तत्कालीन युग के एकलव्य और स्वामी विवेकानंद थे बिरसा मुंडा

दिंनाक: 15 Nov 2020 16:16:28

 


 

   - रजनीश कुमार   

भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम वीरों के बलिदान की अमिट कहानी है। मां भारती के प्रति समर्पण और त्याग की प्रबल भावना लिए ऐसे कई नायक पैदा हुए जो किसी दिए की भांति प्रकाश प्रज्वलित करके स्वयं अंधेरे की आगोश में चले गए। ऐसे ही वीर थे बिरसा मुंडा, जो वनवासी समाज के लिए प्रकाशपुंज है।

भारतीय इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे नायक थे जिन्होंने अपने क्रांतिकारी चिंतन से उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में वनवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर उन्हें सांस्कृतिक तौर पर एकजुट किया तथा सामाजिक, राजनीतिक चेतना जागृत करके नए युग का सूत्रपात किया।

तत्कालीन बिहार के छोटा नागपुर स्थित उलिहातू गांव में 15 नवंबर 1875 को एक बड़े जननायक बिरसा मुंडा का जन्म हुआ। बचपन से ही कुशाग्र बुध्दि के धनी बिरसा नें सामाजिक कुरीतियों और ईसाई षड्यंत्रों को अपने तर्कों से निपटाया तथा जमकर प्रतिकार किया।

वो बिरसा मुंडा ही थे जिन्होने अदम्य साहस की स्याही से पुरुषार्थ के पृष्ठों पर शौर्य की ऐसी शब्दावली रची जिसने अंग्रेजी सम्राज्य की जड़ें हिलाकर रख दिया।

दरअसल, बिरसा जब बड़े हुए तो उन्होंने यह देखा कि ब्रिटिश और मशीनरी सामूहिक रूप से वनवासियों पर अत्याचार कर रहे है। एक तरफ उनके जंगल काटे जा रहे थे, दूसरी तरफ उनका शोषण किया जा रहा था। एक तो जंगलों को उजाड़कर, उससे अंग्रेज़ अधिकारियों के लिए सिगरेट बनाई जा रही है, दूसरे उनको वापस जंगल और जमीन दिलाने के बदले ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार कराया जा रहा था।

बिरसा मुंडा ने यह अनुभव किया कि वनवासी समाज आचरण के धरातल पर तिनके जैसा उड़ रहा है और आस्था के मामले में भटका हुआ है। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि सामाजिक कुरीतियों के कोहरे ने आदिवासी समाज को सनातन धर्म के प्रकाश से वंचित कर दिया है। इस अंधकार के कारण ही वनवासी समाज मशीनरियों के प्रलोभन में आ जाते है तथा धर्मांतरण कर रहे है।

ऐसी परिस्थितियों में बिरसा मुंडा के जीवन में एक ऐसा क्षण आया जिसने उनके जीवन की दिशा बदलकर रख दिया । वैष्णव भक्त सनातन धर्मी आनंद पांडे के सानिध्य में बिरसा ने हिंदुत्व के मूल तत्व की शिक्षा दीक्षा प्राप्त किया। उन्होंने ना सिर्फ स्वयं ही वापस हिंदु धर्म अपनाया बल्कि कई वनवासियों को सनातन धर्म में वापसी कराई। बिरसा ने रामायण, महाभारत, भागवत गीता समेत तमाम धार्मिक ग्रंथों का विस्तृत अध्ययन किया। इसके बाद अंग्रेजी शोषण के खिलाफ बिरसा नें गांव गांव जाकर लोगों को संगठित करना शुरू कर दिया था। इसके साथ ही उन्होंने समाज में व्याप्त बुराइयों, नशाखोरी और मांस मदिरा आदि के सेवन खत्म आह्वान किया।

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वैसे, अंग्रेजों के स्वार्थ को बिरसा मुंडा तो बहुत पहले ही समझ चुके थे, लेकिन अब उन्होंने वनवासी समाज को जागरूक करने का प्रयास शुरू किया बिरसा ने वनवासी समाज में सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक चेतना जागृत किया। उन्होंने सबसे पहले तो वनवासियों को ईसाई मशीनरी के चंगुल से आजादी दिलाई फिर उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। उन्होंने शिक्षा, स्वच्छता एवं हिंदु धर्म के प्रति सामाजिक समरसता को प्राथमिकता दी थी।


शक्ति और साहस के प्रतीक बिरसा मुंडा

1897 से 1900 के बीच मुंडा समाज और अंग्रेज सिपाहियों के बीच लगातार युद्ध होते रहे और बिरसा और उनके शुभचिंतकों ने अंग्रेजों को परेशान कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा मुंडा और उनके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमान के साथ खूंटी थाने पर धावा बोला तथा अंग्रेज़ों को नाके चने चबवा दिए।


1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से वनवासी नेताओं को गिरफ्तार किया गया।

बिरसा मुंडा सही मायने में पराक्रम और सामाजिक जागरण के धरातल पर तत्कालीन युग के एकलव्य और स्वामी विवेकानंद थे। अंग्रेजी सत्ता सत्य के इस संकेत से परिचित थे इसलिए उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। अंग्रेजों ने उन्हें जेल में धीमा जहर दिया जिसके कारण 9 जून 1990 को वे बलिदान हुए।

भारतीय इतिहास के पन्नों में बिरसा मुंडा का जीवन एक ऐसे अद्वितीय नायक एवं महान देशभक्त के रूप में प्रतिष्ठित है जो तमाम दुख और यातनाएं सहने के बाद भी मां भारती के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर गए। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि !