सतपुड़ा के कोरकू गौरव - क्रांतिकारी राजा भभूत सिंह

दिंनाक: 14 Nov 2020 13:45:59

 


 

सुप्रसिद्ध देवगढ़ राज्य के गोण्ड राजवंश द्वारा राजकीय सनद से भोपा गोत्र के महादेव भक्त कोरकुओं को पचमढ़ी जागीर का अधिकार दिया गया था जो वर्तमान होशंगाबाद तथा छिन्दवाड़ा जिलों के बड़े हिस्सों में फैली हुई थी।

पचमढ़ी बड़ा महादेव के पारंपरिक सेवक व संरक्षक परिवार में देनवा नदी के तट पर संयुक्त पचमढ़ी जागीर के स्वामी कोरकू ठाकुर अजीत सिंह जी के वंश में हर्राकोट राईखेड़ी शाखा के जागीरदार परिवार में राजा भभूत सिंह ने जन्म लिया था।

पचमढ़ी की महादेव चौरागढ़ पहाड़ियों में राजा भभूत सिंह जी के पितामह ठाकुर मोहन सिंह ने 1819-20 में अंग्रेजों के विरूद्ध नागपुर के विप्लवी राजा अप्पा साहेब भोंसले का तन मन धन से सहयोग किया था । अपने दादाजी के पदचिन्हों पर चलते हुए युवा राजा भभूत सिंह ने 1857 की क्रांति के नेता तात्याटोपे के आव्हान पर 1858 में भारत के प्रथम सशस्त्र स्वातंत्र्य समर में कूदने का निर्णय लिया।

अक्टूबर 1858 के अंतिम सप्ताह में नर्मदा मैया की कृपा से तात्याटोपे ने ऋषि शांडिल्य की तपोभूमि साँडिया के समीप उफनती हुई नर्मदा नदी पार की और अंग्रेज टापते ही रह गए। महुआखेड़ा फतेहपुर के राजगौण्ड राजा ठाकुर किशोर सिंह ने अंग्रेजों की चिन्ता न कर तात्या टोपे का पुरजोर स्वागत सत्कार किया व क्षेत्र में तात्या टोपे की फौज आठ दिनों तक पड़ाव डाल आगे की तैयारी करती रही।

तात्या टोपे का लश्कर यहाँ से आगे दक्षिण की ओर मुल्ताई चला गया था पर क्षेत्र के जनजातीय वीरों में क्रांति की ज्वाला भड़का कर गया था और हर्राकोट राईखेड़ा के जागीरदार राजा भभूत सिंह का युवा रक्त आततायी अंग्रेजी शासन के विरुध्द उबल पड़ा और हर हर महादेव के घोष के साथ क्रांति का बिगुल बजा दिया।

राज भभूत सिंह अपने बड़े बूढ़ों के मुख से अंग्रेजों के विरूद्ध नागपुर राजा अप्पासाहेब भोंसले के सशस्त्र संग्राम में स्थानीय जनजातीय सूरमाओं पचमढ़ी के जागीरदार ठाकुर मोहन सिंह एवं हर्रई के जागीरदार चैनशा जी के सहयोग की कहानियां सुनते हुए बड़े हुए थे।

फिरंगियों द्वारा 1821 में अन्यायपूर्ण भू सैटलमेंट से कृषकों व जनजातीय समाज में भारी रोष था। 1857 की क्रांति में स्थानीय नायकों से पैशाचिक दुर्व्यवहार का नंगा नाच अंग्रेज खेल रहे थे और बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के पकड़ कर दिनदहाड़े सार्वजनिक स्थानों पर पेड़ों पर फाँसी दे रहे थे और स्थानीय समाज को भयाक्रांत करने शव कई कई दिनों तक लटकते छोड़ दिये जाते थे।

राजा भभूत सिंह पीड़ा से देख रहे थे कि तात्या टोपे का सहयोग करने के आरोप में पचमढ़ी के प्रतिष्ठित कोरकू ठाकुर महेन्द्रसिंह जी को तथा शोभापुर के दरबार राजा महिपाल सिंह जी को तथा फतेहपुर के दरबार राजा किशोर सिंह जी को किस प्रकार दबाव बना दुर्व्यवहार से अंग्रेज अपमानित कर रहे हैं। जनवरी 1859 में जयपुर में हुई तात्याटोपे की फाँसी के समाचार ने जैसे धीरज का बाँध ही तोड़ दिया।

मुगलों व अंग्रेजों की जिस मालिकाना अपसंस्कृति के कुसंस्कार व भोगवादी मानसिकता से अफसरशाही आज भी ग्रस्त है उस का सामना भभूत सिंह की शोषित प्रजा को करना पड़ रहा था। सरलता की प्रतिमूर्ति कोरकू व गोण्ड गाँवो से अंग्रेज दरोगा व कर्मी जब तब देशी मुर्गों की मुफ्त में माँग व पकड़ धकड़ कर रहे थे।

बात बिगड़ती गई और खुले विद्रोह का निर्णय ले कोरकू राजा भभूत सिंह ने अपने गोण्ड साथी सेनापति होली भोई के साथ मिल कर तहसील सोहागपुर पर सशस्त्र आक्रमण कर दिया ।

अद्भुत संगठन कौशल का परिचय देते हुए राजा भभूत सिंह ने अम्बापानी के नवाब तथा फतेहपुर एवं शोभापुर के जनजातीय राजपरिवारों से भी सहयोग प्राप्त किया।

राजा भभूत सिंह ने अपने मित्र होली भोई के साथ मिल कर छः माह जुलाई 1859 से जनवरी 1860 तक छापेमार युद्ध कला से अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। सतपुड़ा की महादेव पहाड़ियों के आँचल में मटकुली, पचमढ़ी ,बागड़ा ,बोरी के घने जंगलों में घाटियों, गुफाओं व खोहों के सहारे सतत संघर्ष चलता रहा।

दातार में फैला शिक्षा का उजाला

कोरकू गौरव ठाकुर राजा भभूत सिंह स्वाभिमान की खातिर वीरतापूर्वक अपने समाज को मुर्गों, बकरों, अनाज व शराब की छीना झपटी के अन्याय से बचाने को कटिबद्ध हो लड़ते रहे। राजा भभूत सिंह ने विपरीत परिस्थितियों में मुफ्तखोरी व बेगारी मुक्त समाज की रचना के लिए दुर्गम वनों में सामान्य समाज को नेतृत्व प्रदान कर संगठन खड़ा करने का अद्भुत कारनामा कर दिखाया था।

अंग्रेजों ने कर्नल मैक्नील डंकन के नेतृत्व में मद्रास इन्फैन्ट्री के साथ राजा भभूत सिंह के विरुद्ध अभियान छेड़ रखा था। राजा भभूत सिंह फिरंगियों के लिए महादेव की पहाड़ियों व देनवा की घाटियों के रहस्यमयी आतंक सिद्ध हुए थे। उन के चमत्कारी युद्ध कौशल ने उन्हें क्षेत्र के जनजातीय समाज की परंपरा ने दैवीय शक्तियों से युक्त श्रद्धा पुरुष मान्य किया है।

अगस्त 1859 में अंग्रेजी सेना से देनवा की सँकरी घाटी में हुए भीषण युद्ध में राजा भभूत सिंह अपने साथियों संग सकुशल सुरक्षित निकल गए और अंग्रेजी सेना को पीछे हटना पड़ा। स्थानीय कहावतों में सुप्रसिद्ध है कि अभिमंत्रित जड़ी बूटियों से युक्त राजा भभूत सिंह का बन्दूक की गोली कुछ भी न बिगाड़ पाती थी और राजा भभूत सिंह अंग्रेजों को चकमा दे पलक झपकते हर्राकोट से गुप्त मार्गों से पुरानी पचमढ़ी पहुँच जाते थे।

सतपुड़ा टाईगर रिजर्व में राजा भभूत सिंह के किले के खण्डहर आज भी अपने पराक्रमी नायक की मूक गवाही देते खड़े हैं। हर्राकोट से पचमढ़ी तक के जंगलों में मोर्चाबंदी अंग्रेजों के लिए अभेद्य सिद्ध हुई थी। पगारा के समीप साँकलढोह और फाँसीखड्ड जहाँ अपराधी को मृत्यु दण्ड दिया जाता था, राजा भभूत सिंह के न्याय प्रिय राज के साक्ष्य हैं। पचमढ़ी में माढ़ादेव की गुफा ने राजा भभूत सिंह का धन सुरक्षित रखा था और हर्राकोट में गुप्त शस्त्रागार था।

अंग्रेजों ने राजा भभूत सिंह के विरुद्ध सीधे मार्ग से असफल होते देख अपनी असली पैंतरेबाजी करते हुए कुटिलता, लालच व डर दबाव के हथकण्डे सहयोगी जनजातीय जागीरदारों पर चलाए और विमुखता व तटस्थता के कारण विद्रोही राजा भभूत सिंह की स्थिति संसाधन विहीनता की होती चली गई। कर्नल मेक्नील डंकन ने नवंबर 1859 में हर्राकोट को अंग्रेजी कब्जे में ले लिया।

जनवरी 1860 में भारतीय इतिहास की परंपरागत दुर्बलता दोहराते हुए राजा भभूत सिंह के ही एक पूर्व सहयोगी ने भेदिया बन अंग्रेजों को ठिकाने की सूचना दे दी जिस के आधार पर राजा भभूत सिंह अपने सहयोगी मित्र होली भोई के साथ अंग्रेजों की पकड़ में आ गए।

राजा भभूत सिंह व होली भोई को जबलपुर जेल भेज दिया गया। क्रांति के सहयोगियों को अंग्रेजों ने तरह तरह से दण्डित किया। राजा भभूत सिंह की जागीर जब्त कर ली गई । अंग्रेजों ने जागीर के सब से महत्वपूर्ण भाग बोरी परिक्षेत्र के घने जंगलों को जब्त कर भारत के प्रथम सरकारी रिज़र्व संरक्षित वन अधिसूचित कर दिया। हर्राकोट राईखेड़ा क्षेत्र को राजसात कर लिया गया।

स्वतंत्रता प्रिय स्वाभिमानी जनजातीय कोरकू गौरव राजा भभूत सिंह को उनके गोण्ड सेनापति होली भोई संग जबलपुर में अंग्रेजों ने मृत्यु दण्ड निर्धारित किया। 1861 में क्रांति का यह वनवासी पथिक स्वदेश हित सगर्व फाँसी के फंदे पर झूल अमर हो गया।

कोरकू गौरव वीर राजा भभूत सिंह सतपुड़ा की ऊँचाइयों पर पचमढ़ी महादेव के दुर्गम जंगलों में भारत के प्रथम स्वातंत्र्य समर 1857 क्रांति का ध्वज थामने वाले अंतिम साधकों में से एक सिद्ध हुआ ।

अमर राष्ट्र नायक हुतात्मा वीर राजा भभूत सिंह जी समाज की चिर स्मृति में सदैव अमिट अंकित रहेंगे।