25 नवंबर 1947, जब पच्चीस हज़ार हिन्दुओं की लाश से पट गयी थी कश्मीर घाटी

दिंनाक: 25 Nov 2020 17:09:47

 

 


यह वो तारीख है जब पाकिस्तान, अब्दुला और नेहरू के कारण जम्मू कश्मीर के मीरपुर में 25000 हिंदूओं का नरसंहार हुआ था। यह तारीख मीरपुर नरसंहार कि है जब पाकिस्तानी सेना और कबाइलियों ने मीरपुर शहर में बर्बरतापूर्वक 25000 हिंदूओं की लाशें पाट दी। जब अब्दुला और नेहरू ने जम्मू काश्मीर की सियासत के लिए इंसानियत से ही मुंह फेर लिया था ।

 

26 अक्टूबर 1947 को जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हो चुका था। मीरपुर इसी जम्मू कश्मीर में पाकिस्तानी सीमा पर बसा एक शहर था। यहां के 25000 से ज्यादा हिंदूओं सिक्खों को लगा कि अब जम्मू कश्मीर तो भारत का अभिन्न हिस्सा हो गया है लिहाजा अब शहर छोड़ने या पलायन करने की जरूरत नहीं है। उन्हें यह कहां पता था कि इस्लामी आक्रांता इस शहर को उनकी जान की कीमत पर खाली करा देंगे।

 

बंटवारे की आग में झुलसे हुए, पाकिस्तान स्थित अपने घरों से भगाए गए 10000 हिंदु बेफिक्र हो कर यहां आकर बस गए थे। उन्हें यह कहां पता था कि इस्लामी उन्माद के रस में डूबे आक्रांता उन्हें मीरपुर में आकर मार डालेंगे।

 

उम्मीद ! एक जीवन की उम्मीद, उन्हें पाकिस्तान से मीरपुर सिर्फ इसलिए लेकर आई थी कि वे यहां किसी डर भय के बिना बचा हुआ जीवन गुजार सकेंगे । लेकिन पाकिस्तानी सेना, कबाइलियों के दुर्दांत नियोजित हमले और अब्दुला / नेहरू के नियोजित नीतियों ने उन्हें सिंधु के पावन सरिता के तट पर प्यासे मरने को विवश किया ।

 

नवस्थपित इस्लामी राष्ट्र के उन्माद में पाकिस्तानी सैनिकों और पठानों के कबीलों ने पहले मीरपुर के अलग बगल के इलाकों में भयंकर हिंसा करना शुरू कर दिया, हजारों हिंदूओं को पाकिस्तान और मीरपुर की सीमा पर मारा गया। हिंदूओं का कत्लेआम करते हुए यह भीड़ मीरपुर शहर की तरफ बढ़ रही थी, राष्ट्रिय समाज की अनन्य श्रद्धा वाले हजारों देवालय भी तोड़ दिए गए। यह कुकृत्य तब भी इस्लामियों के लिए पवित्र जिहाद स्वरूप थे।

 

जब यह दुर्दांत जिहाद जब अपने चरम पर था उसके पहले ऐसी संभावना से बचने के लिए हिंदूओं ने अब्दुला और नेहरू से भी मुलाकात की लेकिन यह विफल रहीं। संभावित हमले से बचने के लिए नेहरू के द्वारा नवनियुक्त अब्दुला के यहां हिंदूओं का जत्था जब पहुंचा तो वहां कोई सुनवाई नहीं हुई, जब हिंदूओं का यह दल दिल्ली में नेहरू से मिले लेकिन नेहरू ने मीरपुर में सेना भेजने का कोई फैसला नहीं किया।

 

जब हिंदूओं का यह दल गांधीजी से मिलकर अपनी सुरक्षा की गुहार लगा रहा था तब गांधीजी यह कहते हुए पाए गए कि बर्फबारी के कारण वहां सेना नहीं भेजी जा सकती। आप स्वयं यह अनुमान लगा सकते है कि यह कितनी हैरत भरी बात है क्योंकि मीरपुर में बर्फ पड़ती ही नहीं थी।

 

हामिद अंसारी को अब राष्ट्रवाद महामारी नजर आने लगी है, तो अचरज क्या…?

 

ऐसी परिस्थितियों में सिर्फ एक बात स्पष्ट थी और वह थी कि मीरपुर के हिंदूओं को उनकी हालत पर छोड़ दिया गया था, उनकी सहायता करने वाला कोई नहीं था। उधर मिरपुर में भारतीय सेना की एक टुकड़ी इस्लामी कबाइलियों को पीछे धकेलने का प्रयास कर रही थी लेकिन एक बार फिर नेहरू के एक निर्णय ने मीरपुर के हिंदूओं के प्राणों पर आघात पहुंचाया। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने 16 नवंबर को भारतीय सेना को मीरपुर भेजने के बजाय उड़ी भेजने का फैसला सुनाया। जब पाकिस्तानी सेना और इस्लामी कबाइलियों को यह पता चला तो उन्होंने पूरी तैयारी के साथ मीरपुर पर हमला करने की योजना बनाने में लग गए।

 

तारीख 24 नवंबर 1947 - इस्लामी कबाइलियों के साथ पाकिस्तानी सेना ने मीरपुर पर जबरदस्त हमला बोला, चौबीस घंटे के भीतर ही मीरपुर की सड़कें हजारों हिंदूओं की हत्या से लाल हो चुकी थी शहर में धुंए की मोटी परत सिर्फ दिखाई दे रही थी, सन्नाटे के बीच ऐसा लग रहा था जैसे सूरज भी शर्म से अपनी आंखें मूंद लिया हो।

 

आखिरकार कबाइलियों ने लूटपाट और हिंदु हत्या करते हुए हिंदूत्व के स्वाभीमान पर हमला करने गुरुद्वारा दमदमा साहिब तक पहुंचे। यहां पर इस्लामी आक्रांताओं ने हजारों सिखों का कत्लेआम किया। हमले से बचने के लिए और मान सम्मान की रक्षा करते हुए सैकड़ों महिलाओं ने आत्महत्या किया, गुरुद्वारे की प्रांगण में बने कुंए में बच्चों के साथ छलांग लगाई।

 

जब इस्लामी आक्रांताओं के द्वारा मीरपुर में हिन्दू हत्या का तांडव चल रहा था तब बड़ी बेशर्मी से गांधीजी का अहिंसा और भारत का नव स्थापित लोकतंत्र सिर्फ ढोंग तंत्र की भांति देख रहा था। 24 घंटों के अंदर 25000 से ज्यादा हिंदूओं की हत्या हो चुकी थी। इस निर्मम हत्या की नींव पर ही मीरपुर में, और अब्दुला की मंशा से कश्मीर में इस्लामी राज्य स्थापित हो चुका था।