बाबा साहेब अंबेडकर का राष्ट्रवाद

दिंनाक: 14 Apr 2019 13:12:03


महान आत्माएं सम्पूर्ण मानवता की होती है, मगर दुर्भाग्यवश इनके तथाकथित अनुयायी स्वयं की संकीर्णताएं जैसे देश जाति समुदाय उन पर थोपते हैं। भारत में धार्मिक एवं सामजिक नेताओं का राजनैतिक दलों ने जिस प्रकार बंटवारा किया है, वह सामान्य व्यक्ति को दुखी करता है। सरदार पटेल एवं डॉ. अम्बेडकर इनके नामों का दुरुपयोग राजनैतिक स्वार्थ के लिए धड़ल्ले से हो रहा है। तभी तो डॉ. आम्बेडकर के समर्थक कहे जाने वाले छात्र भारत विरोधी नारे लगाते हैं। समय-समय पर कबाड़खाने से निकालकर महापुरुषों की ब्रांडिग की जाती है, मगर कुर्सी पर विराजने वालों का चाल, चरित्र और चेहरा वही रहता है। शोषण से व्यथित जनता अच्छे दिनों की लालसा में नए लोगों को चुनती है, मगर नतीजे में अंतर नहीं आता।

विरासत को हड़पने के लिए विभिन्न दलों में होड़ मची है उनकी मूर्तियों का अपमान करके राष्ट्रभक्ति दिखाई जा रही है जबकि बाबा साहब ब्राम्हणों नहीं ब्राम्हणवाद के विरुद्ध थे उनकी सारी प्राथमिकताएं राष्ट्र के लिए थीं राष्ट्रभाषा संस्कृत हो इसके समर्थक थे। नोटबंदी एवं रिज़र्व बैंक उनके विचारों का परिणाम है मगर दुर्भाग्यवश उनके समर्थक एवं विरोधी अपना अपना एजेंडा लागू कर देश को तोड़ने में लगे हुए हैं। स्वार्थी अनुयायियों के आधार पर डॉ. आम्बेडकर को राष्ट्र एवं हिन्दू विरोधी तथा अंग्रेज परस्त कहा जाता है, जबकि स्वार्थी तत्व किसी के सगे नहीं होते। वह साइन बोर्ड लगाकर अपनी दुकानदारी चलाते हैं।

डॉ. अम्बेडकर का जन्म महू इंदौर में हुआ। अंग्रेजों से पराजय के बाद भारतीय समाज आत्महीनता की दशा में था। भीमराव ने छुआछूत अपमान गरीबी से लड़ते हुए मानवसेवा का व्रत लेकर आगे बढ़ते रहे। इस समय उन्हें सज्जनों से प्रेम एवं सहयोग भी मिला। इनमे अपना जाति नाम (अम्बेडकर) ब्राह्मण शिक्षक भी थे जिनके विश्वास को भीमराव ने अमर कर दिया। क्रिश्चन स्कूल में अपेक्षाकृत कम छुआछूत थी लेकिन पिता की मृत्यु के बाद गरीबी भयानक थी। गायकवाड राजा की छात्रवृति से कोलंबिया में अर्थशास्त्र के पीएचडी कर भारत वापस आने पर सेना सचिव के उच्च पद के बावजूद छुआछूत का दंश डसता रहा। बम्बई में प्रोफेसर एवं लन्दन से लॉ के बाद 1923 से वकालत शुरू की और कांग्रेस की दोहरी नीतियों को समझते हुए अंग्रेजी सहयोग से वंचित समाज को बदलने का प्रयास किया। मगर अंग्रेज उन्हें गांधी के विरुद्ध मोहरे के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते थे।

अंग्रेज राष्ट्रीय आंदोलन को सवर्ण हिन्दुओं का विरोध सिद्ध करना चाहते थे। मुसलमान और सिखों के सांप्रदायिक आरक्षण के बाद दलित आरक्षण का कार्ड खेला। गांधी ने आमरण अनशन किया। तब मदन मोहन मालवीय के कहने पर डॉ. अम्बेडकर ने राजनितिक कैरियर को दांव पर लगाते हुए पूना समझौता किया। इस महान बलिदान ने अंग्रेजों के ‘दलितिस्तान’ मंसूबे को विफल कर दिया। डॉ. आंबेडकर ने मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक जलाशय उपयोग, मजदूर एवं आदिवासी एकता जैसे जागरण एवं आन्दोलन किये। उन पर अनेक शारीरिक एवं मानसिक हमले हुए। 1935 छुब्ध होकर उन्होंने घोषना की कि मै हिन्दू पैदा हुआ हूँ पर मरूंगा नहीं।

तब इसाई एवं मुसलमानों के अनेक प्रलोभन प्राप्त होने लगे। मगर अभी भी राष्ट्रीय एकता के लिए जहां भी जरूरत हुई कार्य करते रहे। विभाजन निश्चित हो जाने पर संविधान निर्माण की बड़ी जिम्मेदारी अकेले अपने कंधे पर ले ली। संविधान निर्माण के बाद नेहरू के आग्रह पर वाणिज्य एवं विधि मंत्रालय में स्वप्नदृष्टा के रूप में मूलगामी कार्य किये। हिन्दू कोड बिल में सभी गैर मुस्लिम व ईसाईयों को हिन्दू घोषित करके सामजिक एकता को विधायी जामा पहनाया। एकलव्य की तरह बार-बार छल किया जाता रहा।

अंग्रेज एवं नेहरू के बाद अब अनुयायियों के लिए वह सत्ता की सीदी हैं। अंग्रेजों ने यदि शिक्षा के 3 लाख फण्ड को लटकाया तो नेहरू ने संविधान बनवा कर उपेक्षित कर दिया। सदन में त्याग पत्र के बाद वतव्य देने एवं लाइब्रेरी में पुस्तकें लगाने जैसे छोटे आग्रहों को भी ठुकरा दिया था, जीवन के अंतिम समय में धर्म छोड़ते समय भी उन्होंने राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखा स्वयं कष्ट सहे अपमान भोगा फिर भी राष्ट्र व संस्कृति का भला किया ईसाई या मुसलमान के रूप में परिवर्तन से होने वाली अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को निर्भीकता पूर्व पूर्वक उल्लेख किया है हिन्दू धर्म छोड़ने के 21 वर्ष पूर्व कही गई व्यथा को जिम्मेदार लोगों द्बारा उपेक्षा करने पर भी भारत में जन्मे बौद्ध धर्म का अनुगमन करके महान राष्ट्रीय कार्य किया।

उन्होंने बहुसंख्यक वर्ग को गैर छत्रिय घोषित करके लड़ने के अधिकार से वंचित करना हमारी दुर्दशा का प्रमुख कारण है राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगों के बीच जाति नस्ल रंग का अंतर भुला कर उनमे सामाजिक बंधुता को सर्वोच्च स्थान दिया जाय। मार्क्स का दर्शन है कि हिसा या बदला, जबकि बुद्ध प्रेम के द्बारा परिवर्तन चाहते थे। धर्म आत्मसंतोष व स्वभिमान की चेतना लाता है इस आध्यात्मिक प्रेरणा से ही डॉ. अम्बेडकर संचालित रहे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रमों के वह प्रशंसक थे मगर वर्ण व्यवस्था का समर्थन एवं अत्यंत धीमी गति के कारण कभी नहीं जुड़े।

अपने जीवन काल में ही समाज का अधिकतम कल्याण अपने तरीके से करना चाहते थे अम्बेडर को अलग-अलग समय में अलग-अलग लोगों ने धोखा दिया यह सिलसिला इनके निर्वाण के बाद भी निरंतर चल रहा है वह दलित समाज के अन्दर पैदा होने वाले स्वार्थी एवं शोषक तत्वों की पहचान रखते इसीलिए आरक्षण व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा करके क्रीमीलेयर को बाहर रखना चाहते थे’ दुर्भाग्यवश वंचित वर्गों के

लिए आरक्षित शासकीय सेवाए एवं राजनैतिक अवसर 1 प्रतिशत क्रीमीलेयर में सिमट गई यह स्वार्थी वर्ग जोर शोर से समाज में मतभेद फैलाते हैं, जबकि वंचित समाज के अधिकारों का संपूर्ण शोषण यही क्रीमीलेयर करता है और सत्ताधारियों का एजेंट बना हुआ है।

निहित स्वार्थ के लिए वंचित समाज को मूर्ख बनाये रखने के षड़यंत्र में शामिल है किसी व्यक्ति के बड़प्पन मापने का कोई सर्वमान्य आधार नहीं है पर विपरीत परिस्थिति सहयोगियों की संख्या संगठन का बल उपेक्षा छल एवं धोखे के बावजूद जनकल्याण की जिजीविषा एवं भविष्य को प्रभावित करने वाले विचार ऐसा आधार है जिस कसौटी पर देखे तो डॉ. अम्बेडकर कर्ण की तरह उपेक्षा के बावजूद अपना पौरुष प्रमाणित करते है शिव की तरह छुआ छूत का विष पी कर एकता का अमृत देते हैं, एकलव्य की तरह कपटी लोगों की शिकायत नहीं करते हैं सनयात सेन के तरह निर्वाण के बाद दिनों दिन और प्रासंगिक होकर इतिहास में लम्बी छाया के रूप में उभरते है, चम्बल की गोद में जन्मा मां भारती का लाल उपेछित बीहड़ को हरा भरा एवं जीवन से भरपूर करने के कठिन पथ पर निरंतर बह रहा है।

- एस. एन. पांडेय 

लेखक मध्यप्रदेश शासन में प्रशासनिक अधिकारी है ।