बलिदान-दिवस - राजा दाहरसेन का बलिदान

दिंनाक: 20 Jun 2019 14:12:50


इतिहास साक्षी है कि भारत भूमि पर होने वाले आक्रमणों को सिंध ने सदैव ही अपनी छाती पर झेला है। भारत पर जितने भी विदेशी आक्रमण हुए है वह सभी खैबर के दरें से हुए हैं। खैबर का दर्रा सिंध देश के पास है भारतीय सीमाओं के अंतिम प्रहरी सिंधु सम्राट महाराजा दाहिरसेन के बलिदान के पश्चात् भारत 1200 वर्षो तक गुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा। ईस्वी सन् की पांचवी सदी में सिंध में राई राजवंश का शक्तिशाली शासन था। जिसके राजा राई देवाजी, राई साहरस, राई साहसी, राई साहरस द्वितीय तथा राई साहसी द्वितीय ने सन् 486 से 632 तक कुल 142 वर्ष सिंध पर शासन किया। साहसी द्वितीय के राम नामक मुख्यमंत्री का एक अफसर था ‘‘चच’’ जिसे चारों वेद कंठस्थ थे। चच बुद्धिमान, पराक्रमी, दानवीर, कार्यकुशल एवं विनम्र होने के कारण सीधे राजा के संपर्क में था। साहसी द्वितीय अल्पआयु में ही चल बसे, जिनकी विधवा पत्नी सोंहदी ने निःसंतान होने के कारण तथा राज्य शासन चलाने हेतु योग्य व पराक्रमी ब्राह्मण चच से विवाह कर लिया। सम्राट चच को सोहंदी से दो पुत्र संतान की प्राप्ति हुई जिनके नाम चक्षुसेन व दाहरसेन रखे गए।

राजा दाहरसेन का जन्म 25 अगस्त 659 में हुआ। चच के सम्राट बनने के पूर्व ही मुगलों के आक्रमण प्रारंभ हो गए थे। जिन्हें सिंधी वीर अपने पराक्रम से सदैव ही नाकाम करते रहे। सम्राट चच ने भारतीय सीमाओं की सुदृढ़ सुरक्षा हेतु सिंध का राज्यभार अपने भाई चंद्रसेन को सौंपकर भारत की सीमांत राज्य पर विजय प्राप्त करने हेतु सेना लेकर निकल पड़े। सम्राट चच वीर एवं कुशल राजनीतिज्ञ होने के साथ ही दूर दृष्टि वाले एक महत्वाकांक्षी राजा भी सिद्ध हुए। उनके इन्हीं गुणों के कारण भारत की सीमाओं पर एक सुदृढ़ रक्षापंक्ति बन सकी। 


ईस्वी सन् 671 में महाराजा चच के 40 वर्षो के शासनकाल में बने विशाल सिंधु राज्य की रक्षा का भार उनकी मृत्यु के पश्चात् ज्येष्ठ पुत्र चक्षुसेन को सौंपा गया, मुगलों के बार-बार आक्रमण से जूझते राजा चक्षुसेन वीरगति को प्राप्त हुए। तत्पश्चात् राज्यभार 12 वर्षीय दाहिरसेन के कोमल कंधों पर आन पड़ा जिसे उनके चाचा चंद्रसेन के सहयोग से दाहिरसेन ने योग्यतापूर्वक सम्हाला परंतु पिता चच की मृत्यु के केवल 6-7 वर्ष बाद ही चाचा चन्द्रसेन भी परलोक पधार गए। तब मात्र 18-19 वर्ष की अल्पायु में ही सम्राट दाहिरसेन को अकेले ही मुस्लिम लुटेरों के हमलों का आए दिन सामना करना पड़ता था।

दाहिरसेन गुणवान, दानवीर व पराक्रमी योद्धा थें उनकी पत्नी महारानी लाडो की चार संतानें थी, पुत्र जयसिंह, पुत्रियां सूर्या देवी व परिमल थी। उनके पराक्रम को देखकर यवनों का कलेजा कांप उठता था। उस समय सिंधु सभ्यता की प्रसिद्धि विश्व के चारों ओर फैल चुकी थी, इसलिए अरबों की लालची निगाहें सिंधु पर टिकी रहती थी।

ईस्वी सन् 711 में मुस्लिम विस्तारवाद की आंधी अपनी चरम सीमा पर थी। विस्तारवाद की यह आंधी अपने राह में आने वाली हर बाधाओं को धूल की तरह उड़ाती सिंधु नदी के किनारे आ पहुंची थी।

ईराक का मो.इब्ल अल कासिम जो मो. बिन कासिम के नाम से भी जाना जाता था उसने मुस्लिम विस्तारवाद का जुनून था और उसे सिंध के अखूट खजाने को लूटने की तीव्र लालसा भी थी। मो. बिन कासिम ईराक का शासक नहीं था वरन् ईराक का खलीफा हज्जाज की लड़की उसके साथ ब्याही थी हज्जाज उसके रिश्ते में चाचा भी था।

कासिम ने जब सिंध पर हमला किया था उस समय उसके साथ सीरिया देश के 6000 सैनिक थे और ईराक व अरब की भारी फौज भी थी, यह भारी फौज मुहर्रम माह की दसवीं तारीख ईस्वी सन् 711 को देवल बंदर पर पहुंची दुर्भाग्य से तब देवल बंदर का प्रतिनिधि बौद्ध मतेन ज्ञान बुद्ध था जिसकी सोच कारता पूर्ण तथा अहिंसा परमोधर्म की थी भारी फौज देखकर वह भयभीत हो गया। जिस कारण बड़ी सहजता से कासिम ने देवल पर कब्जा कर लिया तत्पश्चात् कासिम ने दाहिर की सेना में शरणागत होकर रहने वाले मो. अलाफी के पास गुप्तचर भेजकर उसे अपने साथ मिला लिया।

दाहिर के मुख्यमंत्री मोक्षवास तथा सेनापति शमनी को भी सोने की मुहरें व जागीर का लालच देकर अपने साथ मिला लिया। मोक्षवास ने अपने सहयोगियों के द्वारा नदी पर पुल बंधवाने के साथ नदी पर नौकाएं आदि की सहायता सुलभ कराई। मोक्षवास के भाई रासल ने भी इस गद्दारी में उनका साथ दिया यह रासल राजकुमार जयंिसंह का विश्वासपात्र माना जाता था।

इस सहायता से कासिम ने नीरनकोट (हैदराबाद) को जीत लिया। मुस्लिमों के आक्रमणों को देखकर महाराजा दाहिरसेन की भुजाएं फड़फड़ा गई, उन्होंने सेना को बुलाकर रावल की ओर रूख किया व रावल से बढ़ते हुए चित्तोर में महाराजा दाहर ने मुगल फौज के साथ नौ दिनों तक भयंकर युद्ध किया सिंधुवीरों ने मुगलसेना के छक्के छुड़ा दिए। यह स्थिति देखकर मो. बिन कासिम को यह विश्वास हो गया कि मैं युद्ध में मारा जाऊंगा उसने स्वयं के वारिसों को कार्यभार संभालने के संकेत दे दिए थे।

सिंधुवीरों की वीरता व दाहिरसेन के अनोखे युद्धकौशल को देखकर मोक्षवास ने मो. बिन कासिम के साथ विचार-विमर्श कर धोखे व चालबाजी से काम लेने के लिए अरब सेना के कुछ पुरूषों को महिलाओं के वस्त्र पहनाकर बचाओ-बचाओ हमें अरब सेना गिरफ्तार करके ले जा रही है जिसे सुनकर दाहिरसेन ने कहा अभी मैं जीवित हूं और मेरे जीते जी ऐसा नहीं हो सकता यह कहकर महाराजा दाहिरसेन अपने सेना से दूर निकल गए और अरब सेना के घेरे में घिर गए। मौकाा देखकर मक्कार मुगलों और देशद्रोहियों ने दाहिरसेन की हाथी की पालकी पर अग्निबाण छोड़ा जिसकी गर्मी से हाथी क्रोधित हो उठा वह सेना को कुचलता हुआ राजा दाहिरसेन को लेकर नदी की ओर बढ़ा महावत के लाख कोशिशों के बाद भी हाथी काबू में न आ सका। अतंतः वह नदी में जा गिरा जिससे महाराजा दाहिरसेन बहुत बुरी तरह घायल हो गए उनके विश्वासपात्र महावत ने उन्हें एक गुप्तद्वार के द्वारा किले के भीतर पहुंचाया जहां महाराजा दाहिरसेन ने प्राण त्याग दिए। 16 जून सन् 712 का दिन था जिस दिन हिंदू कुल रक्षक महाराजा दाहिरसेन अपने प्राणों की आहुति देकर अपने देश पर बलिदान हुए।