11 फरवरी/जन्म-दिवस -आयुर्वेदाचार्य पंडित रामनारायण शास्त्री

दिंनाक: 11 Feb 2019 11:31:12

 

एक सामान्य ग्रामीण परिवार में जन्म लेकर देश के अग्रणी आयुर्वेदाचार्य के नाते प्रसिद्ध हुए पंडित रामनारायण शास्त्री का जन्म वसंत पंचमी (11 फरवरी, 1913) को मध्य प्रदेश में महू के पास डोंगरगांव में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा डोंगरगांव में प्राप्त कर वे ग्वालियर आ गये। यहां उन्होंने आयुर्वेद का अध्ययन कर आयुर्वेद शास्त्री की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वहां के प्रसिद्ध वैद्य श्री रामेश्वर शास्त्री के पास बैठने से उन्हें पुस्तकीय ज्ञान के साथ प्रत्यक्ष अनुभव भी भरपूर हुआ। इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के हापुड़ से आयुर्वेद विज्ञान शिरोमणि की उपाधि भी सम्मान सहित प्राप्त की।

बचपन से ही सामाजिक प्रवृत्ति के होने के कारण छात्र जीवन में वे ‘महू नवयुवक मनोरंजन केन्द्र’ और ‘प्रताप सेना संघ’ से जुड़ गये। अध्ययन पूरा कर उन्होंने ‘नार्मदीय धर्मार्थ न्यास’ के औषधालय से चिकित्सा सेवा प्रारम्भ की। कुछ ही समय में उनका यश फैल गया और उनकी गिनती देश के प्रमुख वैद्यों में होने लगी। अब वे इंदौर के अपने निवास से कार्य करने लगे। वे अखिल भारतीय आयुर्वेद सम्मेलन के कई बार अध्यक्ष रहे। उनकी सेवाओं के लिए श्रीलंका सरकार ने उन्हें ‘आयुर्वेद मणि’ उपाधि से विभूषित किया।

संघ से उनका परिचय 1943 में हुआ और वे इंदौर की मल्हारगंज शाखा में जाने लगे। इसके बाद संघ से निकटता बढ़ती गयी और वह उनके जीवन की धड़कन बन गया। अनेक दायित्वों के बाद वे मध्य भारत के प्रांत संघचालक बनाये गये। इस दायित्व का निर्वाह उन्होंने अंतिम समय तक किया।

चिकित्सा का अच्छा कारोबार होते हुए भी शास्त्री जी ने देश और संघ पर आने वाली हर चुनौती को स्वीकार किया। वे कश्मीर आंदोलन और फिर गोरक्षा आंदोलन में जेल गये। संघ पर लगे पहले व दूसरे प्रतिबन्ध में पूरे समय वे कारागृह में रहे। आपातकाल में जेल में उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया; पर उन्होंने क्षमा मांगना स्वीकार नहीं किया। बहुत बीमार होने पर भी जेल वालों ने उन्हें अपनी आयुर्वेदिक दवाएं नहीं लेने दीं।

शास्त्री जी की साहित्य के क्षेत्र में भी अच्छी पहचान थी। उन्होंने कई नाटक लिखे, उनका मंचन किया तथा उनमें स्वयं अभिनय भी किया। इंदौर की सभी साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में वे सक्रिय रहते थे। जब इंदौर से ‘स्वदेश’ नामक एक दैनिक हिन्दी समाचार पत्र निकालने की योजना बनी, तो उसकी स्थापना से लेकर संचालन तक में उनकी प्रमुख भूमिका रही। इन दिनों वह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई स्थानों से प्रकाशित होता है। स्वदेश की संचालन संस्था ‘श्री रेवा प्रकाशन लिमिटेड’ के वे आजीवन अध्यक्ष रहे।

भारत और भारतीयता के प्रबल आग्रही शास्त्री जी सदा धोती-कुर्ता ही पहनते थे। पश्चिम के ठंडे देशों की यात्रा के समय भी यही उनका वेश रहा।  वे जीवन भर निष्ठावान स्वयंसेवक रहे। उन्हें जो सूचना मिलती, वे उसका पूरी तरह पालन करते थे। एक कार्यक्रम में सब स्वयंसेवकों को परिवार सहित आने की सूचना दी गयी थी। शास्त्री जी की पत्नी उस समय पुत्र वियोग में अपनी आंखें खो चुकी थीं। फिर भी वे उन्हें अपने साथ लेकर आये।

शास्त्री के मन में तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी के प्रति बहुत श्रद्धा थी। श्री गुरुजी भी अपने व्यस्त प्रवास में से समय निकाल कर प्रतिवर्ष कुछ दिन इंदौर में उनके घर पर विश्राम व स्वास्थ्य लाभ करते थे। दूसरों के भीषण रोगों को ठीक करने वाले शास्त्री जी को आपातकाल में जेल में जिन रोगों ने घेर लिया था, वे उनके शरीर के स्थायी साथी बन गये और उन्हीं के कारण 28 दिसम्बर, 1979 को उनका देहावसान हुआ। 

(संदर्भ : मध्यभारत की संघ गाथा)