एक देश एक चुनाव" केवल चर्चा का विषय नहीं रहा, बल्कि भारत की जरूरत है

दिंनाक: 27 Nov 2020 18:27:16


 

 

   - प्रवीण कुमार कुशवाहा    

एक देश एक चुनाव केवल विचार विमर्श का विषय नहीं रहा बल्कि यह भारत की जरूरत है समय और धन दोनों बचाने के लिए इस ओर बढ़ना होगा, यह बात शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कही । गुजरात के केवड़िया में आयोजित 80 वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि हर एक-दो महीने में देश के किसी न किसी हिस्से में चुनाव होते रहते हैं इसके कारण विकास कार्य बाधित होते है‌। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि लोकसभा, विधानसभा और पंचायत चुनावों के लिए अलग-अलग मतदाता सूचियां बनाई जाती है यह संसाधनों की बर्बादी है।


अगर हम देश में होने वाले चुनावों पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि हर वर्ष देश में कहीं ना कहीं चुनाव होते ही रहते हैं। लगातार होने वाले चुनावों के वजह से देश के एक हिस्से को हमेशा चुनावी मोड में पाते हैं। यही कारण है कि वर्तमान सरकार एक देश एक चुनाव कराने का मुद्दा लगातार उठाती रही है और ज्यादातर राजनीतिक दल इसके समर्थन में भी है लेकिन अभी भी कुछ राजनीतिक दल इस सार्थक विचार के खिलाफ है।

एक देश एक चुनाव की बात करें तो यह कोई नई बात नहीं है संविधान लागू होने के बाद 1952, 1957, 1962, और 1967 में लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ ही हुए थे। मुख्य मुद्दा यह है कि अगर इस प्रकार के चुनाव देश में पहले भी हो चुके हैं तो अब यह प्रक्रिया पुनः लागू करने में क्या समस्या हो सकती है? कुछ जानकारों का मानना है कि दोनों चुनाव एक साथ कराए जाने से क्षेत्रीय मुद्दों पर राष्ट्रीय मुद्दों का दबदबा होगा ऐसे में क्षेत्रीय पार्टियां और मुद्दे हाशिए पर चले जाएंगे। कुछ का यह भी कहना है कि देश की जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई है जिसके कारण एक साथ चुनाव करा पाना संभव नहीं है लेकिन विषय विशेषज्ञों का कहना है कि समय के साथ टेक्नोलॉजी में बढ़ोतरी हुई है पहले के चुनाव और आज के समय में होने वाले चुनाव में जमीन आसमान का फर्क है, अब एक साथ चुनाव ज्यादा सरल और सुगम तरीकों से कराया जा सकता है। यह शाश्वत सत्य है कि लोकसभा और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं का चुनाव एक साथ कराने में कोई बड़ी समस्या नहीं है बल्कि इससे भ्रष्टाचार में कमी आएगी।

विश्व कर रहा है संस्कृत का सम्मान – मध्यप्रदेश के इन गांवों में बच्चा बच्चा बोलता है संस्कृत

देश में कुछ ऐसे भी राज्य है जहां पर क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा रहा है, ऐसा देखा गया है कि इन राज्यों में राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक विचार विमर्श तक नहीं हो पाते। यह देश की सुरक्षा और अखंडता के लिए ना सिर्फ एक बड़ा प्रश्न है बल्कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

एक देश एक चुनाव के पक्ष में दिए जाने वाले तर्कों की बात करें तो उनमें समय की बर्बादी और धन का दूरूपयोग अहम् है। चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता लागू किए जाने के पश्चात सरकार कोई नई परियोजनाएं लागू नहीं कर सकती, साथ ही वित्तीय मंजूरी की मनाही भी रहती है। ऐसे में सरकारी कामकाज बाधित होते हैं साथ ही शिक्षकों व प्रशासनिक अधिकारियों की बार-बार ड्यूटी लगाने से इनके कार्यों का निर्वहन सही तरीके से नहीं हो पाता है।

यह भी एक सच है कि अलग-अलग चुनाव कराने के दौरान खर्च होने वाले धन का सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ होता है। अगर एक देश एक चुनाव की सार्थक प्रक्रिया अपनाया जाता है तो बार बार चुनाव में खर्च होने वाले धन में कमी आयेगी और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

वर्तमान परिदृश्य में नजर डाले तो एक देश एक चुनाव कराना देश के पक्ष में है साथ ही देश की जरूरत है। देश के बहुत से लोग रोजगार व अन्य कारणों की वजह से एक राज्य से दूसरे राज्य व अन्य जगहों पर रहते हैं तथा चुनाव के समय आवागमन में समस्याओें का सामना करना पड़ता है, ऐसे में लोगों की बढ़ती व्यस्तताओं को ध्यान में रखते हुए एक देश एक चुनाव कराना समय की मांग है।