जी हाँ! वीर ही थे वीर सावरकर

दिंनाक: 28 May 2019 17:00:39


मार्क्सवादी और कांग्रेसी विचारधारा के नशे में झूमते हुए जिन इतिहासकारों ने पिछले लगभग 6 दशकों तक भारतीय इतिहास के लेखन और पठन-पाठन पर अपने वर्चस्व के द्वारा जिन ऐतिहासिक तथ्यों को निरंतर दबाया वह इतिहास आज उठ कर बोल रहा है ओर बहुत ताकत से बोल रहा है। इतिहास गवाह है कि उसे दबाया नहीं जा सकता, तोड़ा - मरोड़ा नहीं जा सकता क्योंकि तथ्य, तथ्य हैं।

 

राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने वीर सावरकर के इतिहास को दबाने का जो प्रयास किया है उसका प्रभाव इनकी राजनीतिक चालबाजी के विपरीत हुआ है।विद्यार्थी ही नहीं जनता भी यह पूछ रही है कि सावरकर को पाठ्यक्रम से क्यों हटाया गया? सावरकर से कांग्रेस को इतनी दिक्कत क्यों है ? वह पूछ रहे हैं कि 1984  में सिखों के नरसंहार को लेकर जब राजीव गांधी की बात आती है तब तो कांग्रेस कहती है इतिहास में मत जाओ, फिर ये सावरकर के संबंध ऐसा क्यों कर रहे हैं? मंदबुद्धि के ये नेता इतना भी नहीं समझते कि आज की जनता, आज की युवा पीढ़ी जिज्ञासु है। ना जाने कितने लोग इंटरनेट पर ही यह खोजने में लग गए होंगे कि सावरकर का इतिहास क्या है?

 

 

सावरकर ने इंग्लैंड में यानी शेर की मांद में जो क्रांतिकारी बिगुल बजाया था क्या उसे भुलाया जा सकता है? 1857 की क्रांति पर उनकी लिखी हुई पुस्तक हर क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी के लिए जो प्रेरणा स्रोत बनी क्या उसे झुठलाया जा सकता है? बंदी के रूप में जहाज़ से भारत आते समय फ्रांस के तट पर समुद्र में कूदना और तैर कर तट तक आना क्या किसी कांग्रेसी नेता ने सपने में भी किया है? एक अजीब विडंबना है कि सिर्फ कांग्रेस ने ही इस देश को आजादी दिलवायी। इसे स्थापित करने के लिए हमारे क्रांतिकारी आंदोलन को, नेताजी सुभाषचंद्र बोस के योगदान को, गर्त में डालने का अथक प्रयास साम्यवादी और कांग्रेसी इतिहासकारों ने किया।

 

ये नेताजी को हिटलर का दलाल बताते हैं और कहते हैं कि सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांग ली। कोई इनसे पूछे कि सात साल अंडमान की जेल मे जो यातनाएं सावरकर ने सही क्या कभी किसी कांग्रेसी ने ऐसे यातना का सामना किया? नेहरू जैसे नेता तो गिरफ्तार होने पर अपने को राजनीतिक कैदी बता कर जेल में "बी श्रेणी" में रखे जाने की मांग करते थे, और रहे भी। सावरकर ने अपने पहले पत्र में सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि अंडमान में यातना सह रहे सभी राजनीतिक कैदियों के लिए सार्वत्रिक माफी और रिहाई की मांग की थी। इसके दो कारण थे। पहला- तथाकथित सभ्य अंग्रेजों द्वारा जो प्रताड़नाएँ वहां पर स्वतंत्रता सेनानियों को दी जाती थीं उनके कारण न जाने कितनों ने 1857 के बाद से वहाँ आत्महत्या की थी और न जाने कितने पागल हो गए थे।दूसरा कारण था कि एक क्रांतिकारी काले पानी की इस जेल में प्रताड़नाएं सहते हुए देश की आजादी के लिए क्या कर सकता था? जेल तोड़ कर भागना संभव नहीं था, किसी भी तरीके से बाहर आकर कुछ न कुछ तो किया जा सकता था। याद करें कि अंडमान से आने के बाद सावरकर को नजरबंद रखा गया था। वास्तव में अंग्रेजों से सावरकर का पात्र व्यवहार मात्र एक आवरण था। क्रांतिकारी गुप्त रूप से अपनी योजनाएं बनाते हैं और उनकी पूर्ति के लिए कोई भी आवरण लिया जा सकता है।

 

 

एक आरोप सावरकर पर यह लगाया जाता हैं कि उन्होंने अंग्रेजी सेना में भर्ती कराई। परन्तु ये लोग यह भूल जाते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गांधी जी ने भी अंग्रेजी सेना में भर्ती कराई थी।

 

 

आज मैं एक ऐसा तथ्य उजागर करने जा रहा हूं जो राष्ट्रीय अभिलेखागार की फाइलों

में ही कैद है। यह बात सभी जानते हैं कि 1940 में सावरकर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मध्य बातचीत हुई थी और अब  यह भी विदित है कि काबुल से जर्मनी जाते समय नेताजी ने एक पत्र भारतीय साथियों के नाम लिखा था जिसमें उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रान्त के रास्ते भारत में स्थित अंग्रेजी सेना पर हमले की योजना थी और भारतीयों द्वारा किये जाने वाले कई कार्यों का जिक्र था।यह पत्र भारत नहीं पहुंच पाया। 1948 में नेताजी के बड़े भाई शरत बोस को यह पत्र पेरिस में, अफ़ग़ानिस्तान में इटली के राजदूत रहे क्वत्रोनी ने दिया था। इस पत्र में नेताजी ने एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण बात कही थी कि भारत मे अंग्रेज अपनी सेना के लिए जो नई भर्ती कर रहे हैं उसमें अपने विश्वस्त युवाओं को भरती करा दिया जाय ताकि मौका आने पर वह हमारी तरफ आ जाएं। आजाद हिंद फौज में यह हुआ भी। इस फौज में या तो प्रवासी भारतीय थे या वह भारतीय जो अंग्रेजी सेना छोड़कर नेताजी से आ मिले।

 

क्या सावरकर ने भी अंग्रेजी सेना में भरती इसीलिए करवाई थी? क्या यह नेताजी और सावरकर की गुप्त समझ थी? इन प्रश्नों का उत्तर मिला एक ऐसे दस्तावेज से जो पत्र रूप में आजाद हिंद फौज के एक सिपाही द्वारा आई.एन.ए. रिलीफ कमेटी को लिखा गया था।यह पत्र ब्रिटिश खुफिया विभाग के रिकार्ड में मौजूद है। इसमें सिपाही ने लिखा है कि मैं सावरकर जी के आदेश का पालन करते हुए अंग्रेजी सेना में भर्ती हो गया और जैसे ही मौका मिला मैं उनके निर्देशानुसार आज़ाद हिंद फौज में चला गया। दुर्भाग्य यह है कि हमारे कई इतिहासकार और कांग्रेसी नेता ऐसे दस्तावेजों को या तो पढ़ते ही नहीं हैं अथवा अनदेखा कर देते हैं क्योंकि वह उनके राजनीतिक हितों को पूरा नहीं करता।

 

भारत के क्रांतिकारी, आज़ाद हिंद फौज के लोग एक विभाजित भारत के लिए नहीं लड़े थे। कहा तो यह भी जा सकता है कि नेहरू ने माउंटबेटन की चाकरी कर अपने लिए कुर्सी हासिल करने के लिए देश की जनभावना की अवहेलना कर और गांधी जी तक को दरकिनार कर अपनी कुर्सी के लिए देश का बंटवारा स्वीकार किया। इतिहास सम्पूर्ण दस्तावेजों और घटनाक्रम के आधार पर लिखा जाता है न कि अपने राजनीतिक फायदे के लिए किसी घटना या पत्र को उठाकर किसी व्यक्ति पर लांछन लगाने के लिए।

 

प्रोफेसर कपिल कुमार

इतिहास विभाग,इग्नू,नई दिल्ली