शिक्षा में संस्कृति बोध

दिंनाक: 19 Mar 2019 16:33:33


प्रत्येक समाज में एक लम्बे अनुभव से निकलते-निकलते कुछ विशेषताएं बन जाती हैं उनकों हम संस्कृति की विशेषता कहते हैं। हमारे यहां पर कहा गया कि यह समाज में संस्कारयुक्त व्यवहार से संस्कृति की विशेषता उत्पन्न होती है तो यह संस्कार क्या है? अब कोई न कोई क्रिया होगी जब उसका कोई न कोई अवशेष रह जाएगा तो वह संस्कार है। हथोड़ा मारा हमने तो एक निशान छूट गया, जो निशान छूट गया वह संस्कार है। संस्कार के संदर्भ में भी हमारे पूर्वजों ने सोचा और उन्होंने उसकी एक व्याख्या की। इसकी मीमांसा में हमारे ऋषि कहते हैं कि विशेष गुणवृद्धि होना ही संस्कार है और शंकराचार्य ने अपने ब्रह्मसूत्र के भाष्य के अंदर उसको और विस्तृत रूप से व्याख्यायित किया। उन्होंने ‘’दोषापनयेन गुणाधान संस्कार:’’ के रूप में संस्कार शब्द की परिभाषा की। हमारे जीवन में जो दोष हैं, कमियाँ हैं, उनको निकाले और जो सद्गुण हैं उनको ग्रहण करें, यह जो निकालने और ग्रहण करने की प्रक्रिया है, यही संस्कार है। इसी संस्कार के माध्यम से धीरे-धीरे जीवन के व्यवहार की विशेषताएं प्रकट होंगी और इसलिए जब हम भारतीय संस्कृति की विशेषताओं के सम्बन्ध में जो भी विचार प्रस्तुत करते हैं वे विशेषताएं एक दिन में पैदा नहीं हुई हैं।


भारतीय जीवन में संस्कार की बहुत सी बातें हैं जैसे ‘मातृवत् परदारेषु’, अर्थात् पराई स्त्री को माँ के समान समझो। एक संस्कार है ‘परद्रव्याणि लोष्ठवत्’ अर्थात् दूसरे के धन को मिट्टी के समान समझो। एक अन्य संस्कार है ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ सभी को अपने जैसा या अपनी आत्मा से जुड़ा समझो। हम देखते हैं कि हमारी इन विशेषताओं ने भारतीय समाज-जीवन को एक ऊँचाई प्रदान की। आजकल का जीवन भले ही कुछ अलग हो गया है परन्तु लगभग 1000 साल पहले की हमारी संस्कृति का भारत में आनेवाले ज्यादातर विदेशी समाज के लेखकों ने जो वर्णन किया है, अगर आज आप पढे़गे तो पाएंगे कि यह सारी विशेषताएं उन्होंने जीती-जागते रूप में हमारे समाज में उन्होंने देखीं। हमारे समाज में विद्यमान संस्कारों- यथा अतिथि-सत्कार, दया , करूणा, न्याय, नैतिकता आदि का रूप जैसा उन्होंने देखा, वैसा वर्णन किया। अतः यदि हम पुनः वैसा ही समाज जीवन बनाना चाहते हैं तो समाज में संस्कृति बोध आवश्यक है।
यह जो संस्कृति बोध है समाज के अंदर उसे पीढी दर पीढी स्थानांतरित अथवा हस्तांतरित करने का माध्यम अनेक प्रकार की कलाएं है। जिस प्रकार सामान्यतः अक्षरज्ञान की जो शिक्षा होती है, उसका सम्बंध बुद्धि से होता है, कला का संबंध हृदय से होता है। इस प्रकार बुद्धि और हृदय का परिष्कार करने के लिए हमारे यहां पर साहित्य है, संगीत है, कला है इनको जीवन में बहुत महत्व दिया गया है। संस्कृत में एक सुभाषित है- ‘‘साहित्य, संगीत, कला विहिनः साक्षात पशु पुच्छ विषाणहीनः’’ अर्थात् जिस मनुष्य के जीवन में न तो साहित्य है न कला है न संगीत है न उसकी रूचि है वह मनुष्य तो है परन्तु कैसा है वह बिना पूंछ के पशु जैसा है। जब साहित्य कहेंगे तो उसमें कथा है, कहानी है, कविता है, उपन्यास है, अर्थात् कई तरह से विभिन्न रूपों में विचार और भावना की अभिव्यक्ति हुई है। जब हम संगीत कहेंगे तो स्वरों की दुनिया है वह मुंह से गाए हुए रागों की भी एक दुनिया है और यन्त्रों के माध्यम से स्वरों के जो स्पन्दन निकलते हैं उसकी भी एक दुनिया है उनके अपने-अपने अन्तर हैं।

आजकल इस पर बहुत विश्लेषण किया ज़ा रहा है कि यह जो भारतीय शास्त्रीय संगीत है वह सुकून देता है, मनुष्य तन्मय हो जाता है, तनाव निकल जाता है, क्यों है ऐसा? यह जो भारतीय संगीत है, राग है उसके स्पन्दन ऐसे हैं कि वह दिमाग में तनाव लाने वाली जो बातें है उन सबको हटा देता है। धीरे-धीरे आदमी तन्मय हो जाता है। 1935 में इटली में संगीत प्रेस वार्ता हुई थी मुसोलिनी उस समय तानाशाह था, भारतीय संगीतज्ञ पंडित ओंकारनाथ ठाकुर उससे मिले। उस समय मुसोलिनी को बताया गया भारतीय संगीत में सुबह का राग है, शाम का राग है, दुःख का राग है, सुख का राग है, तो मुसोलिनी ने कहा मुझे पता नहीं है, पर मुझे कुछ दिन से नींद नहीं आ रही है। क्या आपके पास कोई ऐसा राग है जिसे सुनकर मुझे नींद आ जाए। कोशिश करता हूँ यह कहकर ठाकुर जी ने बजाना चालू किया और 15-20 मिनट के अंदर मुसोलिनी गहरी नींद में सो गया। दो दिन तक सोता रहा। तो संगीत की भी एक दुनिया है – दो पेड़ लगा करके अरविन्द आश्रम में प्रयोग किया गया कि एक के सामने माइकल जैक्सन और मैडोना वगैरह का पॉप संगीत बजाया गया और दूसरी तरफ भारतीय संगीत। प्रभाव देखिये कि जिसके सामने भारतीय संगीत बजा उस पेड़ के पत्ते बड़े अच्छे थे और जहाँ पॉप म्यूजिक बज रहा था उसके पत्ते बहुत कटे-फटे और खंडित। लम्बे समय में पॉप संगीत मनुष्य के व्यक्तित्व को आंतरिक रूप से खण्डित कर देता है। इसलिए पॉप म्यूजिक के जितने पॉप स्टार वर्ल्ड में हुए वे तनावग्रस्त हुए, जेलों में गए या आत्महत्याएं की।

इसी प्रकार रंगो और रेखाओं की भी एक दुनिया है – चित्रकला है, मूर्तिकला है, कार्टून बनते हैं, आजकल चित्ररेखाएं है और चित्र बहुत कुछ कह देता है। अगर हम मूर्तियों का निरीक्षण करेंगे तो हमें जीवन के सभी रंग वहां दिखाई देंगे। जैसे रंगों और रेखाओं की एक दुनिया है, वैसे ही भाव और भंगिमाओं की भी एक दुनिया है। दृष्टि इधर की उधर होने से अर्थ बदल जाता है। दृष्टि या नजर अर्थात् देखना। आंख से देखते हैं। तो आंख इधर-उधर घुमाते हैं, लेकिन आंख घुमाने के पीछे भी मनोविज्ञान है। कोण बदलने के साथ भाव और अर्थ बदल जाता है। एक उर्दू की पंक्ति थी, ‘‘नजर ऊंची की तो दुआ बन गई, नजर नीची की तो हया बन गई।’’ कुछ लज्जास्पद काम कर दिया तो नजर नीची हो जाती है। ‘‘ नजर तिरछी की तो अदा बन गई, नजर फेर ली तो कजा बन गई।’’ एक ही दृष्टि है, कोण बदल गया तो अर्थ बदल गया, भाव बदल गया। इसीलिए कहते हैं कि भाव भंगिमाओं की भी एक दुनिया है। भरतमुनि का नाट्य शास्त्र पूरा का पूरा इसी विषय पर केन्द्रित है। यह संसार भी एक नाटक है, हमारे यहाँ सारे ब्रह्मांड के अंदर शिव का तांडव नृत्य उसका प्रतीक है। नटराज का चित्र सारे ब्रह्माण्ड के सृजन और विध्वंस की कहानी है, उसके अंदर ही ध्वंस भी है और संतुलन भी। कला इसकी वाहक होती है और इन सबका अधिष्ठान अध्यात्म है। उसकी बहुत व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है।

 

हमारे पूर्वजों ने कही कि मूलतः एक ही तत्व है उसे सर्व खलिव्दम् ब्रह्म कहा होगा ईशावास्यमिदं सर्वं कहा होगा और उस एक ही मूल तत्व से विविध तत्व बने और इसलिए विविधता में एकता है, इन विविध तत्वों के आपस में सम्बन्ध हैं और इस आधार पर आपसी सम्बन्धों की परिवार संकल्पना के रूप में परिभाषित किया। इस नाते मनुष्य का शरीर भी इन्द्रियां, मन, बुद्धि यह भी एक परिवार है। फिर अपना घर भी परिवार है। कुल भी परिवार है बाकि सब परिवार है। परिवार की संकल्पना से जुड़ना और तब फिर परस्पर सहयोग और परस्पर आश्रितता की भावना स्वभाविक रूप से उसमें से निकलकर आती है। करूणा और संवेदना के बिना यह जुड़ाव संभव नहीं हो पाता है और इसलिए कहा गया है कि हमारी शिक्षाओं का, हमारी कलाओं का उद्देश्य मानव-हृदय को उदात्त बनाना और उसमे करुणा का सृजन करना है। उसकी संवेदना, उसकी जो संवेदनशीलता है, उसकी व्याप्ति बढ़ती चली जाए और इस नाते से यह जो हमारा एक आधारभूत अधिष्ठान है, जो अधिष्ठान संपूर्ण विश्व को एक परस्पर सहयोगी रूप प्रदान करने के अंदर एक आधार देता है, उसका बोध होना। उस बोध के प्रकाश में दीर्घकाल के प्रवाह में बनी हुई संस्कृति की विशेषताओं को शिक्षा और कला के विविध कार्यक्रमों के माध्यम से आने वाली पीढियों के अंदर संक्रमित करते हुए उन सबके मन के अंदर संस्कृति बोध को जाग्रत करना, यह हम सबका उद्देश्य होना चाहिए।