ऐसी स्त्री थीं रानी लक्ष्मीबाई

दिंनाक: 19 Nov 2020 13:39:34

 

 


 

महाराष्ट्र से पैदल चलकर वाराणसी जाने वाले जा रहे विष्णु भट्ट गोडसे शास्त्री गदर के कारण ग्वालियर-झांसी में फंस गए। उन्होंने उस समय चल रहे विप्लव को अपनी आंखों से देखा। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व और काम करने की शैली के वे साक्षात गवाह थे। उन्होंने ये अनुभव कलमबंद किए जिन्हें हिंदी में ‘आंखों देखा गदर’ शीर्षक से अमृतलाल नागर ने अनूदित किया है।  रानी लक्ष्मीबाई के युद्ध-पूर्व के चेहरे को जानने के लिए प्रस्तुत हैं कुछ अंश-

 

अनेक गुणों से संपन्न, स्त्री रत्न में उदारता और शौर्य यह दोनों निरुपम थे।

 

बाई साहब (रानी लक्ष्मीबाई) का नित्यक्रम इस प्रकार से था-कसरत आदि का शौक उन्हें बचपन से था ही, स्वतंत्रता मिलने पर उन्होंने फिर से आरंभ किया। तड़के ही उठकर व्यायाम शाला में जोर करना, जोड़ी फिराना वगैरह। फिर घोड़े पर सवार होकर घूमने के लिए जाना, घेरे में चक्कर लगाना, दीवार फांदना, खाई पार करना, घोड़े के पेट से चिपककर बैठना इत्यादि तरह-तरह की कसरत करना। कभी हाथी पर सवार होकर भी निकलती थीं। इस तरह सात-आठ बजे तक मेहनत करने के बाद जलपान करती थीं। फिर कभी तो घंटे भर के लिए सो जाती थीं या वैसे ही स्नान करने चली जाती थीं। बाई साहब को नहाने का बड़ा शौक था। रोज गर्म पानी के 15-20 हंडे लगते। आठ- दस उत्तम सुवासिक द्रव्यों से इतनी देर तक स्नान किया करती थीं कि जो जल नल के द्वारा बाहर कुंड में जाता था, उससे बहुत सी स्त्रियों का स्नान हो जाता था। स्नान के बाद स्वच्छ सफेद चंदेरी साड़ी पहनकर भस्म धारण करके आसन पर बैठती थीं। पति के मरने के बाद भी उन्होंने सिर के बाल नहीं कटाए थे। इसके लिए तीन प्रायश्चित होते हैं, पहले उनका उदक (जल) छोड़कर चांदी के तुलसी-वृंदावन में तुलसी की पूजा करती थीं,  फिर पार्थिव लिंग की पूजा आरंभ होती थी। उस समय सरकारी गवैया गाते थे, पौराणिक लोग पुराण पाठ करते थे और सरदारों तथा आश्रित लोगों के मुजरे होते थे। बाई साहब चारों ओर का ध्यान रखती थीं। यदि किसी दिन डेढ़ सौ मुजरों में से कोई एक नहीं हुआ तो दूसरे ही दिन पूछती थीं कि कल आप क्यों नहीं आए थे?

 

 

इस तरह 12:00 बजे तक देवार्चन हो जाने के बाद भोजन होता था। फिर कुछ देर इधर-उधर बिताकर या कभी थोड़ी देर तक सो चुकने के बाद नजराने में आई हुई वस्तुएं चांदी के थालों में रेशमी वस्त्रों से ढककर उनके सामने रखी जाती थीं। उनमें से जिस चीज पर उनका मन आ जाता था, उसे अपने पास रखकर बाकी चीजें आश्रित मंडली में बांटने के लिए कोठीवाल को दे दी जाती थीं। 3:00 बजे के लगभग कचहरी करती थीं। उस समय कभी-कभी पुरुष वेश धारण करती थीं। पायजामा, बंडी, सिर पर टोपी रखकर तुर्रा बांधती थीं। कमर पर जरी का दुपट्टा कसा हुआ। उसमें तलवार लटकती रहती थी। इस प्रकार गौरवर्ण की वह ऊंचे कद की मूर्ति साक्षात गौरी के समान लगती थी। कभी जनाना वेश होता था, परंतु पति के मरने के बाद उन्होंने नथ वगैरा अलंकार कभी धारण नहीं किए। केवल हाथों में सोने की चूड़ियां और गोट, गले में मोतियों की माला और उंगली में एक हीरे की अंगूठी के सिवा।बाई साहब के अंगों पर दूसरा अलंकार मैंने कभी नहीं देखा। बालों का बड़ा सा जूड़ा कसा रहता था। स्वच्छ सफेद चोटी और उस पर सफेद शालू ओढ़ती थीं। इस तरह कभी पुरुष वेश में तो कभी स्त्री वेश में दरबार में जाती थीं। एक कोठरी की तरह की आड़ की जगह थी। उसके दरवाजे के बाहर सुनहरी मेहराब थी। उसके अंदर गद्दी लगी थी। बाई साहब उस पर तकिए के सहारे टिक कर बैठती थीं। सामने राजेश्री लक्ष्मण राव दीवानजी हाथ बांधे कागज लेकर खड़े रहते थे और दोनों तरफ श्री हुजूर के साथ आठ कारकुन बैठे रहते थे।लक्ष्मणराव देशस्थ ब्राह्मण था। वह एकदम अक्षर शत्रु ही था। लिखना-बांचना उसे जरा भी नहीं आता था परंतु खोपड़ी बड़ी दूर तक चलती थी। कचहरी में दीवानी, फौजदारी, मुल्की सब काम होते थे। बाई साहब की बुद्धि बड़ी चपल थी इसलिए तुरत-फुरत हकीकत समझकर बराबर हुक्म देती चलती थीं। स्वयं पढ़ने लिखने में होशियार थीं इसलिए कभी-कभी आप ही कागजों पर हुक्म लिखने लगती थीं। न्याय के कामों में बाई साहब बड़ी दक्ष और कठोर थीं और कभी-कभी तो खुद हाथों में छड़ी लेकर अपराधियों को सजा दिया करती थीं। हर शुक्रवार और मंगलवार को वह अपने दत्तक पुत्र को साथ लेकर संध्या के समय नियमपूर्वक महालक्ष्मी के दर्शन करने जाती थीं।

 

लक्ष्मीबाई की सवारी का ठाठ फिर कभी देखने को नहीं मिलेगा। बाई साहब कभी तो मियाने पर, तो कभी घोड़े पर सवार होकर दर्शनों के लिए जाती थी। किनखाब में जरी के काम के बने हुए पर्दे दोनों तरफ पड़े रहते थे जिससे मियाने की शोभा चौगुनी हो जाती थी। हुजूर स्त्री वेश में जाती थीं, उस समय सफेद साड़ी पर मोतियों के आभूषण खूब फबते थे। कभी पुरुष देश में होतीं तो पायजामा, बंडी और कलंगी तुर्रा, सजी हुई जरी की कमरबंद‌। उस वेश की शोभा का क्या वर्णन किया जाए। जब मियाने पर चलती थीं तो उसके साथ ही साथ द़ो-चार सुंदर दासियां दौड़ती हुई चलती थीं। बचपन से ही इन दासियों को यही काम सिखाया जाता था। दक्षिण से अच्छे-अच्छे घरों की लड़कियां खरीद कर लाई जाती थीं और उन्हें उत्तम से उत्तम भोजन खिलाकर 15 16 वर्ष की आयु में पालकी के साथ दौड़ने का काम दिया जाता था।‌

 

इस तरह नरसिंहे,  डंके बजाते हुए और बंदूकों की सलामियां दागते हुए जब सवारी किले से बाहर हो जाती थी, तब किले के बुर्ज पर शहनाई बजनी शुरू होती थी। सवारी लौट आने तक शहनाई बराबर बजती रहती थी। उसी तरह महालक्ष्मी के देवालय के नक्कारखाने में भी शहनाई शुरू होती थी। किले से निकलकर सवारी भरे बाजार से होकर महालक्ष्मी जाती थी और वैसे ही लौटती हुई थी। और जब वह दूर की सवारी घोड़े पर जाती थी तब दासियां, आश्रित, कारकुन, प्यादे कोई भी साथ नहीं होता था। बस, घुड़सवार और विलायती लोग ही होते थे। लौटने में रात हो गई तो मशालें जला ली जाती थीं परंतु जब घोड़े पर होती थीं तो बिना मशाल के घोड़ा दौड़ाकर किले में आती थीं। अपनी आश्रित ब्राह्मण मंडली पर बाई साहब की बड़ी श्रद्धा थी। उन्हें अच्छे से अच्छा खान-पीन मिले, कपड़े-लत्ते बढ़िया हों, उन्हें सब तरह का सुख हो, इसके लिए वे बड़ी फिकर करती थीं। गुनियों का भी आदर करती थीं। बड़े-बड़े शास्त्री, विद्वान, वैदिक, याज्ञिक उनके पास रहते थे। पुस्तकों का संग्रह भी उन्होंने अमूल्य किया था। अच्छे पुराने गवैये, सितारिये और देश-देश के नामी-गिरामी कारीगर अपने बुला रखे थे। बाई साहब स्वयं बड़ी ही निष्कपट और निर्मल वृत्ति से रहती थीं। फिर भी हौसला उन्हें सब तरह का था। कोई उत्तम गवैया आया कि उसका गाना सुनकर विदाई दिए बिना रहती ही ना थीं। होली में रंग की धूम मच जाती थी। उस वर्ष मैं दत्तक पुत्र राव साहब के साथ होली में शहर गया था। उसी दिन ग्वालियर कोंकण की एक नाटक मंडली आई थी। शहर के लोगों ने पत्र भेजकर उन्हें झांसी बुलाया। जब शहर में उनके खेल हुए तब बाई साहब ने सरकार की तरफ से उनके खाने-पीने का प्रबंध कर दिया और किले में बुलाकर कई नाटक करवाए। 

 

अश्व परीक्षा करने में बाई अद्वितीय थीं। उस समय उत्तर हिंदुस्तान में तीन ही आदमियों का नाम लिया जाता था- एक नानासाहेब पेशवे, एक बाबा साहब आपके ग्वालियर वाले और लक्ष्मी बाई झांसी वाली। एक दिन एक सौदागर दो घोड़े लेकर आया। घोड़े देखने में बड़े सुंदर, गठे हुए और चतुर थे। बाई साहब ने दोनों पर सवारी की और चक्कर लगाकर एक की कीमत तो 1000 ठहराई और दूसरे की 50। उन्होंने कहा-दूसरा घोड़ा देखने में तो बहुत उम्दा और चतुर लगता है लेकिन उसकी छाती फूटी हुई है। इसलिए वह निकम्मा है। उसी समय सौदागर ने बाई साहब की कुशलता की तारीफ करके यह कुबूल किया- इस घोड़े को मैंने उत्तम मसाले देकर दिखाऊ बनाया है। इसकी परीक्षा के लिए मैं जगह-जगह घूमा लेकिन कहीं ना हो सकी। बाई साहब ने वे दो घोड़े लगाई हुई कीमत पर खरीद लिए।  बाईसाब प्रजा की बड़ी फिक्र रखती थीं और राजकाज में खुद मेहनत करने में भी आगा-पीछा नहीं करती थीं। झांसी के अमल में बरुआसागर नाम का एक छोटा सा शहर है। यहां चोरों ने बड़ा उपद्रव मचाया और प्रजा को बहुत तंग किया। तब उन्होंने स्वयं बरुआसागर जाकर वहां 15 दिन मुकाम किया और चोरों का पता लगाकर कुछ को फांसी दी, कुछ को कैद किया और इस तरह अपनी प्रजा को निर्भय किया। अनेक गुणों से संपन्न, स्त्री रत्न में उदारता और शौर्य यह दोनों तो निरुपम ही थे।