छद्म उदारता दिखाता है तनिष्क का एकत्वम विज्ञापन

दिंनाक: 19 Oct 2020 15:40:26


 

 

    -  विवेक कुमार पाठक   

एक हुए हम तो क्या न कर जाएंगे हम। तनिष्क के जूलरी विज्ञापन ने इस पंच लाइन के साथ संदेश दिया था कि मुस्लिम समुदाय आज इतना उदार है कि हिन्दू बहू की खुशी के लिए गोद भराई की रस्म करने जा रहा है। वह हिन्दू और मुस्लिम पूजा पद्धतियों एवं रस्मों में अंतर नहीं समझता। घर में नटराज की प्रतिमा रखता है, दीपावली जैसे दीपक जलाता है इसलिए कोई भी बहु मुस्लिम परिवार में आकर इतना खुश रहेगी।


वास्तव में यह विज्ञापन नहीं खुला आमंत्रण है। उदार इस्लाम का नैरेटिव तय करने का सुनियोजित प्रयास है। यह हिन्दु लड़कियों को मुस्लिमों से विवाह करने के लिए प्रोत्साहित करता डिजीटल प्रस्ताव है। असल में तो एक हुए हम तो क्या न कर जाएंगे हम कहकर यह एकता की जगह दूसरी ही बात करता है। क्या बिना हिन्दू मुस्लिम विवाह के एक नहीं हुआ जा सकता। एक दूसरे के रीति रिवाज और संस्कारों का मान सम्मान युवा एक दूसरे से विवाह किए बिना भी तो कर सकते हैं तो हिन्दू वधु और उदार मुस्लिम परिवार के प्रतीक की क्या जरुरत। क्या एकता हिन्दू वधु और मुस्लिम वर के होने पर ही स्थापित होगी।


असल में तनिष्क का यह विज्ञापन एकता से कहीं अधिक मुस्लिमों की उदार छवि की बात करता है मगर क्या हकीकत में भी एकदम ऐसा ही है। देश दुनिया में देखिए, बिल्कुल नहीं है ऐसा। कितने मुस्लिम घर ऐसे हैं जिनकी हिन्दु बहुओं को अपने धर्म पालन की पूर्ण स्वतंत्रता है। कितने ऐसे मुस्लिम घरों में राम कृष्ण के जन्मोत्सव मनाए जाते हैं। कितने मुस्लिम घरों में हिन्दू बहुओं को नवरात्र के उपवास रखने की स्वतंत्रता है। कितने मुस्लिम पति अपनी हिन्दू पत्नी के साथ शिवालयों पर जाते हैं और शीश नवाते हैं। कितने मुस्लिम घर हिन्दू बहुओं की खुशी के लिए बच्चों के हिन्दू नाम रखते हैं। इन सारे सवालों के असल जवाब क्या हैं किसी को बताने की जरुरत नहीं है। अभिजात्य पटौदी परिवार से लेकर तमाम संपन्न मुस्लिम परिवारों की धार्मिक उदारता तक तनिष्क के विज्ञापन जैसी नहीं है। सैफ से निकाह के बाद करीना कपूर क्यों करीना कपूर खान बनने को मजबूर हुईं। शाहरुख, आमिर के बच्चों का धर्म जान लीजिए। देश के धार्मिक स्थलों पर कई दिनों तक सर्वेक्षण कर आइए।


अजमेर की दरगाह पर जितनी बड़ी संख्या में हिन्दू दर्शन को जाते हैं उसकी तुलना में कितने मुस्लिम वैष्णोदेवी और बाबा अमरनाथ की यात्रा पर जाते हैं। आपको खुद ऐसे मुस्लिम घरों को ढूंढ़ना चाहिए जिनमें हिन्दु बहुओं के साथ अब्बाजान और अम्मी सहित पूरा परिवार कन्यापूजन करता है। खुद देखिए और खुद तय कीजिए कि तनिष्क क्या दिखा रहा है और हकीकत में क्या होता आ रहा है। सेकुलर और कम्युनिष्ट मित्रगण कितने मुस्लिम मित्रों की धार्मिक कट्टरता को तनिष्क विज्ञापन सरीखी उदारता में बदल पाए हैं। क्यों धार्मिक उदारता हिन्दुओं के कंधे पर सालों से टंगी हुई है और इस एकतरफा उदारता को कौमी एकता और एकत्वम नाम दिया जा रहा है। कढ़वे से भी हजार गुना कढ़वा ये सत्य है कि मुस्लिम धर्म के मानने वाले करोड़ों परिवारों में से कुछ लाख भी अपनी धार्मिक कट्टरता का त्याग नहीं कर पाए हैं। वे अपने धर्म के अलावा अन्य को अपनाने के मामले में उदार नहीं है। वहां मैं ही सर्वश्रेष्ठ का धार्मिक वाक्य ध्येय बना हुआ है। सुबह से शाम तक पांचों वक्त एक की उपासना के अलावा किसी को पूजने का विधान नहीं है। ये नजारे भारतवर्ष के छोेटे बड़े हर शहर और कस्बे में देखे जा सकते हैं। इसलिए अगर ऐसी धार्मिक उदारता अभी अपनायी नहीं गयी है तो उसे देखने और उसकी तारीफ का कोई मतलब नहीं है। तनिष्क का एकत्वम विज्ञापन धार्मिक उदारता के मायाजाल से ज्यादा कुछ नहीं है। ऐसी आभाषी और काल्पनिक उदारता को हकीकत में देखने का पूरा देश इंतजार कर रहा है। एक दूसरे के रीति रिवाज, संस्कार और रस्मों को अपनाए बिना एकत्वम का यह विज्ञापन मृग मारिचिका से अधिक कुछ नहीं है।