सावरकर ने दिलवाया 1857 स्वतंत्रता संग्राम के वीरों को अधिकार

दिंनाक: 28 May 2019 12:11:33


वीर सावरकर रचित '1857 का स्वातंत्र्य समर ' मात्र  इतिहास की पुस्तक नहीं, यह तो स्वयं में इतिहास है। यह विश्व की पहली पुस्तक है, जिसे प्रकाशन के पूर्व ही प्रतिबंधित होने का गौरव प्राप्त हुआ । यह पुस्तक इतिहास में छुपे ऐसे मूल तत्व या रहस्य को उजागर करता है जो स्वातंत्र्य समर की अग्नि को प्रज्वलित कर पाया । ऐसे अनेक वामपंथिओं और अंग्रेजी चाटुकारो ने इस धर्मयुद्ध को मामूली सा विद्रोह कहकर इस राष्ट्र व उन वीर बलिदानिओ का हास्य बनाने का पाप किया है ।

परन्तु इस पुस्तक के माध्यम से भारत के महान क्रन्तिकारी वीर सावरकर ने हमारे पूर्वजो के प्रति सम्मान एवं स्वाभिमान को जगाया है ।इस पुस्तक का प्रथम गुप्त संस्करण का प्रकाशन 1909 में एवं खुला प्रकाशन 1947 में हुआ ।

इस इतिहास की पुस्तक ने तभी अपनी पंक्तिया गढ़नी शुरू कर दी जब युवा विनायक दामोदर सावरकर वकालत पढ़ने के नाम पर शत्रु के घर इंग्लैंड में ही मातृभूमि का स्वातंत्र्य समर लड़ने पहुँच जाते हैं ।

इस पुस्तक को पढ़ने पर यह ध्यान में आता है की 1857 का समर मात्र तात्कालिक घटनाओं के कारण नहीं था ।बारूद को चिंगारी देने का काम अंग्रेजों के कारतूस ने किया ।हमारी कृपालु मातृभूमि का उपहास उस सुप्त अग्नि को प्रज्वलित किया जो भारत के समस्त क्रांतिवीरो के सीने में धधक रही थी । भारत माता का अरिमुंडो की माला से श्रृंगार करना बाकी था । 'मारो फिरंगी को ' के रणघोष से मानो आकाश सिंह की भाति गर्जना करने लगा । वह कौन सा तत्व था जो इस क्रांति के मूल में था । वो कोई तात्कालिक कारण नहीं हो सकता जिसके  यज्ञ में सैकड़ो रजवाड़े, लाखो लोग आहूत बनकर समा गए । वह तत्व था 'स्वधर्म और स्वराज्य' ।

दोनों एक दूसरे के बिना अधूरा है । हजारों शूरो की तलवारो को उनकी म्यानों से खींचकर रणांगण में चमचमानेवाले यही दो तत्व थे । स्वधर्म के लिए रण-मैदान में टुकड़े- टुकड़े हो जाने पर भी जो पीछे नहीं हटे । स्वतंत्रता प्रत्येक का प्रकृतिप्रदत्त अधिकार है ।

 

जो भी दूसरो को परतंत्र करता है या उनसे परतंत्र होने पर भी प्रतिकार नहीं करता, वह पाप का भागी है । स्वधर्म एवम स्वराज्य दोनों साध्य नाते से संलग्न हैं । हमें ईश्वर ने संपत्ति, देश और अधिकार स्वधर्म-स्वराज्य हेतु ही दिए हैं ।डलहौजी के शासनकाल में हुए अमानुष अन्याय का अर्थ हुए अमानुष अन्याय का अर्थ यह नहीं कि केवल डलहौजी दोषी था।

 

दोषी पूरा अंग्रेजी समाज था जिसे शासन के नाम पर शोषण करने की चटक लगी थी। हमारी सभ्यता तो पहले ही बहुत अनुशासित थी । अनुशासन सीखना तो बहाना था, उद्देश्य तो अपना घर बसाना था। स्वयं ही संधि की और बाद में उसे अपनी सुविधा अनुसार अस्वीकार कर दिया । सब कुछ लूट कर चले गए छोड़ा तो बस दरिद्रता पीड़ा लाशों से पट्टी भूमि । राजमहल का स्वाभिमान एवं राजमुकुट बाजारों में बिकते थे ।महाराष्ट्र की पुण्य भूमि जिसमें नाना साहब और लक्ष्मीबाई बचपन में क्रीड़ा करते थे वह भला कैसे झुक सकती थी । कुछ राजाओं को अंग्रेजों का शासन प्रिय लगा तो उनकी गर्दन मीठी छुरी से काटी गई। अवध जैसा संपन्न राज्य भी लूटकर राजा से रंक हो गया । कुछ ने तो गुलामी की बेड़ियां लाखों में खरीदी। 

 

छत्रपति शिवाजी के स्वराज्य के सपने को साकार करने का सामर्थ अब किसी में बचा न था किंतु अपने स्वाभिमान की रक्षा हेतु मृत्यु का आलिंगन करने की ज्वाला बची थी। नाना साहब पेशवा जैसे उदार और स्वाभिमानी राजा भी थे, रानी लक्ष्मी बाई जैसी वीरांगना भी थी जिन्होंने अंग्रेजों के दंभ को अपनी खडग से क्षत-विक्षत कर दिया । हिंदुस्तान की पुण्य भूमि की स्वतंत्रता का हरण कर अंग्रेजों ने सभी धर्मों को अपने पैरों तले कुचल दिया था ।

 

अफ्रीका और अमेरिका में वहां के निवासियों को ईसाई धर्म की दीक्षा देने के काम में मिली सफलता से बहके  हुए पश्चिम वासियों को हिंदुस्तान में भी सारे लोगों को इसाई बना डालने की भारी आशा थी।

 

मिशनरियों के तहत चलने वाले स्कूलों को सरकारी धन की सहायता बिना रुके मिल रही थी। सेना में जो अंग्रेज घुसते थे उनमें से कितने ही केवल अधिकार के बल पर भारतीय धर्म की खिल्ली उड़ाने के लिए ही घुसते थे । शांति काल में पादरी सेना के लोगों को यीशु का चरित्र सुनाते थे। धर्मांतरण करने वाले सिपाही को पदोन्नति का खुला वचन देते थे । 

 

लंदन से हिंदुस्तान में लौट कर सतारा में रंगो बापूजी ने और ब्रह्मा व्रत में अजीमुल्ला खान ने प्रचंड युद्ध की रचना करने के लिए क्या-क्या मंत्रणा की इतिहास कभी भी यह शब्दशः नहीं बता पाएगा। हिंदुस्तान में जितने राजा रजवाड़े हैं उन सभी में यदि अंग्रेजों के विरुद्ध उठने का इच्छा उत्पन्न हो गया तो एक क्षण में ही अपना देश अपने हाथों में आ जाएगा, यह तथ्य पहले ही नानासाहेब के ध्यान में आ गया था। कोल्हापुर दक्षिण की सारी पटवर्धन की रियासतों अवध के जमींदारों और दिल्ली से मैसूर तक की सारी राजधानियों में नाना के दूत और उनके पत्र सारे हिंदुस्तान को स्वतंत्रता युद्ध के लिए उठने की चेतना देते हुए घूम रहे थे ।

 

हिंदुस्तान जैसे विस्तीर्ण देश में राज्य क्रांति जैसे गंभीर काम को अंग्रेजों जैसे धूर्त अधिकारियों को हवा भी ना लगने देते हुए अपनी गोपनीयता से संगठित करने का कार्य जिन्होंने किया उन श्रीमान नानासाहेब, मौलवी अहमद शाह, वजीर अली नक़ी खान आदि नेताओं की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। 

 

मंगल पांडे ब्राह्मण कुल में जन्म और क्षत्रिय धर्म में दीक्षित हट्टा कट्टा  जवान था । स्वधर्म पर प्राणों से अधिक निष्ठा रखने वाला मंगल पाण्डेय ने भारतीय सैनिको में साहस स्वयं को बलिदान कर के दिया ।

इसी कड़ी में तांत्या टोपे का भी नाम आता है जिन्होंने नाना साहब के साथ मिलकर अंग्रेजों को संघर्षरत रखा। हिन्दु वीर भाऊसाहब पेशवा ने दिल्ली की गद्दी को जीत कर कई शताब्दी के हिन्दुओं के शोषण के कलंक को धो दिया।

 

ऐसे कई उदाहरण हैं जिसने इस समर में अपना योगदान दिया । आखिर यह समाज स्वाभिमान की लाशों को कब तक ढ़ोए, कभी ना कभी तो ये होना था। इस पुस्तक में ऐसे अनेक प्रकरण हैं जो प्रत्येक भारतीय को जानना चाहिए । यह पुस्तक मनो वीर रस  की कविता हो । इतिहास की उस महान गाथा का मौलिक, सैद्धांतिक, मार्मिक, जीवित और तर्कसंगत वर्णन इस पुस्तक में मिलता है जिसने अंग्रेजी साम्राज्य को रक्तरंजित कर दिया था । यह ऐसा समर था जिसका भय अँग्रेजी सत्ता को भी सताने लगा । इस पुस्तक को पढ़ कर मनो मै स्वयं उस धर्म युद्ध का एक सहयोगी मानता हूँ।

 

इस पुस्तक को विद्यालयों के पाठ्यक्रम में लाना चाहिए ।

 

  • अंकित कुमार (छात्र, ओरिएण्टल कॉलेज)