11 फरवरी/जन्मदिवस - भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी तिलका मांझी ।

दिंनाक: 11 Feb 2019 12:49:24


 तिलका मांझी का जन्म मुर्मू गोत्र के संथाल परिवार में 1750 ईस्वी में तिलकपुर गांव में हुआ था। यह बचपन से ही बहुत वीर, मिलनसार एवं कर्मठ स्वभाव के व्यक्ति थे । यह तीरंदाजी एवं कसरत में माहिर थे, बचपन से ही तीर धनुष और भाला चलाने का अभ्यास एवं अपने साथियों के साथ अक्सर मल युद्ध किया करते थे। उन्हें बड़े बड़े पेड़ों पर चढ़ना, जंगलों, घाटी, नदी-नालों में घूमना काफी पसंद था।

तिलका मांझी किशोरावस्था में ही अंग्रेजो के शोषण का शिकार हो गए। उन्हें एहसास हो गया था कि अंग्रेज आदिवासियों को गुमराह करके आपस में लड़ा रहे हैं, इसलिए उन्होंने अपने संथाल भाइयों को अंग्रेजों की नीति, उन के शोषण तथा फूट डालो राज करो की नीति की जानकारी दी एवं सुदृढ़ संगठन बनाया।
युवक तिलका मांझी भागलपुर के निकट बनचरी जोर नामक स्थान से अंग्रेजों के विरुद्ध संगठन बनाकर लड़ाई आरंभ कर दिया। इस समय अंग्रेज सरकार (1767 ई.) इनके द्वारा संचालित "चुहाड़ विद्रोह" के कारण परेशान हुई थी।
तिलका मांझी गोरिल्ला युद्ध में माहिर थे, वे सरकारी खजानों को लूटते और गरीबों में बांटते थे। तिलकामांझी की सेना घने जंगलों में छिपकर तीर तथा गुलेल से अंग्रेजों की सेना को मारती थी। 1784ई. में जान हथेली पर रखकर तिलका मांझी ने खुलेआम अंग्रेजों पर आक्रमण कर दिया। 13 जनवरी 1784 में एक ताड़ के पेड़ पर बैठ गए और उसी रास्ते से गुजरते हुए राजमहल के सुपरिटेंडेंट क्लीवलैंड को तीर से मार गिराया। क्लीवलैंड की मृत्यु हो गई।
इस घटना से खुशी बहुत दिनों तक नहीं रह पाई क्योंकि अंग्रेजों ने पहाड़िया सेना के सरदार जोरा को अपने साथ मिलाकर तिलका मांझी एवं उनकी सेना पर आक्रमण कर दिया। तिलकामांझी तो बच गए लेकिन उनकी सेना के बहुत सारे लोग हताहत हो गए, तिलका मांझी ने सुल्तानगंज की पहाड़ियों में शरण ली और फिर से लड़ाई के लिए एक टुकड़ी को संगठित किया।

इस बार क्लीवलैंड की जगह उन्हें वारेन हेस्टिंग से लड़ना पड़ा, जिसके पास बहुत अधिक अस्त्र-शस्त्र से लैश सेना थी। तिलकामांझी के पास कम संसाधन थे, धोखे से पकड़ लिए गए तिलका मांझी को भागलपुर लाया गया एवं अमानवीय व्यवहार करते हुए उन्हें 4 घोड़ों के पीछे मोटी रस्सियों से बांधकर घसीटा गया। अंत में अत्याचारी अंग्रेजों ने उन्हें बरगद के पेड़ पर लटका कर फांसी दे दी। देश की आजादी के लिए लड़ते-लड़ते वीर तिलकामांझी शहीद हो गए ।