स्वास्थ्य के प्रति सजग होते हुए भी क्यों पैदल नहीं चल पा रहे हैं भारतीय

दिंनाक: 12 Nov 2019 13:04:28
 


निष्ठा अनुश्री 
फिटबिट ने 18 देशों पर एक अध्ययन किया जिसमें उन्होंने अपने उपयोगकर्ताओं के डाटा का प्रयोग किया। इसमें पाया गया कि औसत रूप से भारतीय जापान के बाद सबसे कम घंटों के लिए सोते हैं और अन्य देशों की तुलना में सबसे कम कदम भी चलते हैं।

वैसे तो यह डाटा केवल फिटबिट उपयोगकर्ताओं का है और मेरा अनुमान है कि 1 प्रतिशत से कम भारतीयों के पास ही फिटबिट होगी। तो यह भारतीयों के नहीं बल्कि भारत के एक विशेष वर्ग के परिणाम हैं। यदि इसकी बिक्री का डाटा मिल पाता तो और विश्वास से यह बात कही जा सकती थी।

खैर, अध्ययन पर आते हैं। यह कहता है भारतीय औसत तौर पर 7 घंटे 1 मिनट सोते हैं जो औसत अमरीकी से 32 मिनट और अंग्रेज़ से 48 मिनट कम है। यह परिणाम विरोधाभासी लगते हैं क्योंकि अगस्त 2019 के ही एक सर्वेक्षण में भारतीयों को सबसे ज़्यादा सोने वाला बताया गया था।

हालाँकि, यह सर्वेक्षण 12 देशों के 11,006 वयस्कों पर किया गया था जो भारतीय जनसंख्या के अनुपात में काफी कम है इसलिए विश्वसनीय नहीं। लेकिन संयोगवश इसमें जापान कम सोने वालों की सूची में शीर्ष तीन पर ही रहा था और फिटबिट अध्ययन में भी यह शीर्ष पर है।

वैसे ये सारी बातें सर्वेक्षण के दायरे में आने वाले लोगों की संख्या और उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति पर निर्भर करती हैं। लेकिन फिटबिट के उपयोगकर्ताओं की दृष्टि से एक बात चौंकाने वाली भी है।

भारत के फिटबिट उपयोगकर्ता औसत रूप से मात्र 6,533 कदम प्रतिदिन चलते हैं जो लगभग 5.2 किलोमीटर हुआ। यह औसत सबसे सक्रिय देश हॉन्ग-कॉन्ग से 3,600 कदम कम है।

एक फिटबिट उपयोगकर्ता की अनुमानित दिनचर्या से लगता है कि यह केवल ट्रेडमिल पर और घर-कार्यालय के अंदर चलने वाले कदम ही होंगे, इसलिए इतने कम हैं। यही फिटबिट किसी आम भारतीय के हाथ बंधी होती तो ये कदम कई अधिक होते।

ये आँकड़े उस भारतीय मानसिकता को भी झुठला देते हैं जो यह कहती है कि हर खरीदी हुई चीज़ का पैसा वसूल करेंगे। फिटबिट पर हज़ारों रुपये खर्च करने के बाद भी ये लोग स्वास्थ्य संबंधी विशेष ‘कदम’ उठाते नहीं दिख रहे।

दो वर्षों पहले भी एक अध्ययन आया था जिसमें भारतीयों को कम चलने वाला और हॉन्ग-कॉन्ग वासियों को सबसे अधिक चलने वाला बताया गया था। यह अध्ययन 46 देशों के 7 लाख लोगों पर एक स्मार्टफोन ऐप के माध्यम से किया गया था और इसमें भारत का 39वाँ स्थान था।

 

ये आँकड़े उस शहरी आबादी के हैं जो स्वास्थ्य के लिए सचेत हैं, तभी उनके पास फिटबिट या कदम गिनने वाली ऐप है लेकिन प्रतिबद्ध नहीं या उपलब्ध संसाधन उन्हें इस सहजता से बाहर नहीं निकलने दे रहे।

अच्छे सार्वजनिक परिवहनों का अभाव कहें या सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए व्यक्तिगत परिवहनों पर अधिक निर्भरता लेकिन सच यही है कि व्यायाम के अलावा शहर में व्यक्ति केवल यात्रा के लिए चलता है, और यहीं भारतीय नहीं चल रहे हैं।

सन्दर्भ - प्रस्तुत आलेख स्वराज्य से लिया गया है