500 सालों के पुर्तगाली शासन के खिलाफ क्रांती

दिंनाक: 18 Jun 2019 11:51:10


हमारे घर की रसोई में एक तीखी खाद्य वस्तु पाई जाती है, जिसे हमारे घर की अन्नपूर्णा महिलाएं खाना बनाते समय उपयोग में लाती है, यह वाक्यांश पढ़ते ही हमारे दिमाग में मिर्च की इमेज बनकर सामने आ जाती है, लेकिन यह लाल मिर्च भारत में जिस देश से आई उस देश ने भारत के एक हिस्से में पांच सौ साल तक राज किया। दो विपरीत दिशाओं में बसे पूर्व और पश्चिम पहली बार समुद्री रास्ते से जब मिले, तब से पुर्तगाली भारत पर अपना कब्जा जमाएं हुए थे।

 

जब हम इम्तिहान के पहले जल्दी जल्दी में एक की जगह दो  पन्ने पलट देते है, तो हम इतिहास में सौ साल पीछे चले जाते है, ऐसे नौ पन्ने पलटने पर हमें पहले यूरोपीय के भारत आगमन की जानकारी मिलती है, कि 20 मई 1498 को बारह हजार मील का सफर तय कर वास्को डी गामा भारत आया था। वह स्पाइस आइलैंड (मसाले के द्वीप) जिसे ईस्ट इंडीज कहा जाता था, उसे तलाशते हुए सरजमीं ए हिंद में पहुंच गया था, वह अपने साथ काली मिर्च जैसे मसालों से लादकर जहाज लेकर वापस गया और उसे उसके खर्चे के साठ गुना ज्यादा के दाम में वह मसाले मिले, यह व्यापारी रूप में आएं और भारत की सत्ता पर काबिज हो गएं जिनको बाद में अंग्रेजों ने चुनौती दी, यह भी अचरज की बात है कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी दमन, दादर हवेली सहित गोवा में पुर्तगाल का ही कब्जा रहा।

 

बड़े बुजुर्ग कहते है " मुल्क से मोहब्बत करना सबसे बड़ा धर्म है" उस धर्म को पहचानते हुए ही 18 जून 1946 को गोवा में क्रांति की ज्वाला फूट पड़ी, इस ज्वाला को चिंगारी देने का काम राममनोहर लोहिया ने किया, प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी राममनोहर लोहिया ने गोवा आकर स्थानीय निवासियों में स्वतंत्रता के मूल्यों का संचार किया, उन्होंने वहां पुर्तगाली सत्ता की जड़ें उखाड़ने के लिए क्रांति की कुंजी सौंपी, जब गोवा में पुर्तगालियों की खिलाफत हो रही थी, उस समय जिस साम्राज्य का सूरज कभी डूबता नहीं था, वह ब्रितानी सरकार अपने बोरिया बिस्तर समेटने में लगी थी, तब के राष्ट्रीय फलक के नेताओं का मानना था कि अंग्रेजों के जाने पर पुर्तगाली भी देश छोड़ देंगे लेकिन पांच साल से कब्जा किए हुए जमीन के टुकड़े को कोई अपनी मर्जी से छोड़ने को तैयार नहीं होता फिर पांच सौ साल से समुद्र के किनारे बसे गोवा को त्याग देना पुर्तगालियों की फितरत में नहीं था। 15 जून 1946 को पंजिम में लोहिया की सभा हुई जिसमें तय किया गया कि 18 जून से संविनय अवज्ञा प्रारंभ होगी, अब विदेशी सरकार की नीतियों को उनके कायदों को मानने से जनता मना करने वाली थी, जब तीन रोज बाद 18 तारीख का सूर्य उदय हुआ तब मडगांव स्थित सभास्थल पर पहुंचने के पुलिस ने दण्ड का इस्तेमाल किया, उस सभा का दृश्य कुछ यूं था, जिसमें 20 हजार की तादाद में खड़ी जनता पर जोरदार गरजते मेघ और चारो तरफ उन्हें घेरे मशीनगन लिए पुर्तगाली पुलिस, इस सभा के बाद पुर्तगाली अपनी कुर्सी की जड़ें उखड़ते देख रहे थे।

 

 

गोवा मुक्ति आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था, जिसमें एक राष्ट्र और राष्ट्रवाद की भावना फूट - फूट कर बाहर आई थी, देश तो पन्द्रह अगस्त 1947 को विभाजन के दंश के साथ आजाद हो गया, लेकिन यह पुर्तगाली गोवा में अपना डेरा जमाएं बैठे थे। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों से रणबांकुरे और स्वयंसेवक हजारों की तादाद में गोवा की मुक्ति के लिए जी जान लिए वहां खड़े थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इस स्वतंत्रता आंदोलन में गहरी हिस्सेदारी थी, 21 जुलाई 1954 को दादर को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरौली और फिपारिया भी स्वतंत्र हुए, फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई, संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुर्तगाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया गया, संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में बड़े उत्साह से शामिल हो गए थे, जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के स्वयंसेवकों ने गोवा पहुंचकर आंदोलन में संघर्ष और साहस का अद्भुत परिचय दिया, जन साहस के आगे पुर्तगाल सरकार अपना दम तोड़ चूकी थी, 19 दिसंबर 1961 को भारतीय सेना ने गोवा में प्रवेश किया, उन्होंने इस अभियान को ऑपरेशन विजय नाम दिया, सेना के प्रवेश के बाद 500 साल से अधिक समय तक भारत में शासन करने वाले पुर्तगाली वापस अपने वतन लौट गए, इसके साथ ही गोवा भारत संघ का अभिन्न हिस्सा बन गया।

 

- शुभम शर्मा