मुझ पर मामाजी की वो पचास रुपए की उधारी...

दिंनाक: 06 Oct 2020 17:23:11

 


   गिरीश उपाध्‍याय   

मुझसे कहा गया है कि मैं ‘मामाजी’ के बारे में कुछ लिखूं। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे किसी अक्षर से कहा जाए कि तू महाकाव्‍य के बारे में कुछ लिख। बहुत दिनों से यही सोचते सोचते कि ‘मामाजी’ के बारे में क्‍या लिखूं, मैं इस काम को टालता आ रहा हूं, और आज जब लिखने बैठा हूं तो फिर वही सवाल जैसे इस लेख का शीर्षक बनकर सबसे ऊपर चस्‍पा हो गया है कि मैं ‘मामाजी’ के बारे में क्‍या लिखूं या कि क्‍या-क्‍या लिखूं...

‘मामाजी’ यानी सरकारी दस्‍तावेजों के हिसाब से श्री माणिकचंद्र वाजपेयी, सामाजिक प्रतिष्‍ठा के हिसाब से देश के मूर्धन्‍य पत्रकार... लेकिन ये सब उनकी औपचारिक पहचानें ही हैं। असलियत में वे ‘मामाजी’ ही थे, हैं और रहेंगे... आप जब कहें ‘श्री माणिकचंद्र वाजपेयी’ तो लगता है जैसे किसी बड़े आदमी का परिचय कराया जा रहा है, आप जब कहें ‘देश के मूर्धन्‍य पत्रकार’ तो लगता है मानो किसी लब्‍धप्रतिष्ठित व्‍यक्ति के योगदान का उल्‍लेख किया जा रहा है... लेकिन जब आप कहें ‘मामाजी’ तो लगता है अरे, ये तो कोई अपना ही है...

सच कहूं तो ‘मामाजी’ न तो कभी अपने नाम के अनुरूप माणिकचंद्र वाजपेयी बन पाए और न ही अपनी प्रतिष्‍ठा के अनुरूप मूर्धन्‍य पत्रकार का चोगा पहन पाए। लगता है जैसे वे ‘मामाजी’ बनने के लिए ही पैदा हुए थे और जिंदगी भर ‘मामाजी’ बनकर ही जिए... इसलिए मैं न तो ‘बड़े आदमी’ ‘मामाजी’ के बारे में बात करूंगा और न ही ‘मूर्धन्‍य पत्रकार’ ‘मामाजी’ के बारे में, मैं सिर्फ ‘मामाजी’ के बारे में बात करूंगा...

‘मामाजी’ के साथ मेरी कहानी 1981 के शुरुआती दिनों से शुरू होती है। मैं रतलाम से हिन्‍दी साहित्‍य में एम.ए. करके निकला था और नौकरी की तलाश में भटकता हुआ भोपाल पहुंचा। वहां कई जगह टल्‍ले खाने के बाद मेरी मुलाकात राजेंद्रजी से हुई। राजेंद्रजी याने स्‍वदेश के संपादक राजेंद्र शर्मा जी। वे उन दिनों भोपाल से भी स्‍वदेश का संस्‍करण शुरू करने की योजना बना रहे थे। बातचीत के दौरान उन्‍होंने मुझे आश्‍वासन दिया कि जब भोपाल में काम शुरू हो जाएगा वे मुझे बुला लेंगे, तब तक मैं इंदौर स्‍वदेश में जाकर ‘मामाजी’ के पास कुछ काम सीखूं।

मुझे अभी तक याद है कि राजेंद्रजी ने ‘मामाजी’ संबोधन का ही उपयोग किया था और मैं समझा था कि जिन सज्‍जन की बात हो रही है, वे राजेंद्रजी के कोई रिश्‍तेदार होंगे, जिनके पास मुझे जाकर काम सीखना है। खैर...ऐसे ही कई सवालों की उधेड़बुन में उलझा मैं इंदौर पहुंचा।

इंदौर स्‍वदेश का दफ्तर, यानी एक खांटी परंपरागत अखबार का खांटी परंपरागत माहौल... मैंने जाकर कहा- ‘’मुझे ‘मामाजी’ से मिलना है।‘’ गेट पर मौजूद आदमी ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और डपटने के अंदाज में पूछा- ‘’क्‍या काम है?’’ मैंने कहा- ‘’भोपाल से राजेंद्रजी ने भेजा है...’’ उसने भीतर की तरफ इशारा कर दिया। अंदर दाखिल होते ही देखा तो बड़ा-सा हॉल जिसके सिरों पर टेबलें लगी थीं और चारों तरफ अखबारी कागज की गंध में लिपटे लोग अपने अपने काम में जुटे थे। एक टेबल पर जाकर मैंने फिर वही सवाल दोहराया- ‘’मुझे ‘मामाजी’ से मिलना है।‘’ डेस्‍क पर काम कर रहे उस बंदे ने बगैर किसी पूछताछ और बगैर जबान से एक भी शब्‍द जाया किए, थोड़ा गरदन उचकाकर सामने वाले कोने की तरफ इशारा भर कर दिया...

और जब मैंने उस कोने में लगी एक थोड़ी सी बड़ी और बाकी टेबलों से अलग, उस टेबल के पीछे, लकड़ी की कुर्सी पर बैठे सज्‍जन को देखा तो जैसे आसमान से गिरा... ये हैं ‘मामाजी’??? ये हैं स्‍वदेश के संपादक??? मोटे कपड़े का लंबा सा कुर्ता, उसके नीचे धोती, किसी लोहार जैसा सख्‍त चेहरा और उस पर दोनों होठों को अपनी सीमा में समेटते हुए और भी नीचे आने को मचलती घनी मूछें... सिर पर घने लेकिन अस्‍तव्‍यस्‍त बाल।

सच पूछें तो मुझे वो व्‍यक्ति कहीं से भी संपादक की उस छवि में फिट नजर नहीं आया जो मेरे मानस में उन्‍हें देखने से पूर्व बनी हुई थी। मैंने मन ही मन सोचा, कहां फंस गया... अब इनसे क्‍या तो मैं सीखूंगा और क्‍या ये सिखा पाएंगे? उनके नजदीक जाकर बात करने से पहले ही मैंने सोच लिया था कि यहां नहीं टिकना है, राजेंद्रजी से कोई बहाना बना दूंगा और दूसरी नौकरी तलाश लूंगा...

लेकिन सच मानिए, जैसे ही मैं उनके नजदीक पहुंचा, लगा कि मैंने किसी सकारात्‍मक ऊर्जा के घेरे में प्रवेश किया हो। कोने वाली डेस्‍क से लेकर ‘मामाजी’ की डेस्‍क तक पहुंचने का चंद कदमों का फासला पूरा होते होते मेरे वो सारे विचार मानो एक एक कर ढहने लगे जिन्‍हें मैं चंद लमहे पहले अपने संकल्‍प की तरह छाती से चिपटाए हुआ था, कि नहीं जी, मुझे तो यहां टिकना ही नहीं है...

अब मजा देखिए, ‘मामाजी’ अखबारी कागजों की कतरनों को एकजाई कर बनाए गए पैड के पन्‍नों पर सिर झुकाए कुछ लिख रहे थे। मैं थोड़ी देर ठिठका खड़ा रहा, जब उनकी एकाग्रता नहीं टूटी तो मैंने एक तरह से उनकी तल्‍लीनता में बाधा डालते हुए कहा- ‘मामाजी’ मुझे राजेंद्रजी ने भेजा है... इतना सुनते ही गरदन उठी और छोटी लेकिन आरपार देख सकने वाली आंखें मेरे चेहरे पर आकर टिक गईं। ‘’तुमने कहीं काम नहीं किया है ना...’’ बगैर किसी परिचय की औपचारिकता या लागलपेट के सीधे सपाट पूछा गया यह प्रश्‍न ही मेरा ‘मामाजी’ से पहला संवाद था और शायद मेरे भविष्‍य की नींव का पहला पत्‍थर भी इसी वाक्‍य के साथ रख दिया गया था...

कहानी वैसे तो इतनी लंबी है कि यदि अपनी स्‍मृति में बसे उस एक एक क्षण को शब्‍दबद्ध करूं तो शायद एक पूरी किताब ही छोटी पड़ जाए। इसलिए बहुत सी बातों को यादों की पोटली में ही बंद रखते हुए बात को थोड़ा फास्‍ट फारवर्ड करता हूं। ‘मामाजी’ ने जो पहला काम मुझे सौंपा, वह था अखबार के दफ्तर के एक कोने में लगे समाचार एजेंसी के टेलीप्रिंटर से निकलने वाले कागज को फाड़ना... जी हां, मैंने नियमित पत्रकारिता में पहला काम कागज फाड़ने का किया...

अब मुझे क्‍या पता था कि ‘मामाजी’ जो काम मुझे सौंप रहे हैं, शायद अपनी दिव्‍यदृष्टि से उन्‍होंने उसी से जुडे काम में, मेरी पत्रकारिता का भविष्‍य काफी पहले देख लिया था। ऐसा मैंने इसलिए कहा क्‍योंकि आगे चलकर स्‍वदेश की नौकरी छोड़ने के बाद मैंने उसी टेलीप्रिंटर वाली समाचार एजेंसी यूएनआई में पूरे 19 साल नौकरी की। खैर.. तो मेरा काम न्‍यूज एजेंसी के टेलीप्रिंटर के रोल को फाड़ना और उसमें आने वाले समाचारों को तरतीबवार जमाना था। यानी पत्रकारिता का पहला सबक ही ‘मामाजी’ ने मुझे यह सिखाया कि यह पेशा समाज और दुनिया की बेतरतीबी को तरतीब से देखने और समझने का है।

स्‍वदेश इंदौर में ‘मामाजी’ के सान्निध्‍य में मैं बहुत कम ही दिन रहा। शायद डेढ़ दो महीने या उससे भी कम... लेकिन इन दिनों में, बगैर कुछ कहे या हाथ पकड़कर सिखाने के बजाय उन्‍होंने इशारों इशारों में और अलग-अलग काम सौंपकर, मुझे वे सारी बुनियादी बातें सिखा दीं जो किसी भी पत्रकार के लिए अक्षर ज्ञान की तरह अनिवार्य होती हैं।

और मैं... वो गिरीश उपाध्‍याय, जो पहली मुलाकात में यह संकल्‍प लेकर ‘मामाजी’ की ओर बढ़ा था कि मुझे यहां काम तो कतई नहीं करना है, वही मैं, मन ही मन उनका मुरीद होता चला गया। उनमें सबसे बड़ी बात जो मैंने देखी वो यह थी कि वे किसी को सिखाने के बजाय खुद करके उसके सामने उदाहरण प्रस्‍तुत कर देते थे। वे ऐसे ‘इंसान संपादक’ थे जिनके आचरण से ही आप काफी कुछ सीख सकते थे। वे ऐसी सुगंध थे जो इंद्रियों में नहीं मन में व्‍याप्‍त होती है।

मैंने ऊपर ‘मामाजी’ के लिए ‘इंसान संपादक’ शब्‍द का इस्‍तेमाल किया है। यह शब्‍द मैंने जानबूझकर इसलिए कहा क्‍योंकि आज अखबारों में संपादक तो मिल जाएगा, लेकिन वह इंसान है या नहीं इसका जवाब आपको लाख ढूंढने पर भी शायद न मिले। मानवीयता और अपने आसपास के लोगों से संवेदना का रिश्‍ता रखने वाली वह पीढ़ी शायद अब कभी पत्रकारिता की दुनिया में नहीं आएगी। यह समय ‘इंसान संपादकों’ का नहीं ‘भेडि़ए संपादकों’ का है जो अपने सहकर्मियों के मांस की एक-एक बोटी नोच लेना चाहते हैं।

स्‍वदेश इंदौर में मैं जितने भी दिन रहा उतने दिन मानो किसी अखबार के दफ्तर में नहीं बल्कि अपने किसी परिजन की वात्‍सल्‍यपूर्ण छत्रछाया में रहा। और जब कुछ दिनों बाद उन्‍हें यह पता चला कि मैं मालवा क्षेत्र के वरिष्‍ठ साहित्‍यकार और हिन्‍दी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘वीणा’ के संपादक स्‍व. मोहनलाल उपाध्‍याय ‘निर्मोही’ का पुत्र हूं, तो उनका स्‍नेह पता नहीं कितने गुना बढ़ गया। लेकिन हां, काम और काम के अनुशासन में इस परिचय अथवा भावनाओं को कभी दखल देने का अवसर नहीं मिल पाया।

और आखिर वह दिन भी आ गया जब भोपाल से मेरे पास राजेंद्रजी का संदेश आया कि भोपाल संस्‍करण जल्‍दी ही शुरू हो रहा है तुम भोपाल आ जाओ। मैं फिर उसी पहले दिन वाले गिरीश उपाध्‍याय की तरह उनकी टेबल के सामने खड़ा था। लेकिन इस बार मन में भाव पौधे के मिट्टी से अलग हो जाने जैसे थे... मैंने कहा ‘मामाजी’ मुझे भोपाल बुलाया है...  टेबल के दूसरी ओर से फिर बिना लागलपेट के जवाब आया- ‘’तो जाओ, मन लगाकर काम करना...’’

बस...!! ‘मामाजी’ को सिर्फ इतना ही कहना है मुझसे? क्‍या और कोई बात नहीं... कोई सीख नहीं... भविष्‍य के लिए कोई पाठ नहीं... मेरी कमियों, खूबियों का जरा भी जिक्र नहीं... क्‍या ‘मामाजी’ इतने निस्‍पृह... इतने निर्मम..???  उनका वाक्‍य पूरा हो जाने के बाद मैं अगले वाक्‍यों के इंतजार में खड़ा रहा, लेकिन वे अपने काम में व्‍यस्‍त थे... अपनी ओर से बात पूरी हो जाने के बाद भी मेरे वहां खड़े रहने पर एक तरह से खीजते हुए उन्‍होंने कहा- ‘’अब जाओ भाई, भोपाल जाने की तैयारी करो...’’

मैं, बस चुपचाप सूनी और डबडबाने को मचलती आंखों से उनकी ओर देखता हुआ खड़ा था... वे बोले- ‘’और कोई बात है क्‍या?’’ मन में आया कि कह दूं, ‘मामाजी’ बातें तो इतनी हैं कि सुनाने लगूंगा तो शायद भोपाल जा ही नहीं पाऊंगा... लेकिन इतना ही बोल पाया- ‘’नहीं कुछ नहीं...’’ वे बोले- ‘’तो जाओ, तैयारी करो...’’

अचानक मेरे मुंह से निकला, ‘’लेकिन जाऊंगा कैसे ‘मामाजी’?’’ ‘क्‍या मतलब’ उन्‍होंने सवालिया निगाहों से मेरी तरफ देखते हुए पूछा। मैंने कहा- ‘’मेरे पास तो जाने का किराया भी नहीं है, कैसे जाऊंगा, कहां रहूंगा, क्‍या खाऊंगा...’’ मैं एक सांस में सारी बातें कह गया...

‘मामाजी’ चौंके और फिर जैसे खुद पर ही खीज खाते हुए मुसकुराकर मेरी ओर देखा, मानो कह रहे हों, मैं भी कैसा नादान हूं, बच्‍चे को कह तो दिया जाओ, लेकिन वो जाएगा कैसे, वहां उसका क्‍या होगा... शायद ऐसा ही कुछ सोचते-सोचते उन्‍होंने कमीज के अंदर पहनी बंडी (देसी बनियान) की जेब में हाथ डाला और मेरे हाथ में 50 रुपए का एक मैला सा नोट पकड़ाते हुए कहा ‘’लो ये रख लो। इसमें तुम्‍हारा किराया भी हो जाएगा और भोपाल में दो तीन दिन का खाना भी... बाकी इंतजाम राजेंद्रजी देख लेंगे...’’

और इधर मैं, जो घट रहा था और जो घटने वाला था, उन हालात का अनुमान लगाता हुआ, एक कठपुतली की तरह उनकी हर बात पर ‘जी ‘मामाजी’... जी ‘मामाजी’...’ के अलावा कुछ भी नहीं बोल पा रहा था। मैंने पचास का वो नोट लिया, ‘मामाजी’ के पैर छुए, दफ्तर के सभी सदस्‍यों का अभिवादन किया और पत्रकारिता के बीहड़ में जाने के लिए उस उपवन से बाहर निकल आया... 

भोपाल आने के बाद मैं पत्रकार हो गया और जिंदगी पत्रकारिता... धीरे-धीरे चीजें आकार लेने लगीं। स्‍वदेश छोड़कर मैं यूएनआई में आ गया तो ‘मामाजी’ को खबर की, बहुत खुश हुए। कुछ साल बाद, एक दिन अचानक ‘मामाजी’ का फोन आया- ‘’कहां रहते हो?  भोपाल आया हूं, बहू से भी मिलना है...’’ मैं दफ्तर में था, उधर ‘मामाजी’ को घर का पता समझाया और इधर मैं घर भागा, सोचा पत्‍नी को बता तो दूं कि एक बहुत ही खास मेहमान आने वाले हैं...

‘मामाजी’ घर आए, खाना खाया, मैं बस उन्‍हें अपने घर खाना खाते देखता रहा... बहुत सारी पुरानी बातें, यादें ताजा हुईं। उसके बाद ‘मामाजी’ यदाकदा घर आते रहे। बच्‍चों को उनकी मूछों से खेलना अच्‍छा लगता। ‘मामाजी’ ने मूछें रखीं जरूर लेकिन उन पर ताव उन्‍होंने शायद ही कभी दिया हो... बच्‍चे उनकी मूंछ मरोड़ते और वे ठहाका लगाकर हंस देते...। उन्‍हें पता लगा कि मेरी पत्‍नी पूरनपोली बहुत अच्‍छी बनाती है, बस फिर क्‍या था भोपाल आने के बाद उनकी यह फरमाइश जरूर आती- पूरनपोली खाने आ रहा हूं...

मैं ‘मामाजी’ को छेड़ता, पूरनपोली खाने का तो बहाना है ‘मामाजी’, असल में तो आप मुझसे वो पचास रुपए लेने आते हो... ‘मामाजी’ ठहाका लगाते और मैं साफ कह देता, ‘’वो पचास रुपए तो मुझ पर उधार रहे ‘मामाजी’, इस जनम में तो आपको मिलने वाले नहीं... मैं तो जिंदगी भर आपके पचास रुपए का कर्जदार बनकर ही रहना चाहूंगा...।‘’

आज भी वो पचास रुपए मेरी जेब में नहीं, बल्कि मेरे दिल में बहुत हिफाजत से रखे हुए हैं। सोचता हूं अब यह हिसाब-किताब ‘मामाजी’ से ऊपर जाकर ही पूरा करूंगा...

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं)