वंचित समाज का भगवान बना मानवता का चिकित्सक.

दिंनाक: 23 Mar 2019 15:30:37


निजी चिकित्सक के बारे में आज समाज में एक धारणा बन चुकी है, कि शल्य क्रिया हो या चिकित्सकीय फीस वसूलने का अवसर चिकित्सक सामान्यत निर्दयी और असंवेदनशील दिखाई देते हैं. इस सामाजिक अविश्वास के बीच करीब 22 वर्ष पूर्व एक ऐसा चिकित्सक भी निकला जो भौतिक सुविधाओं से युक्त जीवन शैली त्यागकर घनघोर जंगलों में उस वंचित समाज के सेवा के लिए पहुँच गया, जो न केवल शिक्षा, चिकित्सा और सामान्य भौतिक संसाधनों से वंचित था बल्कि शरीर पर वस्त्र, बच्चों की शिक्षा, बीमारी अथवा घायल अवस्था में उपचार और भरपेट भोजन की कल्पना भी जिसके लिए सपने जैसा था.

दमोह जिले के ग्राम बांसा-तारखेड़ा में वर्ष 1936 में जन्मे तथा इसी गाँव में आयुर्वेद से चिकित्सा व्यावसाय करने वाले डॉ. रमाशंकर राजपूत मध्यप्रदेश के डिंडोरी जिले के वनग्रामों में निवासरत वंचित आदिवासी समाज के बीच ऐसे शल्य चिकित्सक बन गए हैं कि जिन्हें आदिवासी समाज को सामाजिक कुरीतियों और व्यसनों के मुक्तिकर्ता के रूप में जाना जाता है. 65 वर्ष की उम्र में पत्नी के देहावसान के बाद मन में समाजसेवा का ऐसा भाव जागृत हुआ की घर-परिवार सब छोड़कर करीब 300 किमी दूर डिंडोरी जिले के ग्राम कोसमडीह के जंगल में पहुँच गए और सेवाभारती से जुड़कर वंचित आदिवासी समाज को निशुल्क चिकित्सा सुविधा, निशुल्क शिक्षा, भोजन और कपडे जैसी सुविधा और रोजगार देकर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ दिया. जिस आदिवासी समाज ने शिक्षा की कल्पना नहीं की थी, वहां स्वयं के प्रयासों से सेवाभारती का आठवीं कक्षा तक का आवासीय विद्यालय स्थापित करवाया. आरम्भ में इस विद्यालय में दो कक्षाएं तथा 20 छात्र थे, लेकिन वर्तमान में 200 जनजातिय छात्र यहाँ अध्ययनरत हैं. आठवीं कक्षा के बाद छात्र आगे की शिक्षा भोपाल, ग्वालियर और दिल्ली जैसे शहरों में सेवाभारती द्वारा संचालित आवासीय विद्यालयों से प्राप्त कर रहे हैं, साथ ही कई विविध सामाजिक क्षेत्रों में उपलब्धियां अर्जित कर रहे हैं. डॉ राजपूत की उम्र अब 83 वर्ष हो गयी है, परिजन अब उनकी सेवा करना चाहते हैं, सो मान-मन्नवल कर घर वापस ले आये लेकिन घर रहकर भी वंचित समाज की सेवा का भाव समाप्त नहीं हुआ है. अब वह घर रहकर हीं वनग्रामों में संचालित प्रकल्पों की चिंता कर रहे हैं.

जनजातीय भाषा बोली तब मिला अपनापन   

डॉ राजपूत बताते हैं कि सुदूर जंगलों में बसे बेगा और गौड़ आदिवासी समाज के बीच फैली बुराईयों को दूर करने और स्वावलंबी बनाना इतना आसान नहीं था. जनजातियों के बीच पहुंचकर जब उन्हें अपनी भाषा में समझाते थे तो वह समझने को तैयार नहीं थे, मज़बूरी में उन्होंने गौड़ जनजाति में बोली जाने वाली उनकी अपनी भाषा सीखी, उनकी भाषा में बात की तब उनमें अपनापन दिखा. गाँव-गाँव घूमकर उनका निशुल्क उपचार किया, दान में मिले पुराने कपडे धोकर और प्रेस करके उन्हें अपने हाथों से पहनाया, इस तरह उनका विश्वास जीता फिर बुराइयाँ दूर की. गाँव के 58 घरों में से 53 में शराब बनाई और सेवन की जाती थी, पुरे गाँव को शराब बनवाना और पीना छुडवाया. इस पुरे ग्राम को शराब मुक्त बनाया, हालाँकि इस बीच दिक्कतें बहुत आईं, उनका सामना किया और सफलता अर्जित की. डॉ राजपूत ने सेवाभारती के अधिकारी विष्णु जी के सहयोग से गाँव में 3-3 बकरियां दान दीं. प्रतिवर्ष एक-एक बकरी वापस लेकर दूसरे परिवारों को दी और इस तरह सबको आत्मनिर्भर बना दिया.

 

गरीब का दर्द न दिखा तो बन गए सर्जन

डॉ राजपूत वैसे तो आयुर्वेद चिकित्सक हैं लेकिन आदिवासी समाज का सेवा भाव कि उन्होंने एलोपैथी और शल्य चिकित्सकों के साथ भी कार्य करना सिखा. डॉ राजपूत बताते हैं की एक बैगा मरीज को कुल्हाड़ी लगी, इस घायल को न देखा गया तो उपचार किया और 28 टाँके लगाये. उपचार के बाद उस मरीज ने पैसे देने का अनुरोध भी किया लेकिन नहीं लिए. उसके बाद वह यथासंभव राशी दानपात्र में सौंपकर डॉ राजपूत से हमेशा के लिए जुड़ गया. इसी निस्वार्थ सेवा का परिणाम आज सामने है कि जब डॉ राजपूत नर्मदा परिक्रमा करने निकले तो ग्रामीणों ने जगह-जगह उनका अभिनंदन किया.

 

विरोधियों ने ध्यानकक्ष को बताया हथियार फैक्ट्री

सेवाभारती द्वारा जंगल में संचालित ध्यान केंद्र को विरोधियों ने संघ की हथियार बनाने की फैक्ट्री बताकर पुलिस थाने में शिकायत कर दी, पुलिस जब वहां पहुंची तो उसने पुरे परिसर का गहन निरिक्षण किया लेकिन हथियार के नाम पर वहां कोई वस्तु नहीं मिली तो पुलिस क्षमा-याचना करके वापस लौट गई. इसी प्रकार से धर्मान्तरण के उद्देश्य से बूटियाखेड़ा में इसाई मिशनरी ने भी एक चर्च स्थापित करना चाहा लेकिन उस वक़्त तक ग्रामीण जागृत हो चुके थे. ग्रामीण आदिवासी समाज ने स्वयं के धर्मान्तरण के कुचक्र को कुचल दिया, मिशनरीज के लोगों को भगाकर चर्च के स्थान पर हनुमान मंदिर बना दिया.