हम यमुनाप्रसाद शास्त्री को क्यों याद करें !

दिंनाक: 20 Jun 2019 13:43:41


राजनीति और नेतागिरी आज जिस पतनशीलता के दौर से गुजर रही है, आम-आदमी के मुद्दे कारपोरेट के डस्टबिन में डाले जा रहे हैं, ऐसे में यमुना प्रसाद शास्त्री की रह-रहकर याद आना स्वाभाविक है। शास्त्री जी आज जिंदा होते तो मुजफ्फरपुर के 146 बच्चों की मौतों से क्लांत होकर उसी तरह दिल्ली सरकार पर हल्ला बोलने पैदल मार्च पर निकल पड़ते जैसे कि सरगुजा की झगराखांड़ खदान के मजदूरों की व्यथा को लेकर पैदल ही दिल्ली चल पड़े थे। आज यानी 20 जून को यमुनाप्रसाद शास्त्री की 22वीं पुण्यतिथि है। इत्तेफाक ही है कि यह तारीख क्रांति दिवस के चार दिन बाद पड़ती है। नई पीढ़ी को यह याद रखना चाहिए कि शास्त्रीजी की आँखें गोवा मुक्ति संघर्ष में पुर्तगालियों की लाठी- लात-जूते खाते हुए गईं थी।

 

 शास्त्री जी जीवन पर्यन्त राजनीति की अंधेरी कोठरी में  गरीब गुरबों के लिए रोशनदान की तरह उजाले की उम्मीद जगाते रहे। उनकी दृष्टि वैश्विक थी इसीलिए रीवा में जिस झोपड़े में उन्होंने जीवन जिया उसे वसुधैव कुटुम्बकम का नाम दिया। 

 

शास्त्री जी की जरूरत विंध्य को ही नही देश और दुनिया को भी रही है। उनके व्यक्तित्व व कृतित्व को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता। शास्त्री के हृदय में जितना दर्द सीधी सिंगरौली रीवा हनुमना के जड़कुड और अर्जुन कहुआ के गरीब आदिवासियों के लिए था, उतनी ही तड़प अफ्रीका और लातीन अमेरिका में भूख और कुपोषण से पीड़ित बच्चों के लिए भी। 

 

यूपीए सरकार के तमाम घपलों घोटालों के बावजूद जिन अच्छे कामों के लिए जाना जाएगा, उन सभी को शास्त्रीजी ने पार्लियामेंट में बहुत पहले ही अशासकीय संकल्पों के जरिए प्रस्तुत कर चुके थे। 

राइट टु इनफारमेशन, राइड टू फूड, राइट टू वर्क, राइट टु एजुकेशन, इन सबकी मौलिक अवधारणा शास्त्री जी की ही थी।

 

 शास्त्रीजी 77 में लोकसभा के लिए चुने गए। यह दुनिया के लिए बड़ी खबर थी। एक रंक ने राजा को हरा दिया। उनकी नेत्रहीनता को लेकर भी तमाम चर्चाएं होती रहीं। अच्छी भी और बुरी भी। लेकिन मेरे जैसे बहुत से लोग कल भी मानते थे और आज भी याद करते हैं कि काश शास्त्री जी जैसी दिव्य दृष्टि सभी राजनेताओं को मिल पाती। 

 

शास्त्री जी लोकतांत्रिक समाजवाद के पक्षधर रहे। आचार्य नरेन्द्रदेव के वे सच्चे अनुयायी या यों कहें सच्चे उत्तराधिकारी थे। उन्हें सत्ता सुख के दो मौके आए। 77 में और फिर 89 में। 77 में तो वे प्रदेश की सत्ता की राजनीति के नियंता ही थे। जैसे चाहा वैसे प्रदेश की सरकार चली। पहली बार विधायक बने उनके कई साथी अनुयायी केबिनेट में पहुंचे, पर शास्त्रीजी स्वयं सत्ता से निर्लिप्त रहे। 

 

सन् 89 के दौर में जब वीपी सिंह सरकार का पतन हुआ और कांग्रेस के समर्थन से चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री के लिए सक्रिय हुए तो वे शास्त्री जी से भी मिलने पहुंचे। मुझे याद है शास्त्री जी उन दिनों दिल्ली के एस्कार्ट हास्पिटल में थे। चन्द्रशेखर ने उनके सामने अपने कैबिनेट में मंत्री बनने का प्रस्ताव रखा। सरकार के पतन से आहत शास्त्रीजी ने जवाब दिया कि मेरा तो आपके साथ जाने का प्रश्न ही नहीं उठता, किन्तु मेरी राय तो यह है कि चन्द्रशेखर जी आप भी यह अपकर्म न करें क्योंकि कांग्रेस कभी किसी की सगी नहीं रही। 

 

शास्त्री जी चन्द्रशेखर के अनन्य मित्रों में से थे। भारत यात्रा में उनके साथ मीलों की दूरियां नापीं, पर जब राजनीति के सिद्धान्तों की बात आई तो चन्द्रशेखर को भी खरी-खरी सुनाने के पीछे नहीं रहे। 

 

मधु दण्डवते, मधु लिमये, रामकृष्ण हेगड़े और सुरेन्द्र मोहन उन नेताओं में थे जिनके प्रति शास्त्री के हृदय में अपार सम्मान था। वे लोग भी शास्त्री से असीम स्नेह रखते थे। दलितों-पीड़ितों और आदिवासियों के लिए आन्दोलन का कोई न कोई मुद्दा वे ढूंढ ही लेते थे। आन्दोलन का समापन शास्त्री जी के अनशन के साथ होता था। 

 

एक बार सुरेन्द्र मोहन जी ने कहा-शास्त्रीजी, बायपास हो चुकी है, एसीटोन जाने लगता है, अब तो अपनी देह का ख्याल रखते हुए ये ‘वार्षिक कार्यक्रम’ न किया करिए। शास्त्री जी उस वक्त तो चुप रहे और संतरे का जूस पीकर अनशन त्याग दिया। बाद में मैने सुरेन्द्र मोहन जी की नसीहत का ध्यान दिलाया तो लगभग डाटते हुए बोले- मेरे अनशन से अगर पांच भूखे परिवारों तक इमदाद पहुंच जाती है और उनका चूल्हा जलता है तो ऐसा अनशन साल में एक बार नहीं, कई-कई बार करूंगा। मैने कब चिन्ता की कि कोई मेरा अनशन तुड़वाने आए।

 

 दरअसल शासन-प्रशासन शास्त्री जी के अनशन की घोषणा के साथ ही सक्रिय हो जाता था और हर पंचायतों तक राशन और मजूरों के लिए काम के इस्टीमेट बनने शुरु हो जाते थे। शास्त्री जी बेबसों, निर्धनों और मुसीबत जदा लोगों के लिए स्वमेव एक राहत थे। 

 

राजनीति में गांधी के बाद शास्त्री ही ऐसे दुर्लभ हठयोगी थे कि उन्होंने जो ठान लिया सो ठान लिया। इस बात की कतई चिंता नहीं कि साथ में कितने लोग चल रहे हैं। झगराखाड़ कोयलरी के मजदूरों के लिए उन्होंने ‘दिल्ली’ मार्च किया। पैदल ही सरगुजा से दिल्ली की ओर चल पड़े। रास्ते में केन्द्र सरकार का दूत पत्र के साथ पहुंचा कि मांगे मान ली गईं। 

 

अस्वस्थता के बावजूद आखिरी दिनों में सिंगरौली से भोपाल के लिए कूंच कर दिया। मुद्दा था सिंगरौली के एक गरीब परिवार के साथ दबंगों का अत्याचार। आज नेताओं  के साथ वक्त गुजारने वाले टहलुए देखते ही अरबपति बन जाते हैं, इसके उलट शास्त्री जी का कबीराना अन्दाजा था ‘जो घर फूके आपना, चले हमारे साथ’ घर फूंककर शास्त्री जी की राह पकड़ने वालों की कभी कमी नहीं रही।

 

 एक बार विधायक होने के बाद नेता अपने आल औलाद के बारे में सोचती है। यही सवाल 90 के विधानसभा चुनाव में जब मैने उनके पुत्र देवेन्द्र शास्त्री की टिकट की पैरवी के साथ किया तो मुझे फिर एक बार डांट मिली ‘‘हां अन्धा तो हूं ही तुम मुझे धृतराष्ट बन जाने के लिए कह रहे हो’’। 

 

आखिरी में शास्त्री जी के लिए आइंस्टीन के वही शब्दांश जो उन्होंने गांधी के लिए कहा था ‘‘आने वाली पीढ़ी शायद ही इस बात पर यकीन करे कि भारत में हाड़-मांस का ऐसा भी कोई  सख्स था, जिसकी अहिंसक हुंकार से सत्ताएं हिल जाया करती थी। शास्त्री जी की स्मृति को शत-शत नमन’’।          

 - पुण्यस्मरण/जयराम शुक्ल