श्रीकृष्ण जन्माष्टमी / जेल की कोठरी से युद्ध के मैदान तक – नरेन्द्र सहगल

दिंनाक: 03 Sep 2018 15:00:16


भोपाल(विसंके). अधर्मियों, आतंकवादियों, समाजघातकों, देशद्रोहियों और भ्रष्टाचारियों को समाप्त करने के उद्देश्य से धराधाम पर अवतरित हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण जन्म से लेकर अंत तक अपने निर्धारित उद्देश्य के लिए सक्रिय रहे। वे एक आदर्श क्रांतिकारी थे। कृष्ण के जीवन की समस्त लीलाएं/क्रियाकलाप प्रत्येक मानव के लिए प्रेरणा देने वाले अदभुत प्रसंग हैं। इस संदर्भ में देखें तो श्रीकृष्ण का सारा जीवन ही कर्म क्षेत्र में उतरकर समाज एवं राष्ट्र के उत्थान के लिए निरंतर संघर्षरत रहने का अतुलनीय उदाहरण है। आदर्शों/सिद्धान्तों को व्यवहार में उतारने का दिशा निर्देश है।


योगेश्वर कृष्ण की जीवनयात्रा कंस के कारावास की कठोर कोठरी से प्रारम्भ होती है। जेल में यातनाएं सह रहे वासुदेव और देवकी की कोख से जन्म लेकर और फिर जेल के सीकचों को तोड़कर मुक्त होकर उन्होंने आतंकवाद और अधर्म के साथ युद्ध करने का बिगुल बजा दिया। जेल से मुक्त होकर नंदग्राम में सुरक्षित पहुंच जाने के समाचार से अत्याचारी शासक कंस और उसके मददगार सभी राक्षसी राजा भय से कांप उठे। नंदग्राम में माता यशोदा की गोद में खेल कर और बालसखाओं के साथ कृष्ण ने जो साहसिक लीलाएं कीं उनसे समाज-सेवा, सामाजिक समरसता, धर्म-रक्षण, नारी सशक्तिकरण और संगठन में शक्ति का दर्शन शास्त्र समाया हुआ है।

बाल सखाओं का संगठन बनाकर मक्खन की मटकियां फोड़ना, पूंजीवादी तानाशाह के विरुद्ध क्रांति का संकेत है। किसानों, मजदूरों द्वारा परिश्रमपूर्वक कमाया गया धन (मक्खन के मटके) कंस जैसे तानाशाहों (पूंजीपतियों) के घरों में जाते थे। कृष्ण की बाल सेना ने इस धन को रोक कर ग्रामवासियों में वितरित करने की प्रथा को जन्म दिया। इस लिए तो किसानों की पत्नियों, माताओं-बहनों (गोपियों) ने कृष्ण के इस कार्य को सदैव प्रेमपूर्वक स्वीकृति दी। बाल कृष्ण को ग्रामवासियों ने ‘माखनचोर’ कहकर अपना स्नेहिल आर्शीवाद भी दिया।

जब पूरे क्षेत्र में मूसलाधार वर्षा होने से घर परिवार पर संकट छाने लगा तो बाल कृष्ण ने अपनी हथेली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर सबको इसके नीचे शरण दी। इंद्र देवता के कथित आतंक से समाज को सुरक्षित करके कृष्ण ने यह संदेश दिया कि एक नेता के नेतृत्व में संगठित होकर प्रत्येक संकट से छुटकारा पाया जा सकता है। सामाजिक सुरक्षा का यही सर्वोत्तम मार्ग है। बाल सखाओं के संगठन के माध्यम से अनुशासन के महत्व को समझा दिया गया।

बाल कृष्ण ने अपने सखाओं को सैनिक प्रशिक्षण, मलयुद्ध, गोपनीयता और अन्याय के विरुद्ध सशक्त प्रतिकार करना भी सिखाया। परिणाम स्वरूप कृष्ण के नेतृत्व में इन्हीं सैनिकों ने कंस, शिशुपाल, पूतना जैसे राक्षसी तानाशाहों का संहार करने में सफलता प्राप्त की। आम जनता का शोषण करने वाले इन अत्याचारी शासकों/असमाजिक एवं अराजक तत्वों को समाप्त करके कृष्ण ने सामाजिक भेद-भाव को समाप्त करने की आवश्यकता का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

गोपियों के संग रासलीला करने के प्रसंगों को भी अध्यात्मिक आधार पर नारी सशक्तिकरण और मातृशक्ति के संदर्भ में समझना चाहिए। गोपियों में अगुवा गोपी अर्थात नारी संगठन का नेतृत्व सम्भालने वाली गोपी राधा को शास्त्रों में श्रीकृष्ण की शक्ति कहा गया है। इसका अर्थ बहुत गहरा है। ईश्वरीय शक्ति श्रीकृष्ण को भी मातृशक्ति का सहारा लेना पड़ा। रासलीला तो नारी शक्ति को संगठित करने और दिशा देने का मार्ग मातृ था। इन रास लीलाओं में जाति, मजहब, क्षेत्र के लिए कोई स्थान नहीं था। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का संदेश था गोपियों के संग रासलीला के आध्यात्मिक आयोजनों में।

आज हम देखते हैं कि सेना में सैनिकों के प्रशिक्षण, अनुशासन, संचलन इत्यादि में ‘बैंड’ का बहुत योगदान होता है। इस बैंड की धुन सुन कर न केवल सैनिकों के ही अपितु साधारण नागरिकों के मन में भी उत्साह, निष्ठा और लगन के भाव जागृत हो जाते हैं। श्रीकृष्ण की बांसुरी की धुन से समाज के सभी वर्ग मंत्रमुग्ध होकर एक सूत्र में बंध जाने की प्रेरणा लेते थे। किसान, मजदूर, बाल, वृद्ध, महिलाएं, शहरवासी और ग्रामवासी इन सबको संगठित करने की शक्ति थी कृष्ण की बांसुरी की धुन में।

समाज और धर्म की रक्षा के लिए समय आने पर श्रीकृष्ण ने बांसुरी छोड़कर सुदर्शन चक्र भी उठा लिया था। महाभारत के युद्ध के पहले श्रीकृष्ण पांडवों के दूत बनकर दुर्योधन को धर्म शिक्षा देने के लिए सीधे उसके दरबार में जा पहुंचे, किसी प्रकार से युद्ध टल जाए, इसका प्रयास उन्होंनें किया। शांतिवार्ता से ही समस्यायें सुलझनी चाहिएं युद्ध तो अंतिम रास्ता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण तो मातृ पांच गांव मिलने पर भी पांडवों को संतुष्ट करने की नीति पर चल रहे थे। परन्तु ‘युद्ध के बिना एक इंच भूमि भी नहीं दूंगा’ के उत्तर से युद्ध अनिवार्य हो गया। श्रीकृष्ण ने भीष्म पितामह और विदुर जैसे विद्वानों के माध्यमों से भी दुराचारी दुर्योधन को समझाने की कोशिश की थी। परन्तु उसके ऊपर तो युद्ध का भूत सवार था। इस भूत को उतारने का एक ही रास्ता बचा था - कुरुक्षेत्र का मैदान।

युद्ध के मैदान में भी श्रीकृष्ण ने आदर्श राजनीति/कूटनीति का परिचय दिया। धर्म और अधर्म के मध्य होने जा रहे युद्ध से पहले अर्जुन को गीता के उपदेश के माध्यम से सारे संसार को कर्मयोग का उपदेश देना उनके ईश्वरी अवतार का सबसे महत्वपूर्ण कार्य था। मानव के समस्त क्रियाकलापों को सुचारू दिशा देकर उसे अंतिम लक्ष्य मोक्ष तक पहुंचाने का रास्ता है ‘गीता’। गीता का उपदेश देकर क्रांतिकारी योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जगदगुरु की भूमिका निभाते हुए अपने पूर्णावतार को सार्थक कर दिया था। अर्जुन को घोर अवसाद और निराशावाद से निकालकर कर्मपथ पर अग्रसर कर के श्रीकृष्ण ने गीता का रहस्य/मुख्य उपदेश समस्त विश्व के सामने रखा।

श्रीकृष्ण ने अधर्म का साथ दे रहे भीष्म पितामह जैसे दिग्गज विद्वानों तथा दुर्योधन, अश्वत्थामा और कर्ण जैसे योद्धाओं को भी समाप्त करवाने में संकोच नहीं किया। श्रीकृष्ण का अध्यात्मिक कर्मयोगी जीवन मानव की सभी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है। अतः जन्माष्टमी के पवित्र अवसर पर उन राष्ट्रभक्त संस्थाओं को कृष्ण के जीवन एवं कार्यपद्धति से प्रेरणा/शिक्षा लेनी चाहिए, जो समाज के संगठन और राष्ट्र के उत्थान के उद्देश्य के लिए कार्यरत हैं। इन संगठनों पर साम्प्रदायिक, फासिस्ट, दंगे करवाने, समाज को तोड़ने जैसे आरोप लगते हैं। ध्यान दें कि श्रीकृष्ण को भी चोर, नटखट, छलिया, रसिया, रणछोड़ और झूठ बोलकर योद्धाओं को मरवाने वाला इत्यादि न जाने क्या-क्या कहा गया। परन्तु योगेश्वर कृष्ण ने इस सब आरोपों को चुपचाप बर्दाश्त किया और अपने निर्धारित उद्देश्य को सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया। अधर्म पर धर्म की विजय हुई और असत्य सत्य के हाथों पराजित हुआ।

होने लगता है चीर हरण, तब शंख बजाया जाता है।

बांसुरी फैंक वृंदावन में, सुदर्शन चक्र उठाया जाता है।।