‘‘दिव्य ध्येय की ओर तपस्वी, जीवन भर अविचल चलता है।।’’

दिंनाक: 05 Oct 2020 14:48:19
 

   हितानन्द शर्मा    
 
प्रेरणापुंजः श्री रोशनलाल जी सक्सेना
 
तपस्वी जीवनव्रती - एक संकल्प को लेकर अनवरत साधना में रत सन्यासी जीवन जीने वाले ‘‘ज्ञान की रोशनी से समाज को रोशन करने वाले रोशनलाल जी सक्सेना’’। विद्याभारती के लक्ष्य अनुरूप समाज जागरण हेतु शिक्षा के माध्यम से ऐसी पीढ़ी का निर्माण हो सके जो कर्तव्यनिष्ठ, राष्ट्रभक्त, सेवाभावी एवम् संस्कारी हो, सदैव इस दिव्य ध्येय को लेकर अंतिम स्वास तक अविचल चलने वाले तपस्वी प्रचारक।
 
प्रेरक प्रचारक जीवन - वरिष्ठ प्रचारकों का जीवन, मार्गदर्शन, चिंतन, मनन सदैव ही नये प्रचारकों और स्वयंसेवकों के लिए आदर्श और प्रेरणादायी होता ही है और जब ये किसी एक निश्चित लक्ष्य को लेकर चलने वाले मनस्वी से उसी संदर्भ में मिले तो निश्चित ही स्वयं को भाग्यशाली ही माना जाये। रोशनलाल जी प्रचारक जीवन के रूप में तो सम्माननीय रहे ही, किन्तु विद्या भारती में संगठन मंत्री के नाते मेरे को अनेक अवसरों पर उनके जीवन और व्यवहार से सीखने को मिला।
 
आचार्य विद्यालय की धुरी- उनके जीवन परिचय और उनकी जीवटता के साथ साथ उनके स्वाभाव, व्यवहार के बारे में तो सभी जानते ही हैं किन्तु सरस्वती शिशु मंदिर के प्रत्येक आचार्य का ध्यान, उसके सम्मान की चिंता उनके मार्गदर्शन और चर्चा का विषय रहता था। सदैव ही मिलने पर एक ही बात करते थे कि आचार्य विद्यालय की धुरी होता है। वह अल्प मानधन में भी सदैव समर्पण भाव से कार्य करता है। हमें उसके योगक्षेम की चिंता सदैव करनी चाहिए।
 
समय पालन- रोशनलाल जी समय पालन के प्रति बड़े आग्रही थे। एक बार का प्रसंग है कि मई 2017 में बोर्ड परीक्षा परिणाम आने पर प्रदेश की प्रावीण्य सूची में स्थान पाए छात्रों का सम्मान समारोह आयोजित किया गया जिसमें सूचनार्थ रोशन लाल जी को सूचना दी गई। भरी दोपहर में 2 बजे कार्यक्रम था। वे अस्वस्थ होने पर भी एक बजे ही कार्यक्रम में पहुँच गए।
 
परिवार संपर्क- रोशन लाल जी कार्यकर्ताओ के परिवार में सुख-दुःख के प्रसंगों और होली, दिवाली, दशहरा, मकरसंक्रांति आदि अवसरों पर कार्यकर्ताओ के परिवारों और अपने संगठनों के कार्यालयों में जरूर जाते थे। कोई कार्यकर्ता उनसे मिलने आते थे तो उसके घर परिवार के साथ ही उन कार्यकर्ताओ के परिवारों का हाल-चाल पूछते थे तथा उस कार्यकर्ता के भोजन एवं रुकने की चिंता करते थे।
पूर्ण प्रवास- रोशनलाल जी निर्धारित प्रवास पर आने जाने का आरक्षण पर्याप्त समय पूर्व कराकर सम्बंधित को पूर्व में सूचित करते थे, वे कार्यक्रम में एक दिन पूर्व और एक दिन बाद तक का प्रवास निर्धारित करते थे, जिससे कि कार्यक्रम के लिए ही प्रवास न हो कार्य में लगे कार्यकर्ताओ से और उनके परिवार से संपर्क एवं संवाद हो सके।
प्रथम, द्वितीय परिचय में कठोर स्वाभाव किन्तु जैसे-जैसे परिचय बढ़े आत्मीयता बढ़ती जाये। गलत होने पर डॉटना और सिखाना तथा अच्छा होने पर सराहना करना .. उनके व्यक्तित्व की यही विशेषता थी .... गीत की पंक्तियाँ उन पर ही मानो चरितार्थ होती है -
दिव्य ध्येय की ओर तपस्वी जीवन भर अविचल चलता है।
सज धज कर आए आकर्षण पग-पग पर झूमते प्रलोभन
हो कर सब से विमुख बटोही पथ पर संभल-संभल बढ़ता है।
अमर तत्व की अमिट साधना प्राणों में उत्सर्ग कामना
जीवन का शाश्वत व्रत ले कर साधक हँस कण कण गलता है।
सफल विफल और आस निराशा इस की ओर कहाँ जिज्ञासा
बीहड़ता में राह बनाता राही मचल-मचल चलता है।
पतझड़ के झंझावातों मे जग के घातों प्रतिघातों में
सुरभि लुटाता सुमन सिहरता निर्जनता में भी खिलता है।
ऐसे दिव्य तपस्वी के चरणों में सादर वंदन....