सामाजिक क्रांतिकारी : स्वातंत्र्यवीर विनायक दा. सावरकर

दिंनाक: 28 May 2019 12:19:50


28 मई सावरकर जयंती विशेष

एक ऐसा क्रांतिकारी जो हिन्दू समाज में फैली अस्पृश्यता और कुरीतियों के खिलाफ न केवल मुखर था बल्कि संगठित हिन्दू समर्थ भारत की संकल्पना को साकार करने के लिए अनेकों का प्रेरणा स्त्रोत भी बना ।

आज जब हम लोकतंत्र की विजय का पर्व मना रहे हैं तभी सावरकर जी के द्वारा किए समाज कार्यों पर एक दृष्टी डालने का भी क्षण है। इस विजय को यदि हम हिंदुत्व की विचारधारा से जोड़कर देखें तो यह ज्ञात होता है की स्वातंत्रवीर सावरकर जी ने अपने नजरबंदी के रत्नागिरी आवास के 13 वर्षों के काल खंड में ऐसे अनेक सामाजिक समरसता के प्रयोग किए, जिनका परिणाम शायद हमें आज लोकसभा में पूर्ण बहुमत के रूप में मिला है। आज जब सभी दलों के नेता अपने चुनाव प्रचार के दौरान हिन्दू वोटों के लिए मंदिर मंदिर जाने लगे और परिणामों के बाद ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता जब यह कहने लगे कि हिन्दू अब संगठित होकर एक वोट बैंक में बदल चुका है तो सावरकर जी द्वारा प्रारंभ किए प्रयास और वर्तमान में सततरूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा किए जा रहे सामाजिक समरसता के कार्यक्रमों की सफलता का सुफल हम पूर्ण बहुमत की सरकार रूप में पाते हैं।

         सावरकरजी एक सामाजिक प्रयोग करने वाले बुद्धिजीवी थे और इसलिए उन्होंने न केवल अपनी लेखनी के माध्यम से अपनी बात रखी, बल्कि अस्पृश्यता के खिलाफ लड़ाई को समर्थन दिया। मंदिरों में अछूतों के लिए प्रवेश प्रदान करने हेतु आंदोलन करते हुए उन्होंने उस विचार को जन जन के भीतर प्रचारित किया जिसमें कहा गया कि 'वह भगवान जो अछूत द्वारा पूजा करने से अशुद्ध हो जाता है, वह भगवान नहीं है।'  1925 में, सावरकर, गुरव जाति के सदस्यों को यह समझाने में सफल रहे कि वे अछूत जातियों के लोगों को उनके साथ प्रार्थना करने की अनुमति दें। इस अवसर पर बोलते हुए, सावरकर ने कहा कि "भगवान की पूजा करना सभी जातियों के हिंदुओं का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस अधिकार का प्रयोग करने की अनुमति देना ही वास्तव में धार्मिकता है।         

सावरकर ने सन 1927 में सभी के लिए मंदिर प्रवेश आंदोलन के अगले चरण के रूप में, रत्नागिरी में विभिन्न जातियों के हिंदुओं की एक मंडली का आयोजन किया। इसके बाद 29 नवबंर 1929 को एक बैठक हुई जिसका उद्देश्य विट्ठल मंदिर के गर्भगृह में तत्कालीन अछूत जातियों के प्रवेश की अनुमति देना था। इस बैठक में, सावरकरजी ने अपने प्रेरक उद्बोधन से लोगों को विट्ठल मंदिर के द्वार अछूतों के लिए खोलने के लिए राजी कर लिया। “पतितपावन मंदिर” की नींव 10 मार्च 1929 को भिकोजी सेठ कीर की आर्थिक मदद और सावरकरजी के नेतृत्व में रखी गई थी। इस अवसर पर सावरकरजी ने कहा "आदर्श रूप से काशीविश्वेश्वर, जगन्नाथपुरी, द्वारका, रामेश्वर और अन्य सभी मंदिर अपनी जाति के बावजूद सभी हिंदुओं के लिए खुले होने चाहिए। लेकिन जब तक इस समाज को समग्र रूप से स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक मेरी यही इच्छा थी कि हमारे पास एक ऐसा मंदिर होना चाहिए जो सभी हिंदुओं के लिए खुला हो

1931 में, पतितपावन मंदिर की स्थापना की गई थी और इसमें सभी जातियों के लोगों का प्रतिनिधित्व था, जिसमें तत्कालीन अछूत जाति के सभी लोग भी शामिल थे। इस मंदिर में  "वह जो पूजा करने में सक्षम है वह पुजारी है" के सिद्धांत का पालन किया - यह सुनिश्चित करता था कि ब्राह्मणवादी वर्चस्व की अनुमति यहाँ नहीं थी। महाराष्ट्र की महिलाओं के लिए पहला सामुदायिक भोजन 21 सितंबर 1931 को पतितपावन मंदिर में आयोजित किया गया था। 75 महिलाएँ इस अवसर पर उपस्थित थीं। सिर्फ 5 साल बाद, 1935 के गणेश उत्सव के दौरान यह गिनती 400 महिलाओं तक हो गई थी। 1 मई 1933 को, सावरकरजी ने पतितपावन मंदिर के परिसर में एक जलपानगृह प्रारंभ किया जो सभी हिंदुओं के लिए खुला था। अछूतों द्वारा यहाँ भोजन परोसा जाता था और सावरकरजी से मिलने आने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह शर्त थी कि उन्हें यहाँ कम से कम चाय पीना अनिवार्य है, तभी वह सावरकर जी से भेंट और बातचीत कर सकते हैं। सावरकरजी की पत्नी माई या यमुनाजी सावरकर ने तत्कालीन अछूत समुदायों की महिलाओं के लिए पारंपरिक 'हलदी-कुंकु' समारोह आयोजित किया।         

'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने उस घटना पर संज्ञान लिया, जहां शिवाभंगी (सफाईकर्मियों की एक पूर्व जाति) ने धार्मिक प्रवचन दिया और ब्राह्मणों ने उनके पैर छुए। रिपोर्ट में कहा गया है, "रत्नागिरि के पतितपावन मंदिर में, वाल्मिकी समुदाय के एक व्यक्ति द्वारा प्रवचन दिए जाने से एक नया मानदंड स्थापित किया गया है, जबकि उच्च जातियों के लोगों ने उसे माला पहनाई और उसके पैरों पर अपना सिर रखा। यह अभूतपूर्व है और सावरकर द्वारा उठाया महान क्रांतिकारी कदम। " उस समय धार्मिक भजनों का पाठ करना केवल ब्राह्मणों का निजीकरण था। 1930 में, सावरकर ने पतितपावन मंदिर के परिसर में 'ऑल हिंदू गणपति महोत्सव' शुरू किया, जहां हिंदुओं के भंगी समुदाय के एक व्यक्ति द्वारा धार्मिक भजन सुनाए गए थे। इसने लंदन से प्रकाशित कुछ समाचार पत्रों में विशेष उल्लेख पाया। उनकी दृष्टी में सामाजिक सुधार अधिक महत्वपूर्ण था, सावरकरजी कहते थे, "यदि हमें स्वतंत्रता या आजादी बिना  सामाजिक सुधार के साथ मिलेगी तो यह तीन दिन भी नहीं टिक सकती है।" उन्होंने लोगों को समझाते हुए कहा था कि वे यह भूल सकते हैं कि वे समुद्र में कूद गए थे लेकिन सामाजिक सुधार के बारे में अपने विचारों को नहीं भूलना चाहिए। 6 जुलाई 1920 को अपने भाई नारायणराव को लिखे एक पत्र में, सावरकरजी लिखते हैं "मुझे जातिगत भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ उतनी ही बगावत करने की ज़रूरत है, जितनी कि मुझे भारत के विदेशी कब्जे के खिलाफ लड़ने की ज़रूरत महसूस होती है"। अंडमान में 50 साल की जेल की सजा काटते समय भी सावरकर जातिगत भेदभाव और छुआछूत के बारे में चिंतित थे। उन्होंने अंदमान में रहते हुए भी अस्पृश्यता के उन्मूलन के क्षेत्र में काम किया। सावरकरजी ने अंग्रेजों द्वारा लोगों की जंजीरों को उखाड़ फेंकने के लिए जितना प्रयास किया, उतना ही हिन्दू समाज में होने वाले सात भेदभावों या प्रतिबंधों ("सप्त-बेड्या" या सात हथकड़ी के रूप में संदर्भित) का विरोध किया ।

  1. वेदों तक पहुंच पर प्रतिबंध - सभी हिंदुओं को वेदों के समान अधिकार और पहुंच होगी 
  2.  पसंद का रोजगार चुनने पर प्रतिबंध - एक व्यक्ति को उस पेशे का चयन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए जो वह व्यक्ति चाहे । फिर वह किसी भी जाति में पैदा हुआ हो, चाहे वह सबसे अच्छा हो। एक व्यक्ति को केवल एक विशेष रोजगार का चयन करने से निषिद्ध नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह किसी विशेष जाति में पैदा नहीं हुआ था। 
  3. अस्पृश्यता और कर्मकांड की पवित्रता - केवल उन लोगों को अछूत माना जाएगा जिनका स्पर्श सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सावरकर ने कहा कि स्वास्थ्य में लाभकारी साबित होने पर अनुष्ठान शुद्धता (मराठी में सोळ) का अभ्यास किया जाना चाहिए
  4. विदेश यात्रा - विदेशी भूमि पर यात्रा करने से सामुदायिक बहिष्कार नहीं होना चाहिए 
  5.  धर्म परिवर्तन पर प्रतिबंध - जिन लोगों ने पहले हिंदू धर्म को त्याग दिया था या जो एक अलग धर्म में पैदा हुए थे, उन्हें हिन्दू धर्म में वापस आने की अनुमति दी जानी चाहिए। सावरकर ने स्वयं रत्नागिरी में धर्मांतरण / शुद्धि अनुष्ठानों की देखरेख की थी ।
  6.  भोजन की आदतों पर प्रतिबंध - सावरकर ने इस विचार का उपहास किया कि एक विशेष प्रकार का भोजन खाने से आपके धर्म को नुकसान पहुँचता है। उनका मत था कि 'धर्म किसी के हृदय में रहता है, नाकि पेट में' सावरकर ने रत्नागिरी में कई सामुदायिक भोजन की व्यवस्था करने का बीड़ा उठाया
  7.  जाति से बाहर विवाह पर प्रतिबंध - जाति विवाह के लिए मापदंड नहीं होनी चाहिए। जीवनसाथी का चुनाव करते समय योग्यता, नागरिकता, प्रेम और स्वास्थ्य ही प्रेरक शक्ति होनी चाहिए। आज भी जब हम किसी गाँव में अस्पृश्यता की खबर पढ़ते हैं तो मन दुखी हो जाता है, यदि अभी भी समाज में इस तरह का व्यवहार हो रहा है तो आज हम सभी को सावरकर जयंती के उपलक्ष्य में यह संकल्प लेना चाहिए कि हम और भी तेजी से इस कलंक को समाप्त करने का प्रयास करेंगे, क्योंकि सावरकरजी कहते थे की सभी पंथों को एक मानकर बिना किसी आचार विचार का भेद माने “जो इस भूमि को पितृभू और पुण्यभू मानते हैं वह सभी हिन्दू हैं” विवेक गोरे