हिंदु कभी कट्टर नही होता- डॉ. मनमोहन वैद्य

दिंनाक: 28 May 2019 16:55:30


नागपुर, 25 मई । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह  डॉ. मनमोहन वैद्य ने हिंदु समाज को कट्टर कहने को अनुचित बताया है। नागपुर में आयोजित देवर्षि नारद पुरस्कार समारोह में वैद्य ने बताया की, हिंदु समाज निष्ठावान हो सकता है कट्टर नही। इसलिए हिंदुओ को कट्टर कहना अनुचित होगा।

 

विश्व संवाद केन्द्र विदर्भ कि ओर से नागपुर के साई सभागार में आयोजित  पत्रकार सम्मान पुरस्कार समारोह में प्रमुख अतिथी के रुपमे डॉ. वैद्य ने पत्रकार और पत्रकारिता के संदर्भ में अपने विचार रखते हुए बताया की, देश में लोकसभा चुनाव के दौरान  हिंदुत्त्ववादी संघटन, कट्टर हिंदु ऐसे शब्द को कुछ पार्टीयो द्वारा प्रचारित किया गया।  लेकिन हिदु समाज हजारो वर्षो से सहिष्णु रहा है।  उदारता हिंदुत्व का स्थाई भाव है। कई बार  निष्ठावान  व्यक्ती को कट्टर कहा जाता है।  निष्ठा और कट्टरता दोनो शब्द पूर्णता भिन्न है इसे हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।  कट्टर शब्द अंग्रेजी भाषा के  फंडामेंटलिस्ट शब्द का अनुवाद है। वही हिन्दी में हम निष्ठा कि पराकाष्ठा को कट्टर कहने के लिए फंडामेंटलिस्ट  शब्द के लिए प्रयोग में लाए गए कट्टर शब्द का प्रयोग व्यक्त और समाज के लिए करते है। ऐसा करना सर्वथा अनुचित है।

 

 डॉ. वैद्य ने बताया की, हमारे देश में कई शब्द ऐसे है जिनका अंग्रेजीकरण नही हो सकता वही कुछ अंग्रेजी के शब्द ऐसे है जिन्हे हम हिंदी में ठीक तरह से अनुवादित नही कर सकते।  अंग्रेजी का सेक्युलर यह ऐसा शब्द है जिसका अनुवाद धर्मनिरपेक्ष के तौर पर किया जाता है। लेकिन धर्म या पंथनिरपेक्षता यह सेक्युलर शब्द का हिंदी पर्याय नही हो सकता। सेक्युलर शब्द की अवधारणा विदेशी है, इसलिए इस शब्द का सोच-समझ कर प्रयोग करना चाहिए।  

ठीक उसी तरह से धर्म के लिए अंग्रेजी भाषा में रिलिजन शब्द का प्रयोग किया जाता है। लेकिन रिलिजन और धर्म यह दोनो अलग-अलग शब्द है। देश कि संसद के अहम हिस्से के रूप मे स्थापित लोकसभा 

मे ‘धर्मचक्रपरिवर्तनाय’इस शब्द का प्रयोग किया गया है। इस शब्द का चयन संविधान निर्माताओ ने किया है। धर्मचक्र शब्द का उपासना पद्धती का कोई सबंध नही है।  वैद्य ने बताया की, संविधान निर्माताओ कि नजर में धर्म शब्द की अवधारणा व्यापक थी।  इसलिए धर्म को रिलीजन कहना ठीक नही होगा।

 

वैद्य ने बताया की, मिडीया में अक्सर इस्तेमाल होने वाला राष्ट्रवाद शब्द भी पश्चिमी देशो से आया है। युरोप और पश्चिम के देशो का राष्ट्रवाद और भारत का राष्ट्रीयत्व दोनो पूर्णतः भिन्न है। लेकिन फिर भी हम लोक राष्ट्रवाद शब्द का प्रयोग करते है। ऐसे गलत शब्द के प्रयोग से हमे बचना चाहिए  नतिजतन पत्रकारो ने शब्दो का चयन और प्रयोग सोच-समझ कर करना चाहिए ।

 


पत्रकार बने जिम्मेदार

 

अमरिका में 9/11 का आतंकी हमला होने के बाद वहां के पत्रकारो ने रोते-बिलखते लोग और बर्बादी का दृष्य टीव्ही और समाचार पत्रो में नही दिखाया। वही जपान मे त्सुनामी आने के बाद हुई बर्बादी को जपान के पत्रकारो ने फोकस नही किया। बल्की वहा के पत्रकारो ने स्थानिय लोगो कि दर्यादिली को दर्शाया। साथ ही आतंकी हमले और प्राकृतिक आपदा से लोहा लेने के लिए लोगो को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। विदेशी पत्रकारो के इस चरित्र का भारत मे अनुकरण करने कि जरूरत पर डॉ. वैद्य ने बल दिया।

 

कार्यक्रम के दौरान अपने योगदान के दम पर पत्रकारिता को नई उंचाई प्रदान करने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनंत कोलमकर, मिडियाकर्मी कुमार टाले तथा  अपने आलेखो से लोगो में रक्षा साक्षरता निर्माण करने वाले कर्नल अभय पटवर्धन को देवर्षि नारद पुरस्कार से सन्मानित किया गया। शाल, स्मृतिचिन्ह और 11 हजार रूपये नगद प्रदान कर इन सभी का गौरव किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार राजाभाऊ पोफली और कमलाकर धारप इन्हे जीवन गौरव पुरस्कार से सन्मानित किया गया।

 

देवर्षि नारद पत्रकारिता पुरस्कार समारोह के अध्यक्ष,  महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति रजनिश शुक्ल ने इस अवसरपर  उत्पत्ती, स्थित और लय के सिद्धांत पर प्रकाश डालते हुए  देवर्षि नारद का आदर्श और ध्येयनिष्ठा का आधुनिक पत्रकारिता में प्रयोग करने का आवाहन किया।  तथा रिअल टाईम जर्नलिज्म के साथ मानवी मूल्यो और गरिमापूर्ण आचरण पर उन्होने बल दिया।

 

इस कार्यक्रम में वर्धा स्थित महात्मा गांधी आंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. रजनिशकुमार शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार और विश्व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष  सुधीर पाठक , विश्व संवाद केन्द्र प्रचार प्रमुख अनिल सांबरे, अतुल पिंगले तथा समीर गौतम प्रमुखता से उपस्थित थे।