बाल शाखाओं के आग्रही रोशनलालजी

दिंनाक: 21 Nov 2019 17:03:48



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काम में सायं शाखा का बड़ा महत्व है, चंूकि इनमें विद्यार्थी आते हैं। इस समय मिले विचार और संस्कार स्थायी होते हैं। यही स्वयंसेवक फिर कार्यकर्ता बनते हैं। सायं शाखा पर आने वाले बाल और शिशु स्वयंसेवक प्रायः चंचल और ऊधमी होते हैं। कई लोग इस कारण उनकी उपेक्षा करते हैं; पर रोशनलालजी सदा सायं शाखाओं की वृद्धि के प्रयास में लगे रहे। वे ऐसे छोटे स्वयंसेवकों की ऊर्जा को ठीक दिशा देने में माहिर थे। 

उनका जन्म 21 नवम्बर, 1938 को लाहौर में श्री सोहनलाल सचदेव एवं श्रीमती इंदिरावती के घर में हुआ था। उनके पिताजी की वहां प्रिटिंग प्रेस थी। उन दिनों पूरे पंजाब और सिंध में मुस्लिम गुंडे हथियार लेकर ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ के नारों के साथ जुलूस निकलते थे। इस माहौल में आठ साल की अवस्था में रोशनलालजी ने शाखा जाना शुरू किया। 

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1947 में विभाजन के बाद यह परिवार देहरादून के प्रेमनगर छावनी क्षेत्र में आ गया। यहां उनके पिताजी ने मिलट्री प्रेस में काम किया। रोशनलालजी अपनी माताजी के साथ पत्थर ढोते थे तथा जंगल से लकड़ी लाते थे। वे कहते थे कि हम शरणार्थी नहीं, पुरुषार्थी हैं। कक्षा 12 के बाद 1956 में उन्हें राज्य के रेशम विभाग में नौकरी मिल गयी। इसे करते हुए उन्होंने प्राइवेट बी.ए. भी किया। 1956 से 60 तक उन्होंने तीनों वर्ष के संघ शिक्षा वर्ग किये। 1964 में उनका विवाह  हुआ।

नौकरी के दौरान वे उ.प्र. में कई जगह पर रहे; पर 1981 के बाद उनका समय उत्तराखंड में ही बीता। यहां के प्रायः सभी जिलों में वे रहे। राज्य के अधिकांश गांव उन्होंने देखे थे। उन दिनों सर्वत्र कांग्रेसी सरकारें थीं; पर वे निःसंकोच शाखा जाते थे। इससे चिढ़कर स्थानीय कांग्रेसी नेता उनका स्थानांतरण करा देते थे। इस कारण कठिनाई होते देख उन्होंने परिवार को प्रेमनगर ही छोड़ दिया। 

वे कहते थे कि जब हम अपना काम समय से पूरा करते हैं, तो फिर डर कैसा ? सरकार स्थानांतरण कर सकती है; पर नौकरी नहीं ले सकती। हर स्थानांतरण को वे एक सुअवसर मानकर नये स्थान पर फिर शाखा के काम में लग जाते थे। उ.प्र. और उत्तराखंड में कई स्थानों पर शाखा उन्होंने ही शुरू कीं। विपरीत परिस्थिति और कठिन स्थान पर वे दूने उत्साह से काम करते थे।

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श्री गुरुजी, रज्जू भैया और दीनदयालजी का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव था। एक बार देहरादून से 15 कि.मी. दूर ‘मानक सिद्ध मंदिर’ पर वन विहार कार्यक्रम में प्रांत प्रचारक रज्जू भैया को आना था। जिला प्रचारक ने उन्हें स्टेशन भेज दिया। रज्जू भैया ने उनकी दुबली काया देखकर उन्हें आगे बैठाया और स्वयं साइकिल चलाकर कार्यक्रम में आये। 

अकेले होने के कारण कई जगह वे संघ कार्यालय पर ही रहेेे। इससे कार्यालय भी खुला और साफ रहता था; पर वे खाना बाहर ही खाते थे तथा आवास सुविधा के लिए किराया भी देते थे। वे अपनी छुट्टियों में तालमेल कर संघ के शिविर और प्रशिक्षण वर्ग के लिए समय निकाल ही लेते थे। गृहस्थ होते हुए भी वे प्रचारकों से बढ़कर थे।

रोशनलालजी प्रवास में डायरी साथ नहीं रखते थे। उन्हें हर शाखा और कार्यकर्ता का नाम याद रहता था। वे कहते थे कि शाखा के आंकड़े सक्रिय कार्यकर्ताओं की उंगलियों पर रहते हैं। 1996 में रेशम विभाग में निरीक्षक पद से अवकाश प्राप्ति के बाद प्रेमनगर आकर सबसे पहले उन्होंने वहां की सायं शाखा को ठीक किया। 

संघ कार्य में उन पर नगर, जिला, विभाग और प्रांत तक के दायित्व रहे। 2014 में वृद्धावस्था के कारण उन्होंने प्रांत सह संघचालक की जिम्मेदारी छोड़ दी। फिर वे स्मृति लोप से भी पीडि़त हो गये। जन्माष्टमी (23 अगस्त, 2019) को अपने बड़े बेटे मनीष के निवास पर उनका निधन हुआ। उनके जीवन में संघ कार्य सदा प्राथमिकता पर रहा। इसलिए उनके पार्थिव शरीर को कंधा देने राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी संघ कार्यालय पहुंचे।

(संदर्भ: मनीषजी से प्राप्त जानकारी)