रामसिंह कूका ने शुरू किया था अंग्रेजो के खिलाफ असहकार आन्दोलन

दिंनाक: 29 Nov 2019 16:45:43


सन 1816 में राम सिंह का जन्म लुधियाना जिले (पंजाब) में भैनी में हुआ था। आगे चलकर वे सिख सेना के सैनिक बन गए । उस समय वे भाई बालक सिंह से काफी प्रभावित हुए थ । बालक सिंह की मृत्यु होने के बाद मिशनरी के काम की सारी जिम्मेदारी राम सिंह ने अपने कंधो पर ली थी। उन्होंने सिक्खों  के आपस में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने अंतर जाती विवाह और विधवा पुनर्विवाह करने के लिए लोगों को प्रेरित किया था।

राम सिंह कूका एक बहादुर सैनिक और धार्मिक नेता थे। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होंने जो योगदान दिया वह बहुत ही महत्वपूर्ण है। कूका विद्रोह की शुरुआत राम सिंह कूका ने ही की थी। उन्होंने पंजाब में अंग्रेजों के खिलाफ जो असहकार आन्दोलन किया था वह बहुत ही प्रभावी आन्दोलन साबित हुआ ।

नामधारी सिख धर्म की स्थापना करने में राम सिंह की भूमिका

12 अप्रैल 1857 को सतगुरु राम सिंह ने अपने पांच अनुयायियों  को अमृत संचार की दीक्षा दी और नामधारी संप्रदाय की स्थापना की। उस दिन राम सिंह ने भैनी साहिब में कुछ किसान और कारीगरों के सामने एक त्रिकोणीय झंडे को फहराया ।

राम सिंह ने संप्रदाय का नाम इसलिए नामधारी संप्रदाय रखा था ताकी उनके शिष्य भगवान को अपने मन और आत्मा में धारण कर सकें। राम सिंह का ऐसा मानना था कि जिस व्यक्ति के पास में नैतिकता है वही अपने देश और समाज के लिए बलिदान दे सकता है।

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में राम सिंह कूका का योगदान

इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के मुताबिक राम सिंह सिख धर्म के दार्शनिक और समाज सुधारक थे और साथ ही वे ऐसे पहले भारतीय थे जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए असहकार जैसे हथियार का इस्तेमाल किया । उन्होंने अंग्रेजों की सभी वस्तुओं का बहिष्कार किया ।

उन्होंने अंग्रेजों को देश से निकालने के लिए रूस से मदद भी मांगी थी लेकिन ग्रेट ब्रिटेन के साथ युद्ध करने का खतरा रूस खुद पर लेना नहीं चाहता था इसलिए  रूस ने उन्हें सहायता करने से इंकार कर दिया था। राम सिंह ने अपनी जिंदगी के आखिरी दिन कारावास में बिताये। उन्हें कैद से छुटकारा मिलने पर रंगून में भेजा दिया गया जहाँ पर उन्हें 14 साल तक कैदी बनकर रहना पड़ा