोटे पुर्जे घर घर में तैयार होते है और उन्हें एकीकृत करने का काम बडे कारखाने करते है। इस तरह से दोनों को ही समान अवसर मिल सकते है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय कुशल पत्रकार भी थे, वर्ष 1945 से 1947 के बीच उन्होनें मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म व पांचजन्य साप्ताहिक का प्रकाशन लखनउ से प्रारंभ किया। इसके बाद उन्होनंे दैनिक स्वदेश की भी शुरूआत की उनके इस कार्य में उन्हे अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भी सहयोग किया। दीनदयाल जी समाचार संकलन ,संपादन से लेकर कम्पोजिंग मशीन चलाने और बंडल बनाने  तक के कार्य स्वयं ही करते थे।

पंडित दीनदयाल जी राजनेता,दार्शनिक,समाजसेवक व पत्रकार होने के साथ साथ एक उत्कृष्ट साहित्यकार भी थे। प्रचीन भारत की ऋषि परंपरा और राज परंपरा के वैभव को दृष्टिगत रखते हुये ,उन्होने जगद्गुरू श्री शंकराचार्य और सम्राट चंद्रगुप्त नामक उपन्यास एक ही बैठक में लिखे। श्री शंकराचार्य उपन्यास में पंडित जी सनातन संस्कृति के अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये शंकराचार्य जी द्वारा किए गए संघर्ष का विवरण दे रहे है, इस उपन्यास में एक जगह पंडित जी लिखते है ‘‘सचमुच शंकर आज अमर है। शरीर से तो संसार में कोई अमर नही रहता। अमर तो वही है जिसका यश अमर है। जब तक संसार में हिन्दु जाति जीवित है तब तक शंकर का नाम जीवित है और हिन्दू जाति को तो शंकर ने समन्वय की संजीवनी पिलाकर अमर ही कर दिया है। ‘‘इसी प्रकार सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य पर आधारित उपन्यास में दीनदयाल जी लिखते है ‘‘सम्राट चंद्रगुप्त की शासन व्यवस्था इतनी निर्दोैष एवं पूर्ण थी कि पश्चिमी विद्वानों को भी उसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा करनी पडी। ‘‘पंडित जी  ने कृतियों में सरल भाषा के माध्यम से  भारत के एक महान संत और राजा के चरित्र को आम व्यक्ति तक पहुचाया है।

ऐसे महान लेखक,राजनेता,चिंतक,विचारक,पत्रकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय का निधन मुगलसराय स्टेशन पर दिनांक 11 फरवरी 1968 हो गया ,पंडित जी की कमी भारतीय समाज को हमेशा खलती रहेगी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने राजनीति के जो महान आदर्श स्थापित किए है ,निसंदेह उन पर चलकर भारत अपने प्रचीन गौरव को पुनः स्थापित कर सकता है।