सदा प्रसन्न वीरेन्द्र भटनागर

दिंनाक: 15 Jun 2019 12:06:44


कुछ लोग हर परिस्थिति में प्रसन्न रहकर सबको प्रसन्न रखते हैं। श्री वीरेन्द्र भटनागर ऐसे ही एक प्रचारक थे। उनके पिता श्री ज्ञानेन्द्र स्वरूप भटनागर लखनऊ के मुख्य डाकपाल कार्यालय में काम करते थे। किसी विवाह कार्यक्रम में वे परिवार सहित मथुरा आये थे। वहीं 15 जून, 1930 को वीरेन्द्र जी का जन्म हुआ। इसलिए इनकी दादी प्यार से इन्हें ‘मथुरावासी’ कहती थीं।

वीरेन्द्र जी बालपन में ही शाखा जाने लगे थे। 1947 में काशी से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग करते हुए उन्होंने प्रचारक बनने का निर्णय ले लिया। 1948 में संघ पर प्रतिबन्ध लग गया। इसके विरुद्ध वे लखनऊ जेल में रहे। जेल से आने के बाद उन्हें उ.प्र. में सीतापुर जिले के खैराबाद में भेजा गया। वहां किसी समय उनके दादा जी स्थानीय तालुकेदार के मुंशी रह चुके थे। अतः उनके भोजन, आवास आदि का प्रबन्ध हो गया। प्रतिबन्ध के कारण उन दिनों शाखा लगाना मना था। अतः वे लोगों से सम्पर्क कर उन्हें संघ के बारे में जानकारी देते रहे। इसी बीच उन्होंने इंटर की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली।

प्रतिबन्ध के बाद उन्हें सीतापुर जिले में ही सिधौली भेजा गया। इसके बाद वे रायबरेली नगर और फिर 1962 में गाजियाबाद तहसील प्रचारक बनाये गये। चीन के आक्रमण और उसमें पराजय से पूरे देश में निराशा छायी थी। ऐसे में संघ के कार्यकर्ताओं से सार्वजनिक सभाएं कर लोगों में आशा भरने को कहा गया। वीरेन्द्र जी ने इस दौरान नगर, गांव और विद्यालयों में सैकड़ों सभाएं कीं। उनका भाषण देने का ढंग बहुत प्रभावी और तथ्यात्मक होता था। लोग समझते थे कि शायद ये युद्ध से लौटकर आये कोई सैनिक हैं। कुछ लोगों ने उन्हें दिल्ली की सभाओं में भी बुलाया। इस भाषण शैली ने ही उनका भारतीय मजदूर संघ में जाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

वीरेन्द्र जी 1962 से 86 तक उ.प्र. में मजदूर संघ के विभिन्न दायित्वों पर रहे। उन्होंने सर्वप्रथम उ.प्र. रोडवेज में इकाई गठित कर काम प्रारम्भ किया और फिर उसके महामंत्री बने। इस दौरान बरेली, बनारस आदि कई स्थानों पर उनका केन्द्र रहा। श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी और श्री रामनरेश सिंह (बड़े भाई) से उनके बहुत मधुर संबंध बने। उद्योगपति उन दिनों भारतीय मजदूर संघ के झंडे और वीरेन्द्र भटनागर से बहुत डरते थे; पर मजदूर उन्हें ढूंढकर अपने यहां बुलाते और इकाई का गठन कराते थे। 1980 में जब भारतीय जनता पार्टी बनी, तो उनके संगठन कौशल एवं भाषण शैली के कारण भा.ज.पा. वालों ने इन्हें अपने साथ काम में जोड़ना चाहा; पर बड़े भाई इसके लिए सहमत नहीं हुए।

1986 में वीरेन्द्र जी को उ.प्र. में सेवा कार्यों के विस्तार का काम मिला। 10 वर्ष तक इस हेतु उन्होंने व्यापक प्रवास किया और फिर उत्तरकाशी के भूकम्पग्रस्त क्षेत्र में चलाये जा रहे विद्यालय, छात्रावास, ग्राम्य विकास आदि सेवा कार्यों की देखरेख करने लगे। वहां रहते हुए उन्होंने गढ़वाल के वीर एवं वीरांगनाओं के जीवन तथा सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन पर अनेक लघु नाटक लिखकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनका मंचन कराया।

शरीर शिथिल होने पर वे मेरठ के प्रांतीय संघ कार्यालय (शंकर आश्रम) तथा मेरठ में पूर्वोत्तर भारत के बच्चों के लिए चलाये जा रहे छात्रावास में रहने लगे। बच्चों से खेलने और शरारत करने में उन्हें सदा मजा आता था। इसलिए बालक भी उनके साथ स्वयं को सहज अनुभव करते थे। वे अपने दुख-सुख उन्हें ही बताते थे। उन्होंने एक प्रवचन में सुना था कि जो काम करो, प्राणों की बाजी लगाकर करो। प्राण तो एक बार ही जाएंगे; पर सफलता हर बात मिलेगी। इसलिए वे हर काम पूरी ताकत से करते थे। यही उनकी जिंदादिली का रहस्य था। 25 जनवरी, 2015 को वृद्धावस्था सम्बन्धी अनेक समस्याओं के कारण मेरठ में ही उनका निधन हुआ। 

(संदर्भ: 29.4.2012 को मेरठ में हुई वार्ता)