आईये, जानते हैं महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव के किस्से

दिंनाक: 23 Mar 2019 15:13:42


7 अक्टूबर, 1930 को मुकदमे का फैसला सुनाया गया। यह फैसला 281 पृष्ठों पर फैला हुआ था।

अभियुक्तों को निम्नलिखित सजाएं दी गयी थीं -

फांसी – (1) भगतसिंह, (2) सुखदेव, (3) राजगुरु

आजन्म काला पानी— (1) किशोरी लाल, (2) महावीर सिंह, (जो अंडमान में 9 दिन की भूख

हड़ताल में शहीद हुए), (3) विजय कुमार सिन्हा, (4) शिव वर्मा, (5) गयाप्रसाद, (6) जयदेव कपूर, (7)

कमलनाथ तिवाड़ी

क़ैद-ए-बामशक्कत- (1) कुंदनलाल 7 वर्ष और (2) प्रेमदत 5 वर्ष

अजय घोष, सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय और जितेन्द्रनाथ सान्याल को रिहा कर दिया गया। अभियुक्तों ने अदालत का बहिष्कार कर रखा था, इसलिए फैसला सेंट्रल जेल लाहौर में सुनाया गया।

 

जब सरदार भगत सिंह ने कहा – “यह तो और अच्छी बात है कि इस उम्र में फांसी लगे”


सरकारी वकील ने भगतसिंह को बोला सरदार भगतसिंह बड़े दुःख की बात है कि अदालत ने आपको मौत की सजा दी है। भगतसिंह ने उत्तर दिया—“इसमें दुखी होने की कोई बात नहीं, मुझे यह खबर पहले ही मिल गई थी।”

सरकारी वकील ने फिर बोला— “भगत सिंह आप वीर हैं। मैं आपकी वीरता की प्रशंसा करता हूँ। पर इस भरी जवानी में फांसी लगे, उचित नहीं। आप किसी दिन देश के महान नेता बनते।”

भगत सिंह ने फिर उत्तर दिया – “यह तो और अच्छी बात है कि इस उम्र में फांसी लगे। हमारे पुरखे कबीर का यह पद दोहराया करते थे - जिस मरने ते जग डरे, मेरे मन आनंद। मरने ते ही पाइए पूरन परमानन्द।।”

सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च, 1931 को शाम 7 बजे सेन्ट्रल जेल लाहौर में फांसी दी गई। जेल के दूसरे कैदियों को पांच बजे ही गिनती करके अपनी-अपनी बैरकों और कोठरियों में बंद कर दिया गया था। जब क्रांतिकारियों को फांसी की काली वर्दी पहनाकर बाहर लाया गया तो भगतसिंह बीच में थे, सुखदेव उनके बाएँ और राजगुरु दाएं थे। भगतसिंह ने अपनी दांयी भुजा राजगुरु की बांयी भुजा में डाल ली और बांयी भुजा सुखदेव की दांयी भुजा में। तीनों ने ‘इन्कलाब जिंदाबाद’, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे लगाय और समवेत स्वर में गाना शुरू किया-

“दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत

मेरी मिटटी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी।।”

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राजगुरु को बहादुर और सूझ-बूझ वाला मानते थे आज़ाद चन्द्रशेखर

शहीद-ए-आजम भगतसिंह के साथ मातृभूमि की बलिवेदी पर प्राणों की आहुति देने वाले राजगुरु का पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरु था। उनका जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पूना जिले के खेड़ा गाँव में हुआ था। राजगुरु का जीवन शुरू से ही संघर्षमय रहा। जब वे मात्र 6 वर्ष के थे कि उनके पिता का देहांत हो गया। बड़े भाई दिनकर हरि राजगुरु ने ही उनका लालन-पालन किया। उनका बचपन बड़ी गरीबी में बीता। वे 15 वर्ष की उम्र में घर छोड़कर वाराणसी आ गए। वहां वे बड़ी कठिन परिस्थितियों में रहते हुए संस्कृत पढ़ रहे थे। तभी उनका सम्पर्क क्रांतिकारियों से हो गया और वे लाहौर चले गए।

लाहौर में वे भगतसिंह, भगवतीचरण, सुखदेव के क्रांतिकारी दल में काम करने लगे। सर्वप्रथम राजगुरु को क्रांतिकारी साथी शिव वर्मा के साथ यह दायित्व दिया गया कि वह दिल्ली के एक गद्दार साथी को गोली से उड़ाने के अभियान में सम्मिलित होकर अपनी प्रथम परीक्षा में उतीर्ण होकर दिखाएं।

जब चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह ने हत्यारे स्कॉट को लाहौर में मृत्युदंड देने का निश्चय किया तो उस अभियान में राजगुरु को भी सम्मिलित किया गया। आजाद का तर्क था कि राजगुरु बहादुर भी हैं और सूझबूझ वाले भी।  

(स्त्रोत: पाथेय कण)

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जब अलमस्त क्रांतिकारी सुखदेव ने राह चलते पहलवान को जड़ दिया मुक्का

सुखदेव का जन्म पंजाब में लुधियाना जिले के नौघरा गाँव में हुआ था। उनके पिता रामलाल थापर लायलपुर के एक प्रसिद्ध राजनैतिक और सामाजिक परिवार से थे। सुखदेव की स्वयं के प्रति लापरवाही को देखकर उनके साथी उन्हें विल्लेजर (गाँव का रहने वाला) कहते थे। वे थे भी ऐसे ही। जब किसी बात की धुन उन्हें जम जाती थी तो वे परिणाम की परवाह किये बिना उसे कर डालते थे।

एक बार उन्होंने कहीं पढ़ा था कि नाक पर घूंसा लगने पर व्यक्ति काबू में आ जाता है, बस सुखदेव चल दिए इसकी सत्यता की जांच करने। रास्ते में एक पहलवान सरीके व्यक्ति के सामने आने पर उन्होंने बिना कुछ कहे-सुने उसकी नाक पर जोरदार घूंसा जमा दिया। वह पहलवान तुरंत ही सर थाम कर बैठ गया और सुखदेव उसे देखते हुए वहीँ खड़े रहे। जब पहलवान के कुछ होश संभले तो उसनेदेखा कि घूंसा मारने वाला सामने ही खड़ा है। वह सुखदेव पर पिल पड़ा। उसने सुखदेव की खूब पिटाई की, लेकिन सुखदेव ने उसका बिलकुल भी विरोध नही किया। लोगों ने बीच-बचाव किया और सुखदेव से पूछा कि तुमने ऐसा क्यों किया? जब यह पहलवान होश में नहीं था तब भाग क्यों नहीं गए? तो सुखदेव ने कहा ‘पहले मैंने इन्हें मारा। अब यह मुझे मार लें।’ मैं यह देखने के लिए इनके पास खड़ा रहा कि एक घूंसे से किसी व्यक्ति को कितनी देर तक मूर्छा रहती है।

जेल में भी वे अलमस्त ही रहते थे। आखिर 7 अक्टूबर, 1930 को भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गई। जनता ने इसके विरोध में आन्दोलन किया तो सुखदेव ने जेल से सन्देश दिया कि ‘वास्तव में हमारी सजाओं को बदल देने से देश का उतना भला नहीं होगा, जितना फांसी पर चढने से।’

23 मार्च, 1931 को जब सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु को फांसी के तख्त पर लाया गया तो सुखदेव ने जी भर कर ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ के नारों के साथ-साथ भगतसिंह जिंदाबाद तथा राजगुरु जिंदाबाद के भी नारे लगाए। उन्होंने बड़ी हसरत भरी निगाहों से फांसी से फंदे को देखा और फंदे को चूमकर अपने ही हाथों से गले में डालकर बलिदानी पथ पर बढ़ गए।

(स्त्रोत: पाथेय कण; 01-11-2007; द्वारा ललित मोहन शर्मा)