समस्त जीवों को पानी उपलब्ध हो, यह उनका अधिकार है – भय्याजी जोशी।

दिंनाक: 05 Feb 2019 12:12:16

 


देवगिरी (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने कहा कि भविष्य में भारत को यदि सुजलाम सुफलाम करना है तो दूरदृष्टि रखते हुए उसके लिए पर्याय, उपाय आदि करने के लिए समाज को आगे आना होगा. भगीरथ के अनुरूप ही अपने कार्य को सफलता मिलने तक जिद्दी प्रवृत्ति के साथ उस कार्य को निरंतर प्रारंभ रखना चाहिए. यश सफलता हमारे हाथ में है. सरकार्यवाह महात्मा फुले कृषि प्रतिष्ठान औरंगाबाद व कवयित्री बहिणाबाई चौधरी उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय जलगांव द्वारा आयोजित जल संवाद 2019 विषय पर आयोजित कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे.

कार्यक्रम में उपस्थित जल विषय पर कार्य करने वाले जल सेवकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि बादल यह आकाश लोक के जलदूत हैं और हम भू लोक के जलदूत हैं. अब आकाश के जलदूतों की भू लोक के जलदूत से दोस्ती होनी चाहिए. जल व्यवस्थापन के कार्यों में होने वाली कमियां व जन समस्याओं का गंभीर आंकलन ना होने के कारण आज जल की बड़ी विकराल समस्या निर्माण हो रही है. इस पृथ्वी पर जो-जो सजीव हैं, उन्हें सबको जल मिलना उनका मौलिक अधिकार है. इस अधिकार को कोई भी नहीं छीन सकता, किंतु आज जल पैसे से खरीदने का समय आ गया है जो एक गंभीर बात है.

कुल मिलाकर जल संवाद कार्यक्रम की ओर देखा तो यह जल खोजने के लिए किया गया एक कार्य होने की बात सामने आती है. इसी प्रकार से जल जागरण के लिए उठाए गए सकारात्मक कार्य दिखाई देते हैं, जल यह पंचमहाभूतओं में से एक तत्व है, बिना जल के मानव जीवन का जागृत होना असंभव है.

पंचमहाभूतों में से एक भी तत्व न होने पर मानव जीवन अधूरा होते हुए उसके अस्तित्व के बिना सजीवों का आश्रित रहना संभव नहीं है. किंतु सिर्फ अस्तित्व रखना उपयोगी नहीं है, बल्कि उस की उपलब्धता अत्यधिक बड़े पैमाने पर होनी चाहिए. उपलब्धता ना होने पर कमी निर्माण होती है, जबकि बढ़ोतरी होने पर नुकसान होता है. इसके कारण पंच महाभूतों का समतोल बिना किसी बाधा के सुचारू रखना अत्यधिक आवश्यक है. भय्याजी जोशी ने पानी के साथ साथ वृक्षों का संवर्धन व पौध रोपण करने के लिए जैन उद्योग समूह की प्रशंसा की. उनके द्वारा किए पौधारोपण के चलते आज क्षेत्र में अच्छी बारिश दिखाई देती है. इससे ही पानी एवं वृक्ष का संबंध ध्यान में आना चाहिए. उन्होंने जल संवर्धन के साथ-साथ वृक्ष संवर्धन को भी आवश्यक बताया.

उन्होंने कहा कि आज की शिक्षण प्रणाली से सभी कुछ हासिल किया जा सकता है, यह बिल्कुल सही नहीं है. उन्होंने झाबुआ जिले के शिव गंगा नामक प्रकल्प का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां पर एक भी उपाधि प्राप्त या इंजीनियरिंग का व्यक्ति नहीं है. किंतु सभी अपने काम में विशेषज्ञ हैं. यह प्रकल्प आज देश की पहचान निर्माण कर रहा है. उच्च शिक्षित ना होते हुए भी सकारात्मक कार्य किया जा सकता है. अनुभव से अत्यधिक सधे हुए लोगों को अपने साथ जोड़कर बड़े बड़े प्रकल्प का अभियान पूरे किए जा सकते हैं.

उन्होंने कहा कि सभी सुविधाओं की प्राप्ति के लिए सरकार पर निर्भर रहना योग्य नहीं है, शासन के पास से सहायता लेकर लोक सहभाग से कार्य किए जाने चाहिए. बहुत सारे स्थानों पर शासन के कार्यों पर स्थानीय लोगों ने अविश्वास दिखाया है. आजकल लोक सहभाग से अनेक प्रकल्प सफल होते दिखाई देते हैं. अभी भी बहुत से लोग जन जागृति से आगे आ रहे हैं, उनके कार्यों को समर्थन देते हुए सहायता के लिए आगे आना चाहिए.

देश की सप्त गंगा अर्थात् गंगा, गोदावरी, यमुना, सरस्वती, कावेरी व नर्मदा नदियों को एक दूसरे के साथ जोड़ा जाए तो देश की जल समस्या हमेशा के लिए खत्म हो सकती है. यह कार्य अत्यधिक धैर्य व मेहनत का है. पानी का होने वाला अपव्यय, बर्बादी, रासायनिक खादों के पानी पर होने वाले परिणामों के बारे में भय्याजी ने कहा कि आज बहुत से स्थानों पर बड़ी मात्रा में पानी उपलब्ध है, किंतु उसकी होने वाली बर्बादी के लिए देखभाल की आवश्यकता है. जितना पानी की आवश्यकता है उतने ही पानी का यदि हमने प्रयोग किया तो जल का बहुत बड़े अपव्यय को रोका जा सकता है.

हरित क्रांति के कारण अनेक लाभ अवश्य हुए हैं, किंतु हरित क्रांति के कारण संकरित बीज का निर्माण भी हुआ है. जिसके साथ साथ रासायनिक खाद भी आगे आए हैं. उनके बढ़ते प्रयोग से अनावश्यक कीटों का नाश करने के लिए कीटनाशक भी आए. इन सब से मिलने वाले विषैले अन्न, धान्य से नए-नए रोग फैल रहे हैं. जिस कारण आज जैविक खेती को प्रमुखता दी जानी चाहिए.

भविष्य में भारत को यदि सुजलाम सुफलाम रखना है तो दूर दृष्टि रखते हुए इन सब के लिए कुछ उपाय करने की दृष्टि से समाज को आगे आना चाहिए. इन कार्यों के लिए जो आगे आ रहे हैं उन्हें सहायता व प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए. इस कार्यक्रम में उपस्थित सभी जलदूत यह भागीरथ ही हैं. उन्हें 01 दिन सफलता अवश्य मिलेगी, यह आशा व्यक्त करते हुए सरकार्यवाह जी ने अपने प्रबोधन को विराम दिया.