सरदार पटेल: आधुनिक भारत के राष्ट्रनिर्माता

दिंनाक: 31 Oct 2020 15:37:54

 डाॅ. जीवन एस. रजक 

जीवन का अर्थ है, अविराम निरन्तर उद्देश्यपूर्ण गतिशीलता। ऐसी गतिशीलता जो अवरोधों पर रूके नहीं, चट्टानों पर झुके नहीं और तूफानों में मुड़े नहीं। सरदार वल्लभ भाई पटेल का व्यक्तित्व एक ऐसे ही महान व्यक्ति का व्यक्तित्व है, जिसने जीवन भर गंगा की तरह संघर्ष किया। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये सरदार पटेल ने अविराम संघर्ष किया। उनका व्यक्तित्व भारत के करोड़ों कृषक और मजदूरों के लिये गंगा की वह धारा बना जिसने अपने प्रवाहशील जीवन से न केवल उन्हें सुख, संतोष और परितोष दिया, अपितु बंधन मुक्ति का आत्म संतोष भी प्रदान किया।

सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषक थे। उनमें कृषक की जन्मजात सहनशीलता, परिश्रमशीलता, सच्चाई और स्वाभिमान के सभी गुण विद्यमान थे। अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठा, लगन और उसे मूर्तरूप देने की तत्परता उनके व्यक्तित्व का एक उज्जवल पक्ष था। उन्होंने अपने जीवन में जो सोचा, जो ठीक समझा, अपना जो उद्देश्य बनाया उसे पूरा किया। वे आधुनिक भारत के राष्ट्र निर्माता हैं। एक महान् राष्ट्रवादी चिंतक रूप में उनका सारा जीवन अपनी आनुवांशिक शौर्य की एक गाथा बन गया है।

सरदार पटेल एक कर्मठ और व्यवहारिक कर्मयोगी थे। वे वास्तविक अर्थों में अध्यात्मवादी थे। उनका व्यक्तित्व राजनैतिक सूझबूझ और दूरदर्शिता में बहुत अग्रणी था। एक राष्ट्रवादी में जिस दक्षता, दृढ़ता और व्यवहारिक कर्मठता की आवश्यकता होती है, वह सरदार पटेल में कूट-कूट कर भरी हुई थी। वे मात्र चिंतन-मनन, अध्ययन-अध्यापन एवं अनुसरण-अनुवर्ती न होकर एक जीवन दर्शन थे। जीवन के आचरण पक्ष की वह ऐसी अग्नि थे जिसके ताप से दूसरों को हिम्मत और ताकत मिलती थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में प्रजातंत्र की स्थापना और राष्ट्र निर्माण का काम सर्वोपरि था। भारत को 1947 में स्वाधीनता तो मिली किन्तु क्षत-विक्षत। देश आज़ाद हुआ किन्तु उसकी आज़ादी के इस मानचित्र में अभी भी ऐसी रंग-बिरंगी सीमाऐं, रेखाऐं और लकीरें मौजूद थी जिन्हें पार किये बिना देश में स्वाधीनता को वास्तविक अर्थों में स्थापित कर पाना संभव नहीं था। पराधीनता के पाश से हमें मुक्ति तो मिली किन्तु पाकिस्तान के रूप में मातृभूमि के विभाजन की एक बहुत बड़ी कीमत भी हमें चुकानी पड़ी। स्वतंत्रता की खुशी के साथ-साथ देश ने दुर्भाग्य के इस दुख को भी उठाया। जाते-जाते अंग्रेज जो कर सकते थे उन्होने किया। मातृभूमि के इस दारूण विभाजन के बाद भी वे देश में स्थित 562 रियासतों को यह स्वतंत्रता दे गए कि चाहें तो वे भारतीय संघ में शामिल हों, या पाकिस्तान में और अगर उनकी इच्छा हो तो अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाऐं रखें। स्वाधीनता का यह सुप्रभात, जिसमें पाकिस्तान के रूप में एक नये राष्ट्र का उदय और देशी रियासतों का स्वेच्छा निर्णय का अधिकार अनुवांछित था, राष्ट्रीय स्वतंत्रता के सुकुमार और कोमल पौधे के आरोपण काल में एक भीषण और भयंकर विगृह, विघटन और ग्रह-कलह रूप वायु के ववण्डरों, आंधी और तूफानों को लेकर आया। ऐसा लगता था मानों स्वाधीनता का यह नवजात पौधा प्रसवकाल में ही मुर्झा जायेगा।

उस समय हमारे देश के नेताओं के सामने भारत का यह मानचित्र, जो स्वतंत्रता पूर्व के उनके मनोकल्पित मानचित्र से तो भिन्न था ही, स्वाधीनता के आरंभिक आधार की दृष्टि से भी भयप्रद था। तत्कालीन राष्ट्रवादी नेताओं के सामने भारतीय राज्यों और देशी रियासतों का एकीकरण कर एक अखण्ड राष्ट्र का निर्माण करना एक विकराल समस्या थी। जिसका भार लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपने कांधों पर उठाया।

सरदार पटेल ने अपने विवेक और अदम्य साहस का परिचय देते हुये, साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति को अपनाकर तत्कालीन क्षत-विक्षत और विखण्डित भारत का एकीकरण किया। कश्मीर को छोड़कर सभी देशी रियासतों को सरदार पटेल की तीक्ष्ण बौद्धिक क्षमता के कारण ही भारतीय संघ में शामिल किया जा सका। आज हम जिस भारतीय मानचित्र को देखते हैं, उसका निर्माण सरदार पटेल की ही देन है।

राष्ट्रीय एकता, स्वतंत्रता और स्वराज के सम संतुलित लाभ एवं उसके प्रति अपने दायित्व की दृष्टि से सभी रियासतों का एकीकरण कर आधुनिक अखण्ड भारत के निर्माण के प्रयत्न में सरदार पटेल को जो संघर्ष करना पड़ा, उसे उन्होंने न केवल एक अभिजात योद्धा के जन्मजात गुणों में पार किया वरन् अपनी सूझ-बूझ, चतुराई, कार्य-निष्ठा, निपुणता और कूटनीति के उस गहरे ज्ञान तथा उसे व्यवहारिक स्तर पर उपस्थित कर अपने उद्यमशील उन्नत चरित्रबल के द्वारा ही उस पर विजय प्राप्त की। जूनागढ़ और हैदराबाद की जटिल समस्या को सुलझाने में सरदार पटेल के इस चरित्रबल ने ही काम किया।

इस प्रकार कश्मीर को छोड़कर, जिस पर उन्होंने पण्डित नेहरू की असहमति और अस्वीकृति के कारण हाथ नहीं डाला था, देश में स्थित उस सभी 562 देशी रियासतों को जो ब्रिटिश भारत में अंग्रेजी राज्य की सुदृढ़ चैकियां थी, तोड़कर एक अखण्ड भारत की नीव रख दी।

सरदार पटेल इच्छा और उद्देश्य में दृढ़ एक महान् संगठनकर्ता थे, वे भारत की वास्तविक स्वाधीनता के उद्देश्य में लगन के साथ लगे रहे। राजनैतिक परिवर्तनों के प्रभाव से पूर्णतया परिचित, अनुभवी और सिद्धहस्त राजनीतिज्ञ सरदार पटेल ने स्वाधीनता को उसके स्थायित्व, सुदृढ़ता एवं निर्माणकारी अर्थों में स्वीकार किया। उनके सम-संतुलित दृष्टिकोण और राष्ट्रवादी आकांक्षा ने ही आधुनिक अखण्ड भारत के निर्माण की आधारशिला रखी।

सरदार पटेल को विशाल भारत के राष्ट्रीय ऐकीकरणकर्ता के रूप में आधुनिक भारत का विस्मार्क कहा जाता है। सचमुच ही उनके इस कार्य के कारण उनकी तुलना जर्मनी के विस्मार्क से की जा सकती है। किन्तु कई दृष्टियों में वे विस्मार्क से भी आगे है। जर्मनी में जिस हिंसा और खून-खराबे के बाद विस्मार्क को अपने उद्देश्य में सफलता मिली, उसकी तुलना में सरदार पटेल की सफलता उनकी अहिंसा की एक आध्यात्मिक विजय है। सरदार पटेल के नेतृत्व में भारत के एकीकरण की घटना जैसा दूसरा उदाहरण मिलना संभव नहीं है।

सरदार पटेल क्या थे, कैसे थे और उन्होंने क्या किया, यदि हमें यह देखना है तो सिंहावलोकन की आवश्यकता नहीं है। वह तो उनका अतीत होगा। उनका वास्तविक व्यक्तित्व तो आज का भारत है। भारत की एकता में उसकी अखण्डता में और उसे स्थायित्व देने वाले प्रत्येक प्रयत्न में सरदार पटेल सदैव जीवित है। उनका विशाल और महान् व्यक्तित्व प्रत्येक भारतवासी में एक नवचेतना के रूप में सदा अनुप्रमाणित रहेगा।