भारत के 'स्व' से जुड़े अर्थतंत्र के आग्रही श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी

दिंनाक: 30 Nov 2019 16:55:08


देशभर में प्रख्यात आर्थिक चिंतक स्व. दत्तोपंत ठेंगड़ी के जन्मशती समारोहों का सिलसिला शुरू होने को था कि एक बड़ी खबर ने सबका ध्यान खींचा-भारत ने व्यापक आर्थिक क्षेत्रीय साझेदारी समझौते (आरसेप) में शामिल न होने का फैसला किया।
दोनों खबरों का साझा संदर्भ बिन्दु खोजें तो मन में एक ही शब्द गूंजता है -'स्वदेशी'!
देश को मजदूरों-किसानों के पसीने का मोल समझने-समझाने वाले, भारत के अपने आर्थिक विचार से अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की राह दिखाने वाले द्रष्टा-मनीषी को इससे सच्ची श्रद्धांजलि क्या होगी!
स्वदेशी शब्द पहली बार में अर्थ क्षेत्र में 'स्व' की पहचान और आग्रह तक सीमित लगता है, किन्तु ऐसा है नहीं। भारत सरीखे देश के लिए स्वदेशी का बोध अपने करोड़ों किसान-मजदूरों, उद्यमियों-उद्योगपतियों की साझा शक्ति को समझना, इसे जगाना और इन सबके हितों के संरक्षण के लिए कमर कसना है। इसलिए आर्थिक निर्णय-नियोजन के साथ-साथ 'स्वदेशी' शब्द को विदेश नीति और भू-रणनीतिक योजनाओं के आकलन व समन्वय के लिए भी एक कसौटी की तरह प्रयोग किया जा सकता है। अच्छी बात है कि ठेंगडी जी के शताब्दी वर्ष में भारत इस दिशा में मजबूती से कदम बढ़ाता दिख रहा है।
रूस के बिखराव के बाद एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था बहुत थोड़े समय रही। एक ओर आर्थिक मंदी ने अमेरिका को बुरी तरह झकझोरा, दूसरी ओर चीनी पूंजी के निवेश और सस्ते उत्पादों के लिए दुनियाभर के बाजारों के रास्ते खुलते गए। आज स्थिति यह है कि चाहे विश्व व्यापार असंतुलन का मुद्दा हो, दुनिया के लिए 5जी तकनीक की तैयारी की बात हो या फिर विभिन्न देशों के बीच सहयोग और मुक्त व्यापार की बात हो, चीन हर मंच पर कहे-अनकहे कारक के रूप में मौजूद है। चीनी पैंतरों के सामने दुनिया में आर्थिक और भू-राजनैतिक विषय आपस में इस तरह गड्डमड्ड हैं कि इन्हें अलग-अलग देखने की बजाए इनका समग्र आकलन आवश्यक हो गया है।
 
उदाहरण के लिए, आरसेप कार्रवाइयों से कदमताल करते एक अन्य घटनाक्रम को देखें- न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर है कि चीन और सोलोमन द्वीप की प्रांतीय सरकार के बीच गत माह एक महत्वपूर्ण और अतिगोपनीय समझौता हुआ है। समझौते के बाद रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तुलागी द्वीप और इसके आसपास का क्षेत्र अगले 73 वर्ष के लिए चीन के परोक्ष कब्जे में होगा। इस क्षेत्र का महत्व इस तथ्य से जाना जा सकता है कि यह द्वीप पूर्व में ब्रिटेन और जापान का दक्षिण प्रशांत क्षेत्र मुख्यालय रह चुका है।
अगर सबके हित साझा हैं तो हिंद महासागर-दक्षिण चीन सागर से लेकर अफ्रीका और दक्षिण प्रशांत तक विस्तारवाद की यह आक्रामक अकुलाहट क्यों है?
साझा हितों की बात करते हुए चीनी बाजारवाद और विस्तारवाद के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाने का ड्रैगन का जुनून अब किसी से छिपा नहीं है। तिब्बत को हड़पने के बाद जब-तब ताइवान को हड़काता, हांगकांग में आजादी की बात को दबाता और साथ-साथ अरुणाचल-लद्दाख के मुद्दे पर भारतीय संप्रभुता को चुनौती देता चीन विश्व व्यवस्था में नई आशंकाएं और असंतुलन पैदा कर रहा है।
इसके अतिरिक्त नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान को रेल नेटवर्क, बंदरगाह और ड्रैगन गलियारे (सीपैक) से क्रमबद्ध रूप से बांधता-घेरता चीन विश्व व्यवस्था में घातक असंतोष, अशांति और आशंकाएं उत्पन्न कर रहा है।
भू-रणनीतिक दृष्टि से विभिन्न देशों को आर्थिक लालच देना और आधारभूत ढांचे में भारी निवेश के बूते स्थितियों को चीनी पक्ष में झुकाना आज चीन की विदेश नीति का सबसे मारक हथियार है।
वैसे, सीपैक की ही भांति यह समझौता भी भारत के बिना बेमानी है, यह बात चीन समझता है। दुनिया के सबसे बड़े बाजार 'भारत' के इस मंच से हटते ही खरीदारी के सारे आकलन और समीकरण धड़ाम हो जाते हैं। भारत के अलग होते ही विभिन्न उत्पादों और उत्पादकों के सिर से राहत की वह छत हट जाती है जो उन्हें सुनिश्चित बिक्री और मुनाफे की छांह देती है। यही कारण है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा है कि भारत को आरसेप में शामिल होने के लिए मनाने की कोशिशें जारी रहेंगी।
गौर करने वाली बात है कि आरसेप वार्ता के दौरान परोक्ष चीनी हितों के सामने भारत प्रत्यक्ष तौर पर अड़ा रहा और उसे मनाने की कोशिशें भी खूब हुईं। एक वक्त ऐसा भी आया जब एजेंडा के 70 बिंदुओं में से 50 भारत से संबंधित थे। आरसेप से भारत की दूरी पर चीनी खेमे में सबसे ज्यादा बेचैनी की वजह जाननी हो तो यह जान लीजिए कि ऐसा क्यों है? क्योंकि फिलहाल इस सहभागिता समझौते की शर्तें और प्रारूप ऐसे हैं जो ऊपरी तौर पर सहज-स्वीकार्य दिखने पर भी चीनी उत्पादों को अन्य पर भारी बढ़त देते हैं।
दस आसियान देशों (इंडोनेशिया, लाओस, कंबोडिया, ब्रूनेई, म्यांमार, मलेशिया, सिंगापुर, फिलीपींस, थाईलैंड तथा वियतनाम) और छह मुक्त व्यापार समझौते वाले सहभागियों (चीन, जापान, भारत, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तथा कोरिया) के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने के नाम पर बुने गए तार ऐसे हैं जो किसी उत्पाद पर उस देश के उत्पादन एकाधिकार को बढ़ावा देते हैं जहां वह सबसे सस्ता है। इससे छोटे देश, जो इक्का-दुक्का उत्पादन क्षेत्र में अग्रणी हैं, अपने उत्पादों की ज्यादा बिक्री की संभावना से संतुष्ट हो सकते हैं, परंतु इससे भारत जैसे देश को क्या हासिल होगा जोकि विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों में अच्छी चुनौती पेश करने की तैयारी में है। सबसे बड़ी बात यह विश्व बाजार में विविध क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा को इस समझौते से भारी चोट लगती और उपरोक्त सब देश अपनी एक-दो चीजों की बिक्री मजबूत करने के बदले सभी स्थानीय बाजारों को सस्ते चीनी उत्पादों से पाटने की छूट दे देते।
इस सहभागिता से जुड़ा एक अन्य पक्ष है जो पूर्व में अन्य देशों के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौतों से जुड़ता है। इस आर्थिक लामबंदी में शामिल देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते का कितना लाभ देश को हुआ इसकी समीक्षा और तद्नुरूप राजनीतिक निर्णय लेने की जरूरत ही महसूस नहीं की जा रही थी। जबकि तथ्य यह है कि एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के दौर में (वर्ष 2004-2014 तक) इन देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा 1,100 प्रतिशत बढ़ा। वर्ष 2004 में आरसेप देशों का भारत के साथ व्यापार घाटा 7 अरब डॉलर था, यह राशि 2014 तक बढ़कर 78 अरब डॉलर हो गई थी। अच्छी बात यह है कि भारत ने अब इस पूरी प्रक्रिया और समझौतों की समीक्षा शुरू कर दी है। भारत द्वारा उठाए प्रश्नों का निराकरण और सबके लिए पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करने में आरसेप का मंच 'फिलहाल' असफल रहा है। भारत द्वारा उल्लेखित बिंदुओं की समीक्षा और व्यापक परिवर्तनों के बिना यह स्वीकारे जाने योग्य नहीं है।
ये सारे मुक्त व्यापार समझौते कांग्रेस राज में किए गए थे। हैरानी की बात यह भी है कि भारत में सरकार बदली और उत्पाद, निर्माण, निवेश से जुड़े बड़े निर्णयों से आर्थिक क्षेत्र का परिदृश्य और समीकरण बदलने लगे, किन्तु इसके बाद भी आरसेप में भारत सहित सभी देशों के लिए उत्पादों पर आधारशुल्क तय करने का वर्ष 2014 ही बनाए रखा गया था!
बहरहाल, अपने वर्तमान स्वरूप में आरसेप जैसा है उससे दूर रहकर भारत ने बताया है कि देश गुटनिरपेक्षता के ढोंग और परहित-पूरक साझेदारियों का बोझ ढोने के दौर से बाहर निकल आया है। दूरी चाहे जितनी हो, कदम बढ़ाए बिना तय नहीं की जा सकती। स्व की पहचान और स्वदेश के स्वावलंबन के लिए भारत मजबूती से कदम बढ़ा रहा है
 
सन्दर्भ -उक्त लेख पांचजन्य से लिया गया है