वर्तमान समय में पर्यावरण की यथार्थ वास्तविकता है फ़िल्म “वन रक्षक”

दिंनाक: 03 Jan 2020 18:55:56

 


पेड़-पौधें प्रकृति की ऐसी नियामत हैं जो वातावरण की तमाम जहरीली गैसों को सोख लेते हैं और इंसान को जीवन दायिनी हवा प्रदान करते हैं. इसलिए इंसान पर्यावरण को बिगाड़ने के लिए अपने स्तर पर कोई काम न करने के साथ ही यह प्रण भी अवश्य ले कि पृथ्वी में ज्यादा से ज्यादा वृक्ष लगाए. इससे न केवल प्रदूषण को रोकने में मदद मिलेगी बल्कि इंसान को जीने के लिए साफ़ - सुथरी हवा भी मिलेगी.

 अजीब लगता है यह देख कर  कि एक तरफ पर्यावरण को बचाने की मुहीम में संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर  देश - दुनिया की  तमाम सरकारों के साथ ही वैश्विक स्तर पर काम कर रहे असंख्य स्वेच्छिक संगठन पेड़ों को बचाने की मुहीम में सक्रिय हैं तो दूसरी तरफ इसी दुनिया में कुछ ऐसी ताकतें सक्रिय हैं जो अपने आज के सीमित स्वार्थ के लिए न केवल  पेड़ों को बलात काटने के काम में लगीं हैं बल्कि बन की सुरक्षा में तैनात वन विभाग के उन इमानदार कर्मचारियों की हत्या करने - करवाने से भी संकोच नहीं करती जो वनों के अवैध कटान का विरोध करते हैं . ऐसे ही इमानदार वन संरक्षकों के जीवन पर आधारित है फिल्म , "वनरक्षक " .

 वन है तो हम हैं 

वन रक्षक फ़िल्म एक फारेस्ट गार्ड की आपबीती है जो बचपन से ही अपनी धरती माँ से प्रेम करता है। इस फ़िल्म में ग्लोबल वार्मिंग और प्रकृति संरक्षण की बात पुरज़ोर तरीके से की गई है। लेखक जितेंद्र गुप्ता ने इस फ़िल्म में प्राकृतिक संरक्षण और विकास को बड़े अच्छे तरीके से जोड़ा है। आज के समय में जब पर्यावरण पर पूरी दुनिया में बहस छिड़ी है, 17 वर्षीय 'ग्रेटा थनबर्ग' पर्यावरण संरक्षण के लिए सबसे अपील कर रही है, वैसे समय में ऐसी फ़िल्म का बनना अपने आप में ही इसकी महत्ता को साबित करता है।

 निर्देशक पवन कुमार शर्मा की यह  फ़िल्म एक स्थानीय  फारेस्ट गार्ड चिरंजीलाल चौहान के जीवन पर बनी एक यथार्थवादी और सच्ची घटना पर बनी है . चिरंजी लाल को अपनी धरती से बहुत प्यार है और पर्यावरण संरक्षण के चलते पेड़ों की रक्षा करने को वह अपना परम कर्तव्य और धर्म समझता है . इसी धर्म का पालन करने में उसकी जान भी चली जाती है . इस फ़िल्म की शूटिंग हिमाचल के जंजैहली में हुई है।

 वनों को बचाने का सन्देश देती है यह फ़िल्म

इस फ़िल्म  की पटकथा लिखते हुए लेखक जीतेन्द्र  गुप्ता ने जलवायु  परिवर्तन से होने वाले खतरों की तरफ इशारा करते हुए पर्यावरण और वन संरक्षण को बहुत ही सटीक तरीके से विकास के साथ भी जोड़ा है ।  जे एम के एंटरटेनमेंट के बैनर तले निर्मित इस फ़िल्म को इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल और नेशनल फ़िल्म अवार्ड के लिए भेजा जाएगा। इस फ़िल्म की एक खासियत यह भी है कि यह फिल्म एक साथ दो भाषाओं - हिंदी और हिमाचली  में बनी है.   इस फ़िल्म में हिंदी  और हिमाचली कलाकारों मिश्रण है और सभी ने फिल्म निर्माण में जबरदस्त मेहनत की है .


इस फ़िल्म  के  मुख्य किरदार  धीरेंद्र ठाकुर और फ़लक खान हैं। धीरेन्द्र चिरंजीलाल चौहान नामक वन रक्षक की भूमिका में हैं | पूरी फिल्म की कहानी चिरंजीलाल चौहान के इर्दगिर्द घूमती है जो जंगलों को सुरक्षित रखने की बात कहता है। बिहार के मधुबनी जिले के रहनेवाले धीरेन्द्र ठाकुर का अभिनय के क्षेत्र में यह पहली फ़िल्म है। इससे पहले धीरेन्द्र ठाकुर दिल्ली में थिएटर से जुड़ें रहें हैं। धीरेन्द्र ठाकुर बताते हैं कि अभिनय के क्षेत्र में कदम उन्होंने अपनी माँ के कारण रखा है। ये उनकी माँ का सपना है कि वे अभिनेता बनें। व्यवहार से शांत स्वभाव के धीरेन्द्र ठाकुर ने अपने अभिनय से सबको संतुष्ट किया है। यशपाल शर्मा, आदित्य श्रीवास्तव, राजेश जैश जैसे अभिनेता ने भी इनकी खूब तारीफ़ की है। कई सीन्स में अभिनय के बाद धीरेन्द्र जी ने पूरी क्रू के तरफ़ से तालियां और शाबाशी बटोरी है।

इसके अलावा  अभिनेता आदित्य श्रीवास्तव, यशपाल शर्मा और राजेश जैश भी इस फिल्म की  अहम भूमिकाओं में हैं .  इस फ़िल्म के म्यूजिक डायरेक्टर हिमाचल के 'बालकृष्ण शर्मा' हैं। साथ ही , इस फ़िल्म में पद्मश्री शुभा मुदगल, हंसराज रघुवंशी, कुलदीप शर्मा, शक्ति सिंह सरीक़े के गायक अपनी आवाज़ देंगे। इस फ़िल्म के गीतकार पद्मश्री सुनील जोगी जी हैं।

 वनरक्षक महज़ एक काल्पनिक कहानी नहीं अपितु आज की वास्तविकता है 

वनरक्षक महज़ एक काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि यथार्थ जीवन के एक ऐसे सच्चे सेनानी की कहानी है जो जीवन के ऐसे सच का डट कर मुकाबला करता है जिससे डर कर आम आदमी घर पर बैठा जाता है. लेकिन वनरक्षक के असली हीरो चिरंजीलाल चौहान ने असंतुलित विकास और जलवायु परिवर्तन के चलते आम आदमी के जीवन पर पड़ने वाले खतरों का मुकाबला करने के उद्देश्य से पर्यावरण की सुरक्षा करने की सच्चाई के एक ऐसे कठिन सच का मुकाबला करना पड़ गया की इस कडवी सच्चाई का सामना करते - करते उसे अपनी जान ही देनी पड़ गई थी. स्वाध्य्याय के चलते उसे जलवायु परिवर्तन से होने वाले भयानक खतरों की जानकारी जब उसे मिलने लगी तब उसने वन संरक्षण को अपने जीवन का एक लक्ष्य ही बना लिया था .  अपने इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए चिरंजी ने  वन विभाग में अपेक्षाकृत छोटे समझे जाने फारेस्ट गार्ड जैसे पद  पर काम करने का मन बना लिया था।