तान्हाजी एक कम प्रसिद्ध योद्धा की शौर्य गाथा

दिंनाक: 12 Jan 2020 13:54:07

 


-  डॉ कृपा शंकर चौबे  

आम तौर पर मेरी फिल्मों के रिव्यू में विशेष रुचि नहीं है,किंतु इस फ़िल्म पर बात किया जाना आवश्यक है। भारतीय इतिहास साहसी योद्धाओं के पराक्रम का धधकता इस्पाती दस्तावेज है किंतु हमारी क्षुद्रता या सीमित समझ कहिए कि हम अपने इतिहास नायकों के स्थान पर आक्रांताओं के इतिहास को पढ़ने/जानने में अधिक रुचि रखते हैं,अगर ऐसा नहीं है तो ओम राउत के निर्देशन से सजी, अजय देवगन,काजोल,शरद केलकर,सैफ अली खान आदि अभिनीत यह फ़िल्म नज़दीकी सिनेमाघरों में अपने अनोखे और बहु प्रतीक्षित विषय,बेहतरीन विसुअल्स,उत्तम अभिनय ,शानदार संवाद और इन सबमे इतिहास तथा राष्ट्र के गौरव बोध के साथ माथा ऊंचा करके खड़ी है।

फ़िल्म में निःसंदेह कुछ रचनात्मक स्वतंत्रता ली गई है,किन्तु उतनी ही जितनी किसी फिल्म को रोचक और प्रवाहवान बनाए रखने के लिए ज़रूरी होती है।गीत संगीत औसत से ऊपर है,हालांकि इस फ़िल्म में बैकग्राउंड म्यूज़िक के अतिरिक्त किसी और मनोरंजन की न तो आवश्यकता है,न गुंजाइश।

सम्पूर्ण फ़िल्म राष्ट्र गौरव और अस्मिता बोध का परचम बुलन्द करके चलती है।बगैर किसी अनुचित और अश्लील दृश्य के यह एक सम्पूर्ण परिवार के साथ देखे जाने योग्य फ़िल्म है।कहानी का सारांश कुछ इस प्रकार है- मात्र १६ वर्षकी आयुमें ही छत्रपति शिवाजी महाराजने स्वराज स्थापित करनेकी प्रतिज्ञा की । गिने-चुने मावलों में राष्ट्र प्रेम जागृत कर उन्हें लड़ना सिखाया और स्वराज की संकल्पना से उन्हें अवगत कराया । स्वराज्य के लिए गिने-चुने मावलोंने प्राणोंकी चिंता किए बिना अपने-आपको राष्ट्र यज्ञ में झोंक दिया । पांच मुसलमानी सल्तनतों के विरोध में लड़ते - लड़ते एकाधिक भूप्रदेशों को जीत लिया ।


तहसील भोर के सह्याद्री पर्वत के एक शिखरपर विराजित रायरेश्‍वर के स्वयंभू शिवालय में छत्रपति शिवाजी महाराजने २६ अप्रैल १६४५ में स्वराज स्थापित करने की शपथ ली थी । बारह मावल प्रांतोसे कान्होजी जेधे, बाजी पासलकर, तानाजी मालुसरे, सूर्याजी मालुसरे, येसाजी कंक, सूर्याजी काकडे, बापूजी मुदगल, नरसप्रभू गुप्ते, सोनोपंत डबीर जैसे लोग भोर के पहाडों से परिचित थे । इन सिंह समान महापराक्रमी मावलोंको साथ लेकर शिवाजी महाराजने स्वयंभू रायरेश्‍वर के समक्ष स्वराज की प्रतिज्ञा ली ।


जून १६६५ के पुरंदर समझौतेके अनुसार शिवाजी महाराज को मुगलों के हाथों सिंहगढ समेत २३ किले सौंपने पडे थे । इस समझौते ने मराठों के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई। सिंहगढ कथागीत के अनुसार एक सवेरे जब जीजाबाई प्रतापगढ की खिडकी से देख रही थीं, उस समय कुछ दूरी पर उन्हें सिंहगढ दिखाई दिया । यह किला मुगलोंके आधिपत्यमें है, यह सोचकर वे अत्यंत क्षुब्ध थीं। उन्होंने तत्काल एक घुडसवारको शिवाजी महाराजके पास रायगढ भेजा तथा उसके साथ संदेशा भेजा कि वे तुरंत प्रतापगढ उपस्थित हों ।


शिवाजी महाराज बुलावे का कारण जाने बिना अपनी माताके संदेशानुसार तत्काल उपस्थित हुए । जीजाबाई उनसे क्या चाहती थी, यह जानते ही उनका दिल बैठ गया । उन्होंने जीजाबाई को समझानेका प्रयास किया कि प्रचुर प्रयासों के पश्चात भी सिंहगढ जीतना असंभव था । कथागीतके अनुसार शिवाजी महाराजने कहा- "उसे जीतने हेतु बहुत जन गए किंतु वापिस एक भी नहीं आया : आमके बीज बहुत बोए किंतु एक पेड भी नहीं उगा।"


इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु शिवाजी महाराज ने एक व्यक्ति का नाम सोचा, जिसपर यह कठिन उत्तरदायित्व सौंपा जा सकता था । तानाजी मालुसरे के अतिरिक्त शिवाजी महाराज किसी और का नाम सोच भी नहीं सकते थे । तानाजी उनके बचपन के घनिष्ठ मित्र,अत्यंत साहसी, पराक्रमी एवम चतुर रणनीतिकार थे तथा हर मुहीम पर शिवाजी महाराजके साथ थे।


जब शिवाजी महाराजसे रायगढ पर मिलनेका संदेश प्राप्त हुआ तब तानाजी मालुसरे उंब्रत गांवमें अपने बेटे के विवाह की योजनाओं में व्यस्त थे । वे शीघ्र ही अपने भाई सूर्याजी तथा मामा शेलार के साथ महाराज से मिलने निकल गए । अपने परम मित्र तानाजीको कौनसी मुहीम हेतु चुना है यह बतानेका साहस महाराजके पास नहीं था, अत: उन्होंने तानाजीको मुहीम के विषय में जानने हेतु जीजाबाईके पास भेजा।


मुहीम की भयावहता की परवाह न करते हुए शेरदिल तानाजीने विजय की शपथ ली । तानाजी ने रात को मुहीम का आरंभ किया तथा कोकण की ओरसे छुपकर वर्ष १६७० में ४ फरवरी की ठंडी, अंधेरी रात में अपने साथियों को लेकर किले की ओर प्रस्थान किया ।


लगभग ३०० लोग ही अब तक ऊपर चढ पाए थे, कि पहरेदारों को उनके आने की भनक हो गई । तान्हाजी के लगभग ७०० सैनिक अभी नीचे ही खडे थे तथा उन्हें अपनेसे कहीं अधिक संख्यामें सामने खडे शत्रुसे दो-दो हाथ करना पडे। घनघोर लडाई आरंभ हो गई।तानाजीके कई लोग मारे गए, किंतु उन्होंने भी मुगलोंके बहुत सैनिकोंको मार गिराया । अपने सैनिकोंकी हिम्मत बढ़ाने हेतु तानाजी जोर-जोर से गा रहे थे । थोडे समयके पश्चात मुगलोंका सरदार उदय भान तानाजी से लडने लगा । मराठों को अनेक अडचनें आ रही थीं । रात की लंबी दौड, मुहीम की चिंता, किले की प्राचीर चढ़ कर आना, तथा घमासान युद्ध करना; इन सारी बातों पर तानाजी पूर्व में ही कडा परिश्रम कर चुके थे, इस पर उदय भान ने युद्ध कर उन्हें पूरा ही थका दिया ।परिणामस्वरूप लंबी लडाईके पश्चात तानाजी गिर गए । तानाजीने जितना हो सका, उतने समय तक युद्ध जारी रखा , जिससे नीचे खडे ७०० सैनिक पहरा तोडकर अंदर घुसने में सफल हो सके।वे तानाजीके बंधु सूर्याजी के नेतृत्व में लड रहे थे । सूर्याजी बिलकुल समय पर पहुंच गए तथा उनकी प्रेरणा से मराठोंको अंत तक लडने की हिम्मत प्राप्त हुई। मुगल सरदार की हत्या हुई तथा पूरे किले की सुरक्षा तहस नहस हो गई । सैकडों मुगल सिपाही स्वयं को बचाने के प्रयासमें किले से कूद पडे तथा उसमें मारे गए।


मराठों को बडी विजय प्राप्त हुई थी किंतु उनकी छावनी में खुशी नहीं थी । जीतका समाचार शिवाजी महाराज को भेजा गया,जो तानाजीका अभिनंदन करने तुरंत गढ की ओर निकल पडे, किंतु उसे उस शूर वीरकी मृत देह देखनी पडी।अपने मित्र की मृत्युकी सूचना प्राप्त होते ही उन्होंने कहा - "हमने गढ जीत लिया है, किंतु एक सिंहको खो दिया है..."

तो जाइये.... और अपने बच्चों के साथ आवश्यक रूप से यह फ़िल्म देख कर आइये।