महादेवी वर्मा : एक विरल व्यक्तित्व

दिंनाक: 26 Mar 2019 13:36:16


 छायावाद के प्रतिनिधि कवियों में महादेवी का नाम आदर के साथ लिया जाता है ।उनका स्मरण करते ही एक विशिष्ट छवि आँखो के सामने उभरने लगती है ।सफेद रंग की सूती साड़ी जिस पर हल्के रंगो की बार्डर और सीधे पल्ले की साड़ी से सिर ढके हुए चेहरे पर शांत भाव और सादगी पूर्ण व्यक्तित्व ही उनकी पहचान है ।

       एक बार फादर कामिल बुल्के के साथ वह चिरगांव आयी थीं ।थोड़ी देर निकुंज (दद्दा की बैठक ) में बैठी बाते करती रही ,हम सभी बच्चो से नाम एवम पढ़ाई के बारे में पूछने लगी ,सबके नामों के अर्थ पूछे हम सभी को उनसे मिलकर आनंद का अनुभव हुआ ।
 
 महादेवी जी दद्दा (गुप्त जी ) को अपना भाई मानती थी और रक्षाबंधन पर हमेशा अपने हाथ से बनाई हुई सुंदर राखियां भेजती थी ।
 
          महादेवी जी ने प्रयाग विद्यापीठ को अपना कार्यक्षेत्र चुना ताकि महिला शिक्षा का विस्तार हो सके ।समाज सेवा का भाव उनके मन में हमेशा रहा और वह भाव दूसरों को शिक्षित करके उन्हे आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त करके पूरा भी किया ।उनका जीवन सामंजस्यपूर्ण व्यवहार करने की प्रेरणा देता है ।पशु -पक्षी से लेकर गरीब मजदूर और घर में सहयोग करने वाले सदस्यों के प्रति भी उनके मन में अपार स्नेहिल का भाव था ।समाज में रहकर परिवार की चिंता करना शहर में रहकर गाँव के जीवन से जुड़े रहने को उन्होंने प्रमुखता दी ।साहित्य में भी गद्य एवम पद्य दोनो विधाओं में अपने विचार और भावों को व्यक्त किया साथ ही वह एक कुशल चित्रकार भी थी ।
 
            "श्रंखला की कड़ियां "में नारी सम्वेदना का स्वर मुखरित होता है ।रुढ़िवादी दृष्टिकोण को चुनौती देती हुई नारी को अपने अधिकारों के प्रति सचेत किया है ।वह अधिकारों की प्राप्ति शिक्षा द्वारा नहीँ वरन सम्मान से दिलाने की पक्षधर रही ।गद्य लेखन उन्हे रुचिकर लगा इस सम्बंध में उन्होंने स्वयं लिखा है -"विचार के क्षणों में मुझे गद्य लिखना ही अच्छा लगता रहा है क्योंकि उसमें अपनी अनुभूति ही नहीँ बाह्य परिस्थिति के विश्लेषण के लिये भी पर्याप्त अवकाश रहता है ।
 
           "राम की शक्ति पूजा "के माध्यम से निराला जी ने जो जागरण का काम किया वही काम महादेवी जी ने "श्रंखला की की कड़ियां "के माध्यम से किया ।साहित्य सृजन के क्षेत्र को उन्होने और जिस तरह यशोधरा को अपने लक्ष्य में बाधक मानकर गौतम बुद्ध ने उनका त्याग करके जीवन के सत्य की खाज की उसी तरह महादेवी जी ने अपने साहित्य के क्षेत्र में आने वाले व्यवधानो को अस्वीकार किया और गृहस्थ जीवन का परित्याग कर दिया और आजीवन साहित्य साधना में लगी रही ।उन्होंने साहित्यकार संसद की स्थापना विश्व परिवार के ध्येय से की हालांकि यह प्रयास सफल नहीँ हो पाया ।
 
           अतीत के चलचित्र ,पथ के साथी आदि उनकी गद्य कृतिया रहीं । यामा ,नीहार ,रश्मि ,दीपशिखा ,सांध्यगीत आदि काव्य कृतियों का उन्होंने प्रणयन किया ।यामा में चित्रात्मक भाषा से मन एकाकार होता है तो नीहार में सेतालीस कविताओं का संग्रह है इसमे कोमल एवम संगीतमय शब्दावली का प्रयोग है ।सृजन कार्य को वह स्वतः प्रेरित मानती है इस सम्बन्ध में उनका कहना है -
   "जैसे समुद्र में अनेक लहरें रहती है ऊँची लहर भी समुद्र की है इसलिये मै कह नहीँ सकती कि इसमे कौन सा सम्वेदन महत्व का है किंतु अधिकांशतया तब लिखती हूँ जब मेरा मन लिखने के लिये उत्सुक होता है ,किसी के कहने पर भी नहीँ लिख सकती ,आदेश पर भी नहीँ लिख सकती हूँ ।"
          महादेवी जी के काव्य पर छायावाद का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है ।कुछ आलोचक उनकी कविताओं में रहस्यवाद का आभास पाते है लेकिन अज्ञेय जी के अनुसार छायावाद एवम रहस्यवाद दोनो कि ही झलक उनके गीतों में है क्योंकि उन्होंने छायावाद के मार्ग से गुजरकर ही रहस्यवाद तक पहुँचने का अंतर्मुख प्रयास किया है ।वास्तव में महादेवी जी ने छायावाद /रहस्यवाद को स्वीकारते हुए भी यथार्थ जीवन कि समस्याओं को अनदेखा न करते हुए भी अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई है ।
 
          एक कुशल चित्रकार के रूप में भी उनकी अलग पहचान है उनके चित्र बोलते हुए से जीवंत प्रतीत होते है जो बात कविता में नहीँ आ पाती उसे व्यक्त करने के लिये चित्र और जो बात चित्र में नहीँ आ पाती उसे कविता व्यक्त कर देती है ।उनके चित्रों में नारी की प्रधानता है ।जिस प्रकार गीतों में महादेवी जी का व्यक्तित्व झलकता है उसी तरह चित्रों में उनकी मनस्थिति क्क बिम्ब प्रस्तुत होता है अपने गीत और चित्रों के बारे  में महादेवी जी ने कहा है -
     मेरे गीत और चित्र दोनो के मेल में एक ही भाव रहना जितना अनिवार्य है उनकी अभिव्यक्तियों में अंतर उतना ही स्वभाविक ।गीतों नमी विविध रूप ,रंग ,भाव ,ध्वनि सब एकत्र है पर चित्र में इन सबके लिये स्थान नहीँ रहता -- इसी से मेरा चित्र गीत को एक मूर्ति पीठिका मात्र दे सकता है उसकी सम्पूर्णता बांध लेने कि क्षमता नहीँ रखता ।"
       होली पर उनके जन्मदिन पर उनका स्मरण आना स्वभाविक है आज वह भौतिक रूप में हमारे बीच नहीँ हैं लेकिन उनकी रचनायें और गीतों के माध्यम से वह चिर स्मरणीय रहेंगी उनके साहित्य के अवदान को कभी भुलाया नहीँ जा सकता ।ऐसा लगता है मानो जीवन के अंतिम पड़ाव का स्मरण करके ही उन्होने इन कालजयी पंक्तियों ली रचना कि हो --
तोड़ दो यह क्षितिज 
मै भी देख लूँ उस ओर क्या है 
 जा रहे जिस पंथ से युग 
कल्प उसका छोर क्या है ।
 
 
 
  - कुंकुम गुप्ता