हां, मैं भी बाबरी भंजक हूं और प्रज्ञा के साथ हूँ - प्रवीण गुगनानी

दिंनाक: 23 Apr 2019 14:25:15


एक प्रश्न बड़ा प्रासंगिक है इन दिनों कि साध्वी प्रज्ञा को गुस्सा क्यों आ रहा है और इस गुस्से में वे हेमंत करकरे को क्यों कोस रहीं हैं व बाबरी विध्वंस में स्वयं की भागीदारी क्यों जगजाहिर कर रहीं हैं?!! इस गुस्से के विषय में प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात के शिष्य व सिकंदर के गुरु अरस्तु ने कहा था –

“Anybody can become angry — that is easy, but to be angry with the right person and to the right degree and at the right time and for the right purpose, and in the right way — that is not within everybody's power and is not easy.”  अर्थात "कोई भी क्रोधित हो सकता है - यह आसान है, लेकिन सही व्यक्ति से सही सीमा में सही समय पर और सही उद्देश्य के साथ सही तरीके से क्रोधित होना सभी के बस कि बात नहीं है और यह आसान नहीं है।" तो साध्वी का गुस्सा सामयिक और सटीक है, वे सही उद्देश्य हेतु सचमुच दोषी व्यक्ति पर गुस्सा कर रहीं हैं और सही समय पर कर रहीं हैं. भला लोकतंत्र में गुस्सा व्यक्त करने का इससे अच्छा, सटीक और उपयुक्त अवसर और कौन सा हो सकता है. इस अवसर पर साध्वी की तर्ज पर मुझे और मेरे जैसे करोड़ो नागरिकों को भी गुस्सा आ रहा है और इस सर्वथा प्रासंगिक शिकायत के स्वर में स्वर मिलाने को देश का बहुसंख्य वर्ग उत्सुक है. यदि मैंने बाबरी का, हेमंत करकरे के अत्याचारों का, करकरे व दिग्विजय सिंग की दुर्भि संधि का आज प्रतिकार न किया व उसके प्रति आक्रोश व्यक्त न किया तो फिर कब करूँगा ?!

 

         साध्वी के गुस्से को न्यायोचित ठहराने के लिए उनके कुछ समर्थक भाई यह भी कह रहें हैं कि उन्होंने जो पीड़ा सही है वह अनजाने में फूट पड़ रही है. ऐसा नहीं है, साध्वी जी ने अपनी जेल के दौरान पुलिस और विभिन्न बलों की यातनाओं को बड़ी वीरता से सहन किया है और इतनी नारकीय व पाशविक यातनाओं को सहन करने के बाद भी वे अपने लक्ष्य न भटकी न डिगी !! वे अब भी भावनाओं को नियंत्रण में रखकर चूप्पी रख सकती थी क्योंकि हमने उन्हें पिछले दशक भर के उनके हलचल भरे जीवन में कभी भी अति प्रतिक्रया व्यक्त करते न देखा और न ही कभी वे समाज से सहानुभूति की आस रखकर किसी अनुभव को साझा करते दिखाई दी. वे अब भी एक दक्ष, सिद्ध व परम सन्यासी की भांति चुप रह सकती थी किंतु यदि प्रज्ञा जी चुप रहती तो हमारा लोकतंत्र विफल हो जाता. आज वे बोल रहीं हैं तो सुनना समूचे देश और समाज को चाहिए.

 

                   अजीज बर्नी की पुस्तक “आरएसएस की साजिश-26/11” के लेखन और प्रकाशन की चिंता से लेकर इसके विमोचन और विमोचन से लेकर इस पुस्तक की बिक्री आदि की चिंता करने वाले दिग्गी राजा ने उस समय कहा था -

देश में हुई आतंकी घटनायें वस्तुतः आरएसएस की साजिश है. मुंबई हमले से दो घंटे पहले मुझे खुद मुंबई के जांबाज पुलिस अधिकार हेमंत करकरे ने फोन कर बताया था कि मालेगांव धमाके की जांच के कारण उनकी जान को खतरा है, क्योंकि जांच के दौरान इस मामले में कुछ ऐसे हिंदू संगठनों के नाम आए हैं जिनके तार आरएसएस से जुड़े हैं. और उसके दो घंटे बाद ही हेमंत करकरे की हत्या हो गई. 

दिग्विजय यहीं नहीं रुके उन्होंने सरेआम मुंबई बम ब्लास्ट  के लिए पाकिस्तान को पाक साफ बताया था. भला इस देश में किसी घटना से पाकिस्तान की संलिप्तता होने न होने की वकालत करने वाले दिग्विजय सिंह कौन है? अब हुआ बाद में यह कि 

पुस्तक के लेखक अजीज बर्नी तो एक वर्ष बीतते बीतते अपनी पुस्तक  के शीर्षक के लिए क्षमा माँगते कहने लगे कि 

“एक भारतीय नागरिक होने के नाते विदेश नीति के तहत मैं हमेशा सरकार के फैसले का पक्षधर हूं. उस समय सोनिया नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार ने जो कहा वही मैंने लिखा”. उस दिन स्पष्ट हो गया था कि अजीज बर्नी की इस पुस्तक की पटकथा दिग्विजय सिंह के मष्तिष्क की उपज थी.

 

        बाद में प्रज्ञा जी को  प्रताड़ित कर कर के व पाशविक यातनाएं दे दे कर के यह कहलवाने के बहुतेरे प्रयत्न हुए कि वे इस षड्यंत्र के सूत्रधार संघ के रूप में संघ के किसी बड़े अधिकारी का नाम ले लें. भला हो साध्वी का कि उन्होंने हाड़तोड़ यातनाओं का दर्द पी लिया किंतु असत्य न बोला.

        “भगवा आतंकवाद” जैसे घृणित शब्द का आविष्कार करने वाले दिग्विजय सिंह के एक अन्य राज्य के पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे से दिग्विजय से प्रगाढ़ सम्बंध और नियमित संपर्क की अंतर्कथा एक बड़ी साजिश को अपने उदर में छुपाये हुए है. हेमंत करकरे व दिग्विजय सिंह के रहस्यमयी  नियमित संपर्कों व षड्यंत्र का परिणाम था प्रज्ञा जी का इस केस में फंसना और बड़े दीर्घ समय तक यातनाओं को झेलना. हेमंत करकरे और दिग्विजय के सम्बंध ही करकरे को सम्मानित करने का मूलाधार बने और इन सम्बंधों से ही कसाब जैसे दुर्दांत आतंवादी कसाब को पकड़वाते हुए शहीद हो जाने वाले महाराष्ट्र के पुलिस कर्मी  शहीद तुकाराम ओम्बले के बलिदान को अनदेखा करने की पटकथा तैयार हुई. एक अंतर्विषय करकरे द्वारा खरीदी हुयी सिग सायर राइफल तथा बुलेट प्रूफ जैकेट की खरीदी में भ्रष्टाचार का भी उभर रहा है जिसका भुगतान दस वर्ष पूर्व हो जाने और डिलेवरी अब तक न होने की बात सामने आ रही है. वस्तुतः मालेगांव विस्फोट व मुंबई हमले के मामले की रहस्यमयी की जांच को इस पुरे वर्तमान संदर्भ में देश के सामने खुले तौर पर रखा जाना चाहिए और सत्य देश की जनता को पता चलना चाहिए. “हिंदू आतंकवाद” की कहानी गढ़ने वालों का और कसाब को हिंदू भेष बनाकर कलावा पहनाकर आतंकी घटनाओं को करने के कृत्य के पीछे कौन कौन है ये देश के समक्ष स्पष्ट होना चाहिए. हेमंत करकरे शहीद थे या डबल क्रास एजेंट थे ये  भी देश को पता चलना चाहिए. देश में सेना व पुलिस  के बहुत से पूर्व अधिकारी कर्मचारी इस समूचे सन्दर्भ में बहुत कुछ व्यक्त कर रहें हैं जो देश की आत्मा को आहत करने वाला है और रहस्य की परतों को खोलने वाला है. अपराध की दुनिया  में केवल क़ानून की किताबें नहीं बल्कि समाज में यहाँ वहां फैली हुई या चल रही और मुखर या दबे स्वर में हो रहीं कनबतियों को सुनकर उन्हें क़ानून की फ्रेम में फंसाया जाता है और तब जाकर कहीं अपराधी क़ानून की गिरफ्त में फंसता है. समय आ गया है कि हेमंत करकरे, तुकाराम ओम्बले, कर्नल पुरोहित, मोहनचंद्र शर्मा व साध्वी प्रज्ञा को लेकर सीबी आई जैसी कोई संस्था मुंबई हमले की पुनर्जांच करे और सत्य को देश के सामने लाये.

           प्रश्न केवल एक है किंतु हजार टके का है कि मुंबई ब्लास्ट में यदि हिंदू प्रतीक चिन्ह धारी मुस्लिम आतंकवादियों की पहचान नहीं होती और तिलक लगाकर व हाथ में हिंदू रक्षा सूत्र बांधकर विस्फोट करने कसाब को यदि ज़िंदा न पकड़ा जाता तो आज देश में "भगवा आतंकवाद" का वितंडा कहां तक पहुँच गया होता?!!