‘हिन्दू चेतना’ के संपादक जगदीश चंद्र त्रिपाठी

दिंनाक: 03 Jan 2020 18:33:07


संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री जगदीश चंद्र त्रिपाठी का जन्म तीन जनवरी, 1936 को अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में श्री शिवदत्त त्रिपाठी के घर में हुआ था। 1946 में वे स्वयंसेवक बने। 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा तथा सर्वत्र उसका विरोध होने लगा। यद्यपि बाद में प्रतिबंध हट गया; पर उनके घर में संघ का विरोध जारी रहा। फिर भी वे शाखा पर जाते रहे। उन्होंने स्नातक तक की शिक्षा अल्मोड़ा से ही प्राप्त की। 1956 में प्रथम वर्ष तथा 1955 में द्वितीय वर्ष का संघ प्रशिक्षण प्राप्त कर 1956 में वे प्रचारक बन गये।

उत्तर प्रदेश में वे पूरनपुर, शाहजीपुर, एटा, शामली, गाजियाबाद, श्रीनगर गढ़वाल तथा रामपुर में नगर, तहसील व जिला प्रचारक रहे। 1967 में उन्हें असम के तेजपुर में भेजा गया। कई वर्ष वे बंगाल में वर्धमान विभाग प्रचारक तथा कोलकाता में प्रांतीय कार्यालय प्रमुख भी रहे। 1984 से 1990 तक वे वरिष्ठ प्रचारक श्री भाऊराव देवरस के निजी सहायक रहे। फिर उन्होंने उत्तरांचल उत्थान परिषद (अल्मोड़ा), वनवासी कल्याण आश्रम (सोलन, हि.प्र.), लोकभारती (लखनऊ) तथा विश्व संवाद केन्द्र (अल्मोड़ा) का कार्यभार भी संभाला।

वर्ष 2000 में उनकी योजना ‘विश्व हिन्दू परिषद’ में हुई। प्रारम्भ में उनका केन्द्र हरिद्वार था। वहां कार्यालय की देखरेख तथा धर्माचार्यों से सम्पर्क का काम उनके जिम्मे था। फिर वृन्दावन रहकर वे धर्माचार्यों से सम्पर्क करते रहे। 2004 में वे परिषद के दिल्ली स्थित केन्द्रीय कार्यालय (संकटमोचन आश्रम) में आ गये तथा दो वर्ष तक वहां की व्यवस्था में रहे। परिषद की ओर से कई पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं। इनमें से ‘हिन्दू चेतना’ पाक्षिक पत्रिका मुख्यतः साधु-संतों के पास भेजी जाती है। इसके सम्पादक श्री भैया जी कस्तूरे के निधन के बाद 2006 में इसके सम्पादन की जिम्मेदारी जगदीश जी को दी गयी।

‘हिन्दू चेतना’ पत्रिका का कार्यालय संकटमोचन आश्रम से 20 कि.मी. दूर झंडेवाला मंदिर के पास है। जगदीश जी प्रतिदिन प्रातः लगभग नौ बजे यहां से निकलकर बस से पत्रिका के कार्यालय में समय से पहुंच जाते थे। कार्यालय का समय समाप्त होने के बाद वे इसी प्रकार वापस आते थे। दोपहर का भोजन वे झंडेवाला के संघ कार्यालय में करते थे। उनकी समयशीलता के कारण पत्रिका के कार्यालय में भी अनुशासन का वातावरण बन गया। उन्होंने पत्रिका के रंग, रूप और विषय वस्तु में अनेक सुधार किये, जिससे उसकी गुणवत्ता बढ़ी और उसकी प्रसार संख्या में भी वृद्धि हुई।

जगदीश जी बहुत सरल, सौम्य और अध्ययनशील व्यक्ति थे। बच्चों में वे बहुत शीघ्र घुलमिल जाते थे। अपने घर जाने पर वे संघ विचार की कुछ पुस्तकें वहां दे आते थे। वे किसी भी भाषा-बोली को बहुत जल्दी सीखकर बोलने लगते थे। हिन्दी और कुमाऊंनी के साथ ही वे बंगला, मराठी और पंजाबी भी बोल लेते थे। आपातकाल में वे दार्जिलिंग में गिरफ्तार हुए। कुछ समय बाद उनकी जमानत हो गयी; पर उन्हें हर महीने थाने में हाजिरी देनी पड़ती थी। वे महीने के अंतिम दिन तथा फिर अगले महीने के पहले या दूसरे दिन जाकर दो महीने की हाजिरी लगवा लेते थे। शेष समय वे जनजागरण में लगाते थे। 

11 मार्च, 2015 को वे हर दिन की तरह पत्रिका के कार्यालय में गये; पर स्वास्थ्य ढीला होने के कारण 12 मार्च को वहां नहीं गये। रात में सात बजे उन्हें भीषण मस्तिष्काघात हुआ, जिससे तत्काल उनका प्राणांत हो गया। पास के कमरे वाले आवाज सुनकर दौड़े। जगदीश जी के मुंह और नाक से खून निकल रहा था। तुरंत उन्हें अस्पताल ले जाया गया; पर वहां डॉक्टरों ने भी उन्हें मृत घोषित कर दिया। उन्होंने न किसी को कष्ट दिया और न ही स्वयं कष्ट उठाया। अंतिम दिन तक काम करते हुए उन्होंने अपनी जीवन-यात्रा पूर्ण की।