स्वच्छ भारत अभियान के आर्थिक लाभ, दूसरे चरण की सफलता के चार आधार-स्तंभ

दिंनाक: 19 Mar 2020 14:58:39

निष्ठा अनुश्री 

शहरी अर्थव्यवस्था में स्वच्छ भारत अभियान की भूमिका बताते हुए केंद्रीय आवास व शहरी मामले मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि 2030 तक भारत की शहरी आबादी 60 करोड़ यानी देश की जनसंख्या का 40 प्रतिशत हो जाएगी।

ऐसा होने के बाद “शहरी क्षेत्र देश की जीडीपी में 70 प्रतिशत और कर राजस्व में 85 प्रतिशत का योगदान देगा”, कहते हुए केंद्रीय मंत्री पुरी ने यह भी बताया कि शहरों में रोजगार के 70 प्रतिशत अवसर होंगे।

दिल्ली में ‘शहरी स्वच्छता का भविष्य’ विषय पर 27-28 फरवरी को एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस आयोजन का उद्घाटन करते हुए पुरी ने 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लिए शहरी एजेंडे में स्वच्छता का समावेशन अति आवश्यक बताया।

लोगों की भागीदारी की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा, “आज जो हम नीतियों को सफल होते हुए देख रहे हैं, वह इसलिए हो रहा है क्योंकि नागरिक भागीदारी के अनुसार उन्हें सोच-समझकर डिज़ाइन किया गया है और वे सहयोगी संघवाद में निहित हैं।”

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार कम आय वाले देशों में बुरी स्वच्छता (सैनिटेशन) व्यवस्था के कारण सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7 प्रतिशत का नुकसान होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि खराब व्यवस्था से कार्यबल की उत्पादकता घटती है।

वहीं दूसरी ओर डब्ल्यूएचओ का कहना है कि स्वच्छता पर हुए 1 डॉलर के निवेश पर 5.5 डॉलर का फल मिलता है। इस प्रकार हम पाते हैं कि जीवन की गुणवत्ता, स्वास्थ्य और सुलभता से ऊपर उठकर स्वच्छता अर्थव्यवस्था के लिए भी आवश्यक है।

कार्यक्रम में ही जल शक्ति मंत्रालय के सचिव परमेश्वरन अय्यर भी थे। उन्होंने कहा कि स्वच्छ भारत मिशन के पहले चरण से चार बातें सीखी जा सकती हैं- राजनीतिक नेतृत्व व प्रतिबद्धता की आवश्यकता, सार्वजनिक वित्तपोषण, साझेदारियाँ और लोगों की प्रतिभागिता।

सार्वजनिक वित्तपोषण का महत्त्व

सार्वजनिक वित्तपोषण को उन्होंने महत्त्वपूर्ण इसलिए बताया क्योंकि डब्ल्यूएचओ की तरह ही उनका भी मानना है कि स्वच्छता में निवेश का प्रतिफल 400 प्रतिशत मिलता है।

द इंडियन एक्सप्रेस  में लिखे एक लेख में अय्यर ने यह भी बताया कि जब भारत के स्वच्छ भारत अभियान की सफलता देखकर अफ्रीकी देशों ने इसे अपने यहाँ लागू करने का प्रयास किया तो सबसे बड़ी जो बाधा उन्हें मिली वह यह थी कि वे अपने वित्त मंत्रालयों को भारत की तरह स्वच्छता के क्षेत्र में भारी निवेश के लिए नहीं मना सके।

अय्यर के अनुसार भारत में पिछले पाँच वर्षों मे ंस्वच्छता पर 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार इसपर चार गुना रिटर्न आएगा क्योंकि अनुमानित रूप से हर ग्रामीण घर इसके कारण 50,000 रुपये बचाने में सफल हुआ है। यह बचत चिकित्सा खर्च और समय बचत के रूप में हुई है।

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टॉयलेट बोर्ड कोएलिशन का मानना है कि 2021 तक भारत में स्वच्छता का 60 अरब डॉलर का बाज़ार होगा। शौचालय से संबंधित उपकरणों व चीज़ों का व्यापार करने वाले स्वच्छ भारत मिशन के दौरान कई गुना वृद्धि के साक्षी बने।

यूनिसेफ की रिपोर्ट का यह भी कहना है कि स्वच्छ भारत मिशन के कारण 75 लाख पूर्णकालिक रोजगार अवसरों के समतुल्य अवसर खुले हैं जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल दिया।

इससे यह स्पष्ट होता है कि स्वच्छता में निवेश विस्तृत आर्थिक, स्वास्थ्य-संबंधी और सामाजिक लाभ लेकर आता है। इन्हीं तर्कों से अय्यर ने अफ्रीका में हुई बैठक में स्वच्छता मंत्रियों को वित्त मंत्रियों को समझाने का सुझाव दिया।

सरकारी सहायता के अलावा हम पाते हैं कि पिछले पाँच वर्षों में सार्वजनिक वित्तपोषण के रूप में स्वच्छ भारत अभियान को कुल 777.4 करोड़ रुपये मिले जिसका बड़ा हिस्सा एक पीएसयू (सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम) और दो निजी कंपनियों ने दिया।

ये दो निजी संस्थाएँ हैं- केरल आधारित माता अमृतानंदमई मठ जिसने 100 करोड़ रुपये दिए और तकनीकी कंपनी लार्सन एंड टूब्रो (एल एंड टी) जिसने 60 करोड़ रुपये का योगदान किया। 49.24 करोड़ रुपये देने वाला सार्वजनिक उपक्रम है पावर फाइनेन्स कॉर्पोरेशन।

स्वच्छ भारत मिशन 2.0

2 अक्टूबर 2019 पर भारत को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) घोषित करने के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि यह सिर्फ एक मील का पत्थर है, अंतिम लक्ष्य नहीं। इसके बाद 19 फरवरी को कैबिनेट ने स्वच्छ भारत अभियान के दूसरे चरण की शुरुआत की।

अब दायित्व होगा यह देखना कि लोग शौचालयों का उपयोग करना जारी रखें व भारत को ओडीएफ बनाए रखें। शहरी स्वच्छता पर राष्ट्रीय सम्मेलन में भी अय्यर ने स्वच्छ भारत अभियान के दूसरे चरण के लिए आवश्यक चार आधार स्तंभों की बात की।

इन चार में से पहला है भारत को ओडीएफ बनाए रखना। दूसरा है कूड़ा प्रबंधन जिसमें से जैविक कूड़े को सीएनजी की तरह जैविक ईंधन बनाने के लिए प्रयोग में लाया जाए। तीसरा है 2022 तक एकल-उपयोग प्लास्टिक से भारत को मुक्त करना और चौथा है मलजल प्रबंधन।

बुधवार (4 मार्च) को ग्रामीण स्वच्छ भारत अभियान का भी दूसरा चरण शुरू किया गया जिसमें अगले पाँच वर्षों में 1.41 लाख करोड़ रुपये के खर्च की बात कही गई। इसके तहत हर पंचायत में कूड़ा और मलजल प्रबंधन की व्यवस्था स्थापित की जाएगी।

कूड़ा प्रबंधन पर 2016 में ही नगर निगमों के लिए दिशानिर्देश निकाल दिए गए थे और अब इनका पालन न करने वालों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) शिकंजा कसती नज़र आ रही है।

तेलंगाना में प्रतिदिन 10,073 टन का कूड़ा निकलता है जिसमें से 4,506 टन बिना उपचार के ही फेंक दिया जाता है। तेलंगाना सरकार पर जुर्मान ठोकने के अलावा एनजीटी ने बायो-माइनिंग और जैविक उपचार करने के लिए भी कहा है।

इसी प्रकार दिल्ली में भी गुरुग्राम और फरीदाबाद नगर निगमों ने एनजीटी को एक शपथ-पत्र सौंपा है जिसमें बंधवारी लैंडफिल पर अब और कूड़ा नहीं फेंका जाएगा। यह निर्णय इस लैंडफिल स्थल की क्षमता पूरी होने को देखते हुए लिया गया है।

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अब गुरुग्राम के बसाई में 5 एकड़ की भूमि चिह्नित की गई है जहाँ कूड़े का प्रसंस्करण होगा और ऐसी ही व्यवस्था फरीदाबाद नगर निगम ने सिही गाँव की 10 एकड़ भूमि पर की है। बसाई और सिही के इन स्थानों पर उच्च घनत्व वाले पॉलिथीन की लाइनिंग की जा रही है ताकि लीचेट भूजल को प्रदूषित न करे।

एकल-उपयोग प्लास्टिक की बात करें तो तमिलनाडु सरकार ने इसे पिछले वर्ष से ही प्रतिबंधित कर दिया था लेकिन प्री-पैक्ड (पहले से पैक होकर आई) वस्तुओं को इससे छूट दी थी। अब टीएन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) के सुझाव पर इसपर पुनर्विचार किया जा रहा है।

इसी प्रकार देश के अलग-अलग कोनों से स्वच्छ भारत के दूसरी चरण की छोटी-बड़ी खबरें आएँगी लेकिन यह अभियान तब तक सफल नहीं हो पाएगा जब तक नागरिकों की भागीदारी नहीं होगी।

 उक्त आलेख - स्वराज्य से लिया गया है