शिक्षा जीविका का ही नहीं जीवन का आधार होनी चाहिए - मान यतीन्द्र शर्मा

दिंनाक: 16 Jan 2019 13:23:34

 


वि.सं.के. (भोपाल)-

शिक्षा, जीविका का ही नहीं जीवन का आधार होनी चाहिए - मान यतीन्द्र जी शर्मा (विद्याभारती राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री)

सरस्वती शिशु मंदिर नईबस्ती, कटनी में 12जनवरी सायं-5:30 बजे स्वर्ण जंयती वर्ष के मौके पर पूर्व छात्र महासम्मेलन एवं सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया ।
मान. यतीन्द्र शर्मा जी ने स्वर्ण जयंती समारोह की पूर्व संध्या पर आयोजित पूर्व छात्र महासम्मेलन में पधारे हुए पूर्व छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की प्राचीन शिक्षा आध्यात्मिकता पर आधारित थी।

शिक्षा, मुक्ति एवं आत्मबोध के साधन के रूप में थी। ये व्यक्ति के लिये नहीं बल्कि धर्म के लिये थी। भारत की शैक्षिक एवं सांस्कृतिक परम्परा विश्व इतिहास में प्राचीनतम है। भारतवासियों के लिये शिक्षा का अभिप्राय यह रहा है कि शिक्षा प्रकाश का स्रोत है तथा जीवन के विभिन्न कार्यों में यह हमारा मार्ग आलोकित करती है।



प्राचीन काल में शिक्षा को अत्यधिक महत्व दिया गया था। भारत ‘विश्वगुरु’ कहलाता था। विभिन्न विद्वानों ने शिक्षा को प्रकाशस्रोत, अन्तर्दृष्टि, अन्तर्ज्योति, ज्ञानचक्षु और तीसरा नेत्र आदि उपमाओं से विभूषित किया है। उस युग की यह मान्यता थी कि जिस प्रकार अन्धकार को दूर करने का साधन प्रकाश है, उसी प्रकार व्यक्ति के सब संशयों और भ्रमों को दूर करने का साधन शिक्षा है। प्राचीन काल में इस बात पर बल दिया गया कि शिक्षा व्यक्ति को जीवन का यथार्थ दर्शन कराती है तथा इस योग्य बनाती है कि वह भवसागर की बाधाओं को पार करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त कर सके जो कि मानव जीवन का चरम लक्ष्य है।


भारतीय शिक्षा का इतिहास भारतीय सभ्यता का भी इतिहास है। भारतीय समाज के विकास और उसमें होने वाले परिवर्तनों की रूपरेखा में शिक्षा की जगह और उसकी भूमिका को भी निरंतर विकासशील पाते हैं। सूत्रकाल तथा लोकायत के बीच शिक्षा की सार्वजनिक प्रणाली के पश्चात हम बौद्धकालीन शिक्षा को निरंतर भौतिक तथा सामाजिक प्रतिबद्धता से परिपूर्ण होते देखते हैं। प्राचीन भारत में जिस शिक्षा व्यवस्था का निर्माण किया गया था वह समकालीन विश्व की शिक्षा व्यवस्था से समुन्नत व उत्कृष्ट थी लेकिन कालान्तर में भारतीय शिक्षा व्यवस्था का ह्रास हुआ।

विदेशियों ने यहाँ की शिक्षा व्यवस्था को उस अनुपात में विकसित नहीं किया, जिस अनुपात में होना चाहिये था। अपने संक्रमण काल में भारतीय शिक्षा को कई चुनौतियों व समस्याओं का सामना करना पड़ा। आज भी ये चुनौतियाँ व समस्याएँ हमारे सामने हैं। 1850 तक भारत में गुरुकुल की प्रथा चलती आ रही थी परन्तु मैकाले द्वारा अंग्रेजी शिक्षा के संक्रमण के कारण भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का अंत हुआ। अतः मेरा आप सभी से हमारी अपनी पुरातन वैदिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा प्रणाली को बढ़ाने में सहयोगी बनें।

कार्यक्रम की अध्यक्षता - डॉ. जितेन्द्र जामदार (प्रसिद्ध अस्थि रोग विशेषज्ञ), विशिष्ट अतिथि - श्रीकांत नामदेव (पूर्व छात्र एवं कमिश्नर इनकम टैक्स), विशिष्ट अतिथि - डॉ. पवन तिवारी (संगठन मंत्री विद्याभारती महाकोशल) श्री शशांक जी, हजारों की संख्या में विद्यालय के वरिष्ठ पूर्व छात्र, अभिभावक एवं शहर के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों सहित विद्यालय कार्यकारिणी समिति के पदाधिकारी गण एवं आचार्य परिवार उपस्थित रहे।