वन्य जीवन के चित्रकार : रामेश बेदी

दिंनाक: 20 Jun 2019 14:19:28


अपने कैमरे से वन्य जीवन की विविधता एवं रोमा॰च का सम्पूर्ण विश्व को दर्शन कराने वाले अद्भुत चित्रकार रामेश बेदी का जन्म 20 जून, 1915 को कालाबाग (वर्त्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। श्री बेदी गुरु नानक की 16 वीं पीढ़ी में थे। इनके पिता रेलवे में स्टेशन मास्टर थे, जो इनके जन्म से पूर्व ही लायलपुर में आकर बस गये थे।

श्री बेदी का परिवार आर्य समाज से प्रभावित था। 1922 में शिक्षा के लिए इन्हें हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी में भेजा गया। यहाँ चारों और प्रकृति की अनुपम छटा बिखरी हुई थी। एक ओर कल-कल निनाद करती माँ गंगा, तो दूसरी ओर हिमालय की शिवालिक पर्वत शृंखलाएँ। छुट्टियों में छात्र गुरुजनों के साथ वनों में जाते थे। वहाँ उन्हें जड़ी बूटियों की पहचान, उनके गुण-अवगुण, विभिन्न रोगों में उनका उपयोग तथा पदचिन्हों के आधार पर पशुओं की जानकारी दी जाती थी। 

गुरुकुल में प्राथमिक कक्षाओं में हिन्दी तथा संस्कृत पढ़ाई जाती थी,जबकि अंग्रेजी शिक्षण कक्षा छह से शुरू होता था। रामेश बेदी ने इन तीनों भाषाओं का अच्छा अभ्यास कर लिया। गुरुकुल से आयुर्वेद की स्नातक उपाधि लेकर वे उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता आ गये।

हरिद्वार में रहते समय एक बार एक ग्रामीण ने आकर बताया कि जंगल में एक अजगर हिरण को निगल रहा है। रामेश जी जब वहाँ पहुँचे, तो उनके मन में इच्छा हुई कि यदि कैमरा होता, तो यह चित्र लिया जा सकता था। कुछ समय बाद उन्होंने 150 रु. में एक कैमरा खरीद लिया। कोलकाता में उन्होंने अपने अध्ययन और अनुभव के आधार पर विभिन्न वनस्पतियों, औषधीय पौधों तथा वन्य जीवों के बारे में पत्र पत्रिकाओं में लेख लिखने शुरू किये। साथ में उनके द्वारा खींचे दुर्लभ चित्र भी होते थे। इनके प्रकाशन से उनका उत्साह बढ़ा और कुछ आय भी होने लगी।

कोलकाता से आयुर्वेद की उच्च शिक्षा लेकर रामेश बेदी 1940 में लाहौर आ गये और वहाँ एक चिकित्सालय खोल लिया। 1943 में इनका विवाह हो गया। देश स्वतन्त्र होने से दस दिन पूर्व ही वे परिवार सहित हरिद्वार आ गये। यहाँ वे सुबह होते ही चने और सत्तू लेकर जड़ी बूटियों की तलाश में निकल जाते। कभी-कभी तो रात जंगल में ही बितानी पड़ती।

1960 में जब केन्द्र शासन ने देशी चिकित्सा पद्धति का विभाग खोला, तो इन्हें अनुसन्धान अधिकारी की नौकरी मिल गयी। इस दौरान उन्होंने दुर्लभ औषधियों की खोज में देश विदेश में पर्वतीय क्षेत्रों की सघन यात्राएँ कीं। उनके द्वारा खोजे 10,000 से अधिक नमूने विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। 1972 में इस पद से अवकाश लेकर भी वे स्वतन्त्र रूप से इस काम में लगे रहे।

श्री रामेश बेदी जंगल में कभी हथियार लेकर नहीं गये। कई बार उनका खतरों से सामना भी हुआ। उनका मत था कि यदि पशुओं के बारे में अच्छी जानकारी हो, तो हथियार की आवश्यकता नहीं पड़ती। अपने लेखन में वे प्राचीन वेद और पुराणों के उद्धरण देते थे। उन्होंने 100 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनका देश विदेश की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। उन्होंने वन्य जीवन पर अनेक फिल्में बनायीं, जो प्रायः दूरदर्शन पर दिखायी जाती हैं। बी.बी.सी लन्दन ने उन्हें इस विषय पर अपना परामर्शदाता बनाया था।

9 अपै्रल, 2003 को दिल्ली में उनका देहान्त हुआ। उनके दोनों पुत्र अपने पिता के काम को आज भी आगे बढ़ा रहे हैं।