मध्यभारत में संघ कार्यों की नींव रखने वाले स्वंयसेवक

दिंनाक: 14 Jun 2019 14:54:41


हरदा जिले में संघ कार्य का प्रारम्भ तो बाबा साहब आप्टे के हरदा प्रवास के समय १९३७ में हुआ, किन्तु प्रारम्भ में यह अनियमित ही रही । सन १९३९ में गोविन्द राव उपाख्य भाऊसाहब भूस्कुटे नागपुर से अपनी पढाई पूरी कर बापस घर लौटे तथा उन्होंने संघ कार्य हेतु सतत प्रवास प्रारम्भ किये । तब समूचे विभाग में शाखाओं का जाल फ़ैलने के साथ हरदा की शाखा को भी स्थायित्व मिला । सन १९४५ आते आते हरदा नगर व तहसील में तेजी से कार्य का विस्तार हुआ ।

हरदा ही नहीं तो सम्पूर्ण अंचल में संघ कार्य विस्तार की धुरी श्री भाऊ साहब भुस्कुटे रहे । 14 जून, 1915 को बुरहानपुर (मध्य प्रदेश) में जन्मे श्री गोविन्द कृष्ण भुस्कुटे, आगे चलकर भाऊ साहब भुस्कुटे के नाम से प्रसिद्ध हुए।

18 वीं सदी में इनके अधिकांश पूर्वजों को जंजीरा के किलेदार सिद्दी ने मार डाला था। जो किसी तरह बच गये, वे पेशवा की सेना में भर्ती हो गये। उनके शौर्य से प्रभावित होकर पेशवा ने उन्हें बुरहानपुर, टिमरनी और निकटवर्ती क्षेत्र की जागीर उपहार में दे दी थी। उस क्षेत्र में लुटेरों का बड़ा आतंक था; पर इनके पुरखों ने उन्हें कठोरता से समाप्त किया। इस कारण इनके परिवार को पूरे क्षेत्र में बड़े आदर से देखा जाता था।

इनका परिवार टिमरनी की विशाल गढ़ी में रहता था। भाऊसाहब सरदार कृष्णराव एवं माता अन्नपूर्णा की एकमात्र सन्तान थे। अतः इन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं देखना पड़ा। प्राथमिक शिक्षा अपने स्थान पर ही पूरी कर वे पढ़़ने के लिए नागपुर आ गये। 1932 की विजयादशमी से वे नियमित शाखा पर जाने लगे।

1933 में उनका सम्पर्क डा. हेडगेवार से हुआ। भाऊसाहब ने 1937 में बी.ए आनर्स, 1938 में एम.ए तथा 1939 में कानून की परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसी दौरान उन्होंने संघ शिक्षा वर्गों का प्रशिक्षण भी पूरा किया और संघ योजना से प्रतिवर्ष शिक्षक के रूप में देश भर के वर्गों में जाने लगे।

भाऊ साहब प्रचारक निकलना चाहते थे, जबकि परिजन उनके विवाह हेतु प्रयत्नरत थे । वंश समाप्ति के भय से घर में खलबली मच गयी; क्योंकि वे अपने माता-पिता की एकमात्र सन्तान थे। विषय प.पू. आद्य सर संघ चालक डा. हेडगेवार जी तक पहुंचा । अंततः वे स्वयं टिमरनी पधारे तथा भाऊ साहब से चर्चाकर उन्हें गृहस्थ प्रचारक के रूप में राष्ट्रसेवा कार्य करने हेतु प्रेरणा दी । 1941 में उनका विवाह हुआ और इस प्रकार वे प्रथम गृहस्थ प्रचारक बने। वे संघ से केवल प्रवास व्यय लेते थे, शेष खर्च वे अपनी जेब से करते थे। विवाहोपरांत भाऊ साहब आजीवन उसी भूमिका में कार्य करते रहे । 1964 से 1989 तक लगातार 25 वर्ष भाऊ साहब भुस्कुटे मध्यक्षेत्र प्रचारक रहे। उस समय उत्कल प्रांत भी संघ कार्य की दृष्टि से मध्य क्षेत्र में समाहित था।

यद्यपि भाऊसाहब बहुत सम्पन्न परिवार के थे; पर उनका रहन सहन इतना साधारण था कि किसी को ऐसा अनुभव ही नहीं होता था। प्रवास के समय अत्यधिक निर्धन कार्यकर्त्ता के घर रुकने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं होता था। धार्मिक वृत्ति के होने के बाद भी वे देश और धर्म के लिए घातक बनीं रूढ़ियां तथा कार्य में बाधक धार्मिक परम्पराओं से दूर रहते थे। द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी सब कार्यकर्त्ताओं को भाऊसाहब से प्रेरणा लेने को कहते थे।

1948 में गांधी हत्याकाण्ड के समय उन्हें गिरफ्तार कर छह मास तक होशंगाबाद जेल में रखा गया; पर मुक्त होते ही उन्होंने संगठन के आदेशानुसार फिर सत्याग्रह कर दिया। इस बार वे प्रतिबंध समाप्ति के बाद ही जेल से बाहर आये। आपातकाल में 1975 से 1977 तक पूरे समय वे जेल में रहे। जेल में उन्होंने अनेक स्वयंसेवकों को संस्कृत तथा अंग्रेजी सिखाई। जेल में ही उन्होंने ‘हिन्दू धर्म: मानव धर्म’ नामक ग्रन्थ की रचना की।

१९५९ संघ शिक्षा वर्ग में भाऊ साहब भुस्कुटे सर्वाधिकारी थे । उस समय हाईकोर्ट में उनकी संपत्ति को लेकर एक प्रकरण का निर्णय हुआ । निर्णय उनके विरुद्ध था । उनकी करोड़ों रुपये मूल्य की संपत्ति राज्यसात कर ली गई थी । फैसले की जानकारी मिलने पर उनकी त्वरित प्रतिक्रया थी “चलो अच्छा हुआ, अब चैन से शिक्षावर्ग में रह सकूंगा” । बाद में सर्वोच्च न्यायालय में भाऊ साहब के पक्ष में निर्णय हुआ और उनकी संपत्ति वापस हुई ।

आम तौर पर भाऊ साहब की जमीनों पर कपास की खेती होती थी तथा उससे उन्हें मुनाफ़ा भी अच्छा मिलता था, किन्तु १९६२ के युद्धकाल में उन्होंने अपनी पूरी जमीन पर गेंहू की खेती करबाई । उनका कहना था कि संकट काल में देश को खाद्यान्न ज्यादा जरूरी है । इस समय पैसा महत्वपूर्ण नही है ।

उन पर प्रान्त कार्यवाह से लेकर क्षेत्र प्रचारक तक के दायित्व रहे। भारतीय किसान संघ की स्थापना होने पर श्री दत्तोपन्त ठेंगड़ी के साथ भाऊसाहब भी उसके मार्गदर्शक रहे। 75 वर्ष पूरे होने पर कार्यकर्त्ताओं ने उनके ‘अमृत महोत्सव’ की योजना बनायी। भाऊसाहब इसके लिए बड़ी कठिनाई से तैयार हुए। वे कहते थे कि मैं उससे पहले ही भाग जाऊँगा और तुम ढूँढते रह जाओगे। वसंत पंचमी (21 जनवरी, 1991) की तिथि इसके लिए निश्चित की गयी; पर उससे बीस दिन पूर्व एक जनवरी, 1991 को वे सचमुच चले गये।

भाऊ साहब के चचेरे भाई श्री भालचंद्र राव उपाख्य बाबा साहब भुस्कुटे भी आदर्श स्वयंसेवक थे । वे जिले के प्रथम संघ चालक भी रहे । इतने बड़े परिवार के पुत्र होने के बाद भी वे २० - २० कि.मी. तक साईकिल से प्रवास करते थे । तरुण स्वयंसेवकों में ऊर्जा का संचार करने में उन्हें महारथ हासिल थी । इस हेतु वे अत्यंत प्रभावशाली ढंग से संघ स्थान पर देश भक्ति पूर्ण कथा कहानियां स्वयंसेवकों को सुनाते थे । वे अपनी ओजपूर्ण वाणी में तथा घूमते चलते अपनी भाव भंगिमा से इस प्रकार सजीव चित्रण करते कि सुनने बाले स्वतः विषयवस्तु से जुडकर अपनी आँखों के सामने उस द्रश्य को अनुभव करने लगते ।

आगर तथा श्योपुर में प्रचारक रहे श्री संतोष जोशी मूलतः हरदा जिले के बावड़िया गाँव के रहने बाले हैं । उन्होंने खुद के जीवन की दिशा बदलने में बाबा साहब के योगदान को रेखांकित करने बाला एक प्रसंग सुनाया । वर्षाकाल में उन दिनों गाँवों तक कोई वाहन पहुँचना कठिन होता था । संतोष जी के गाँव तक पहुँचने के लिए भी तीन कि.मी. पैदल चलना पडता था । वर्षा हो जाने के बाद तो गड्ढे और कीचड के कारण चलना और भी कठिन हो जाता था । किन्तु एक दिन वे हैरत में पड गए जब देखा कि बाबा साहब उनके घर की तरफ चले आ रहे हैं । उनको बहां तक आने में कितनी कठिनाई हुई है यह उनकी हालत देखकर खुद ही समझ में आ रहा था । फिसलकर गिरने के कारण उनके कपडे कीचड से लथपथ थे । जोशी जी को और भी ज्यादा अचम्भा तब हुआ जब उन्हें यह मालूम पड़ा कि वे केवल उन जैसे सामान्य तरुण स्वयंसेवक से मिलने ही इतना कष्ट उठाकर बहां पहुंचे थे । संघ कार्य के विकास में अधिकारियों के एसे व्यवहार का बहुत बड़ा योगदान रहा है ।

 

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