म.प्र. शासन का पत्रकारिता सम्मान, ऋषितुल्य पत्रकार का अपमान ।

दिंनाक: 18 Feb 2019 10:54:11

मध्यप्रदेश में श्री कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार गठित होने के बाद उन्होंने कई राजनैतिक, प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय लिये हैं। नई की नियुक्तियां हैं, पुराने हटाये गये हैं। सत्ता बदलने पर यह सब स्वाभाविक निर्णय है, समझा जाता है। उन फैसलों के उचित अनुचित पर मतभेद हो सकते हैं, पर वे सब प्रशासनिक सरकार के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। इसे श्री कमलनाथ को प्रशासनिक कुशलता माना गया कि कोई सरकारी निर्णय गंभीर रुप से  विवादास्पद नहीं रहा। किन्तु हाल ही में पत्रकारिता के क्षेत्र में दिये जाने वाले सम्मानों में शासन ने चुपचाप एक ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय ले लिया, जिसे किसी भी रूप में उचित या विवेकपूर्ण नहीं कहा जा सकता। पता नहीं मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ-जिनका यह विभाग है-को इसकी गंभीरता से अवगत कराया गया या नहीं? क्योंकि निर्णय का संबंध विशेषकर प्रदेश के मालवा क्षेत्र से है, जिसके साथ उनका वास्ता अधिक नहीं रहा, ज्ञातव्य हैै कि प्रदेश में पत्रकारिता के सम्मानों का यह सिलसिला मुख्यतौर पर मालवा क्षेत्र के मूर्धन्य, सर्वमान्य, आदर्श, अद्वितीय एवं महामना पत्रकार श्री माणिकचन्द्र वाजपेयी के नाम से प्रारंभ हुआ था। इस बार सरकार ने उन सम्मानों में से श्री वाजपेयी का नाम विशुद्ध राजनैतिक कारणों से हटा दिया, जो निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण एवं दुखद है। शासन के इस निर्णय का प्रदेश का संपूर्ण पत्रकारजगत निंदा करेगा, क्योंकि एक निर्विवाद, निस्पृह एवं समर्पित पत्रकार के रूप में श्री वाजपेयी नि:संदेह अद्वितीय हैं। वे सर्वमान्य हैं और ऋषितुल्य माने जाते हैं। 

स्वदेश ने जब भोपाल में अपने प्रकाशन के 25 वर्ष पूरे किये थे, तब उसका 'रजत जयन्ती समारोह' जो देश के उप प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी के मुख्य आतिथ्य में आयोजित था, उसमें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने स्वदेश के पूर्व प्रधान संपादक स्व. श्री माणिकचन्द बाजपेयी को स्मृति में 'ध्येय निष्ठ पत्रकारिता' के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार प्रारंभ करने की घोषणा की थी। यह मध्य प्रदेश में पत्रकारिता के लिये मध्यप्रदेश शासन द्वारा प्रारंभ किया गया पहला राष्ट्रीय पुरस्कार था। इस आयोजन को व्यापक बनाने के लिये बाद में दो राष्ट्रीय और प्रदेश के 7 संभागों के लिये उन क्षेत्रों के वरिष्ठ पत्रकारों के नाम से प्रादेशिक पुरस्कार प्रारंभ किये गये। कालांतर में राजनैतिक रिपोर्टिंग, फोटोग्राफी और इलेक्ट्रानिक माध्यमों में भी पुरस्कार दिये जानेे लगे। देश में पत्रकारिता के क्षेत्र में मध्यप्रदेश शासन के ये पुरस्कार अत्यंत सम्मानित एवं प्रतिष्ठित माने जाते हैं। विगत पुरस्कार समारोह में विचारपूर्वक पूर्व मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने 'पुरस्कार' के स्थान पर इन्हें 'सम्मान' का नामाभिधान प्रदान कर, सम्मान राशि में भी सम्मानजनक वृद्धि की । इसने इस सम्मान को और अधिक ऊंचाई प्रदान की। अब यह देश के अत्यंत 'प्रतिष्ठित' आयोजनों में  गिना जाता है।

किन्तु प्रदेश को नई सरकार ने इस वर्ष पत्रकारिता सम्मान के लिये, जिनकी स्मृति में यह आयोजन होता रहा है, उन श्री वाजपेयी का नाम हटाकर, उसके स्थान पर उस सम्मान को श्री राजेन्द्र माथुर के नाम पर कर दिया है। पता नहीं सरकार को नाम परिवर्तन की यह 'उदात्त प्रेरणा' किन महानुभाव ने प्रदान की, किन्तु इससे तो सबसे अधिक पीड़ा और ठेस स्व. राजेन्द्र माथुर की आत्मा को ही होगी, जिनके नाम का उपयोग देवतुल्य श्री माणिकचन्द्र वाजपेयी का नाम हटाने के लिये किया गया है, जिन्हें स्वयं स्व. राजेन्द्र माथुर भी सब की तरह सम्मानपूर्वक 'मामाजी' के नाम से भी संबोधित करते थे। मध्यप्रदेश की पत्रकारिता का अत्यंत गौरवपूर्ण पक्ष यह है कि पूरा पत्रकार जगत अपनी-अपनी अलग-अलग वैचारिक पृष्ठभूमि के उपरांत भी परस्पर स्नेह, आदर और अपनेपन के सूत्र में बंधा है, किन्तु इस बार एक संकुचित राजनैतिक सोच ने उसे भी बांटने की कोशिश की है।

आपातकाल में जब श्री माणिकचन्द्र वाजपेयी तत्कालीन सरकार द्वारा मीसा में बंदी बनाये गये थे, तो उन्हें रिहा कराने की पहल करने वालों में इन्दौर नई दुनिया के श्री नरेन्द्र तिवारी, श्री राजेन्द्र माथुर एवं सुरेश सेठ अग्रणी थे। आपातकाल के बाद स्वदेश ग्वालियर की फोटो कम्पोजिंग इकाई के उद्घाटन समारोह में श्री अटलजी एवं राजमाता जी के साथ, श्री माथुर विशेष अतिथि बन कर आये थे। 'स्वदेश' और 'नई दुनिया' अलग-अलग वैचारिक प्रतिबद्धता के दो समाचार पत्र थे, किन्तु उनकी पत्रकारिता उन्हें तोड़ती नहीं थी, वह जोड़ती ही थी। प्रतिस्पर्धा उन्हें परस्पर शत्रु नहीं बनाती थी, जैसा कि आज की राजनीति बना रही है। श्री माणिकचन्द्र वाजपेयी प्रदेश के ऐसे मूर्धन्य पत्रकार थे, जिनके 'अमृत महोत्सव' पर देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने  समारोह में कहा था कि मामाजी मेरे से उम्र में बड़े हैं, वो मुझे अपने चरण स्पर्श करने की अनुमति दें। भारत रत्न श्री अटलजी जिनकी वंदना करते हों, उस वंदनीय व्यक्तित्व का मध्यप्रदेश सरकार द्वारा ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण निरादर? और तो और वर्तमान कांग्रेस मंत्रिमंडल में भी ऐसे कई मंत्री निकल आयेंगे, जो उनके लिये वैसा ही भाव रखते हैं, जैसे श्री अटल जी ने प्रकट किये थे। मध्यप्रदेश का शायद ही कोई समाचार-पत्र संस्थान ऐसा होगा, जिसमें श्री वाजपेयी के लेखन एवं जीवन से प्रेरणा लेकर काम करने वाले पत्रकार न हो।

श्री राजेन्द्र माथुर के प्रति यदि सरकार आदर भाव दिखाना चाहती है, तो उनके नाम से नया पुरस्कार या सम्मान घोषित कर सकती थी, परन्तु श्री वाजपेयी का नाम हटा कर उनका जोडऩा, तो श्री माथुर का भी निरादर है और एक वैचारिक शुद्रता का प्रदर्शन है। मध्यप्रदेश का संपूर्ण पत्रकार जगत इस अशिष्टता को कतई स्वीकार नहीं करेगा। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि मध्यप्रदेश में स्व. श्री माखनलाल जी चतुर्वेदी के नाम से स्थापित पत्रकारिता विश्वविद्यालय का प्रारंभ, भाजपा की सुन्दरलाल पटवा सरकार द्वारा ही किया गया था, उन्होंने उस पहल में केवल यह विचार कर पलीता नहीं लगाया कि श्री चतुर्वेदी कांग्रेस के थे। महापुरुषों और विद्वानों का इस आधार पर मूल्यांकन संकुचित और असभ्य आचरण की श्रेणी में आता है। जो निन्दनीय भी है।  असहमति का आदर और सम्मान लोकतंत्र की आत्मा है, इसकी हर हाल में रक्षा की जानी चाहिये। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। हमारा आग्रह है कि शासन अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें, श्री राजेन्द्र माथुर के नाम से कोई नया सम्मान निर्धारित करें एवं श्री माणिकचन्द्र वाजपेयी के नाम से सम्मान को बरकरार रखें एवं पत्रकारिता के इन प्रतिष्ठित सम्मानों की पवित्रता बनी रहने दें। इन्हें दलगत राजनीति का शिकार नहीं बनाया जाए।

राजेन्द्र शर्मा, प्रधान संपादक, स्वदेश भोपाल समूह

साभार - स्वदेश